कभी सीटों के नीचे चूहे भागते थे, अब रॉयल लुक में नजर आता है शिमला शाही थियेटर

Spread the love

शिमला से उमेश शर्मा की रिपोर्ट
अपने शुरुआती दिनों में शिमला के शाही सिनेमा की स्थिति दयनीय थी। चूहे सीटों के नीचे भागते थे और ज्यादातर कुर्सियां टूट जाती थीं। हाथ में टिकट होने के बावजूद सीट खोजने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। लेकिन अब इस सिनेमा हाल का जीर्णोद्वार हो चुका है। शिमला के सबसे पुराने सिनेमा हॉलों में शामिल ‘शाही थिएटर’, अब रॉयल लुक में नजर आता है। शाही थिएटर में आज पुश-बैक कुर्सियाँ हैं, फ़िल्में डिजिटल प्रोजेक्टर सिस्टम पर चलती हैं, जो डॉल्बी साउंड ट्रैक के साथ है और उत्तर भारत का एकमात्र सिंगल-स्क्रीन 3 डी सिनेमा है। अपने दादा हकीम ज्ञानचंद की इस एतिहासिक धरोहर का प्रबंधन जब एमबीए पास पोते साहिल शर्मा ने संभाला, तब से चीजें बदलने लगीं। साहिल शर्मा ने राम बाजार में स्थित शाही थिएटर को ऐसा मॉडर्न लुक दिया है कि अब यह वास्तव में शाही (रॉयल) दिखता है। साहिल शर्मा बताते हैं कि उन्होंने शाही थियेटर में अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग कर इसे रॉयल लुक दिया है, जिसके चलते यह सीनेमा प्रेमियों की पसंद बना है।
“लक्ष्मी नारायण” के फिल्मांकन से थियेटर की शुरुआत
अपने नाम की तरह शाही सिनेमा का एक शाही अतीत है। शिमला के शाही हकीम ज्ञान चंद ने आम लोगों के लिए शिमला में एक थिएटर शुरू करने की परिकल्पना की थी। राम बाज़ार में फ़र्न कॉटेज को शाही थियेटर के लिए एक आदर्श स्थान के रूप में देखा जाता था। इसके मालिक पूरन मल्ल ने 1929 में शिमला के बड़े व्यापारियों के साथ एक धर्मार्थ ट्रस्ट बनाया था। ट्रस्ट ने कार्ट रोड को छूने वाले भवन के एक हिस्से को राय बहादुर पूरन मल धर्मशाला में परिवर्तित कर दिया था, लेकिन ऊपरी हिस्सा रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के पास था। यह हिस्सा खाली हो गया तो हकीम ज्ञानचंद ने फिल्मों को चलाने का लाइसेंस प्राप्त किया। थियेटर की शुरुआत जून 1953 में “लक्ष्मी नारायण” के फिल्मांकन के साथ हुई जिसमें मीना कुमारी और महिपाल ने अभिनय किया। नानाभाई भट्ट द्वारा निर्देशित यह 1951 में रिलीज़ हुई थी।
यूनानी चिकित्सा के प्रख्यात चिकित्सक हकीम ज्ञानचंद
हकीम ज्ञानचंद यूनानी चिकित्सा के प्रख्यात चिकित्सक थे। उनकी लोकप्रियता के कारण, तत्कालीन रियासत के नवाब ने उन्हें शाही हकीम की उपाधि दी। त्वचा के उपचार के लिए उनके बनाए रक्तशोधक और मलहम के कारण उन्होंने अन्य राज्यों में भी ख्याति अर्जित की। लोअर बाज़ार में उनका क्लिनिक हमेशा मरीजों से भरा होता था। वे शिमला के प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे और घर से क्लीनिक तक घोड़े की सवारी करते थे। साल 1968 में उनका देहांत हो गया।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *