अदभुत हिमाचल – यहां होली पर नहीं बरसते रंग, पुराना कांगड़ा में जैन समुदाय तीन दिन तक मनाता है होली उत्सव

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– महाराजा सुशर्मचंद्र ने की थी तीर्थ की स्थापना, मुनि जिन विजय ने की खोज

फोकस हिमाचल फीचर डेस्क

पुराना कांगड़ा में जैन समुदाय के लोग बिना रंगों के होली का त्यौहार मानते हैं। तीन दिन तक चलने वाले इस उत्सव में देश के दूसरे राज्यों के लोग हिस्सा लेने यहाँ पहुँचते हैं। जैन समुदाय के लोग इस उत्सव को 60 से भी ज्यादा साल से मना रहे हैं। जैन समुदाय के लोग भगवान श्री ऋषभदेव (श्री आदिनाथ)की मूर्ति की पूजा कर होली मानते हैं और दुर्ग के भीतर स्थित श्री आदिनाथ मंदिर में ध्वजारोहण करते हैं।

महाराजा सुशर्मचंद्र ने करवाई इस तीर्थ की स्थापना
श्री कांगड़ा जैन श्वेताम्बर तीर्थ लगभग 5000 वर्ष प्राचीन 22वें तीर्थंकर परमात्मा नेमिनाथ जी के समय का महिमावंत तीर्थ है। प्रकृति की गोद में बसे इस तीर्थ की स्थापना चंद्रवंशीय महाराजा सुशर्मचंद्र ने महाभारत के समय के आसपास करवाई थी।
जैन धर्म के गौरवशाली इतिहास में जिक्र
किसी समय में यह क्षेत्र काफी समृद्ध था। यहाँ कई जिन मंदिर थे व विपुल संख्या में जैन धर्मावलंबी भी थे। पर कालांतर में किन्हीं कारणों से, जैसे सन् 1905 के आसपास आये भूकंप व राजकीय स्तिथि के कारण से भी यहाँ के मंदिर लोप होते चले गए। काँगड़ा किले में जैन मंदिरों के अवशेष यहाँ पर जैन धर्म के गौरवशाली इतिहास की दास्ताँ बयान करते हैं। किसी समय अपनी प्रसिद्धि के शिखर पर रहा यह तीर्थ काल के थपेड़ों की वजह से विस्मृत हो गया था।
मुनि जिन विजय ने की खोज
मुनि जिन विजय ने पाटण (गुजरात) के ग्रन्थ भण्डारों का संशोधन कार्य करते हुए इस प्राचीन तीर्थ के इतिहास के बारे में जाना और इसकी विस्तृत खोज की। आचार्य श्विजय वल्लभ सुरिश्वर महाराज और आचार्य विजय समुद्र सुरिश्वर महाराज के प्रयत्नों से इस तीर्थ के पुनरुद्धार के प्रयासों को बल मिला। इन्हीं की प्रेरणा से साध्वी मृगावती ने इस तीर्थ को पुनः जीवंत करने का बीड़ा उठाया।
प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान की जटाधारी प्रतिमा
वर्तमान में यहाँ केवल प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान की श्याम वर्ण की 39.5 इंच ऊंची जटाधारी प्रतिमा ही दृष्टिगोचर होती है। यह प्रतिमा अत्यंत नेत्रानंदकारी और अद्वित्य है। एक समय तक यह प्रतिमा काँगड़ा के विशाल किले में एक छोटे से कमरे में रही व यह स्थान सरकार के कब्ज़े में थी। स्थानीय लोग इस प्रतिमा को भैरव देव कह कर पुकारते थे व तेल और सिन्दूर चढ़ा कर इसकी पूजा अर्चना करते थे।
1978 में जैनियों को मिला यहां पूजा का अधिकार
साध्वी मृगावती जी के अनथक प्रयासों, उनके मनोबल, तपोबल और जप-बल के परिणामस्वरूप इस प्रतिमा की जैन पद्धति से पूजा सेवा करने का अधिकार जैनों को सन् 1978 में मिला।काँगड़ा किले की तलहटी के पास ही जैन श्वेताम्बर समाज द्वारा एक भूखंड प्राप्त किया गया, जहाँ पर धर्मशाला, भोजनशाला व नूतन जिनमंदिर का निर्माण किया गया। तलहटी के इस नूतन जैन मंदिर में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान हैं, जिनकी प्रतिमा 500 वर्ष प्राचीन है व विश्वप्रसिद्ध राणकपुर तीर्थ से आई है। इस मंदिर की प्रतिष्ठा आचार्य विजय इंद्रदिन्न सुरिश्वर महाराज की निश्रा में सन् 1990 में संपन्न हुई।

ध्यान-साधना और जप-तप के लिए अनुकूल स्थान

यह तीर्थ अत्यंत शांत, एकांत व् रमणीय स्थान पर है। सौन्दर्यमण्डित पहाड़ियों से घिरे, कल कल करती नदी के किनारे, काँगड़ा की घाटी में स्थित यह तीर्थ ध्यान-साधना और जप-तप के लिए अनुकूल स्थान है। तीर्थ पर पहुंचने के लिए: इस तीर्थ पर सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह तीर्थ हवाई सेवा से भी जुड़ा हुआ है हवाई सेवा दिल्ली से उपलब्ध है । रेल मार्ग से भी यहां पहुंचा जा सकता है।


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