चित्रकला की कांगड़ा शैली को उड़ान दे रही चम्बा के आख़िरी गांव की बेटी सुभोभना

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चम्बा से मनीष वैद की रिपोर्ट

अगर आप चम्बा के होली वाले रुट से मणिमहेश यात्रा के लिए जाएं तो आख़िरी गांव आता है कलाह। पहाड़ी पर बसे कलाह गांव के आगे कोई आबादी नहीं है। इसी गांव की एक बेटी चित्रकला की कांगड़ा शैली को ऊंची उड़ान दे रही है। पेशे से शिक्षिका सुभोभना चित्रकला की इस परम्परागत शैली के संरक्षण के में जुए युवा चित्रकारों में शामिल हैं। सुभोभना ने चित्रकला का हुनर कांगड़ा चित्रकला को शिखर पहुँचाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता महान चित्रकार स्वर्गीय ओपी टाक से सीखा और नियमित अभ्यास और सतत साधना से रंगों की दुनिया में अपनी ख़ास पहचान बनाई है। सुशोभना के खजाने में एक से बढ़ कर एक मास्टरपीस शामिल हैं।
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जहां की पढ़ाई, वहीं पर पढ़ाया
चूंकि कलाह गांव में शिक्षा की सुविधा नहीं थी तो 10 नंबंबर 1986 को अमिरथ और माया देवी के घर पैदा हुई सुशोभना को लेकर उसके परिजन कांगड़ा के लांझिया आ गए। उसकी आरंभिक शिक्षा राजकीय प्राथमिक पाठशाला (कन्या) खैरा से हुई। जमा दो करने के बाद सुशोभना ने स्वामी विवेकानद कॉलेज शिवनगर से स्नातक किया। 2006 में उसका चयन प्राथमिक सहायक शिक्षिका के रूप में उसी पाठशाला में हो गया, जहाँ से जमा दो की पढ़ाई की थी ।
बचपन से कला के प्रति आकर्षण
सुशोभना के पिता एक शिल्पकार के तौर पर पहचान रखते थे और माता बुनाई के कार्य में दक्ष थी, यही वजह थी कि कला के प्रति बच्ची का रुझान था। अध्यापन के दौरान जब सुशोभना विभागीय शिक्षा पूरी करने डाइट धर्मशाला पहुंची तो उसकी मुलाक़ात चित्रकार ओ पी टाक से हुई। उनसे मिलने से पहले सुशोभना रंगों से कैनवास पर हाथ आजमाना शुरू कर चुकी थी। ओ पी टाक ने उनके बनाये चित्रों को देखते हुए उसे अपना शिष्य बना लिया। अपनी पढ़ाई के बीच उसे जब भी समय मिलता, अपने गुरु से चित्रकला की बारीकियां सीखने पहुंच जाती।
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चित्रकार धनी राम से सीखा

ओपी टाक की कैंसर से अचानक मौत के चलते सुशोभना चित्रकला की इस अनमोल शिक्षा से वंचित रह गई, लेकिन चित्रकार धनी राम से कांगड़ा शैली की बारीकियां सीख कर खुद को मिनिएचर पेंटर के तौर पर निखारा। वर्तमान में कालापुल, धर्मशाला में रहने वाली सुशोभना चित्रकला की दुनिया में चमकता सितारा है। वह कांगड़ा शैली की समर्पित चित्रकार हैं।


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