आगरा के ताजमहल की सुंदरता को मात देता शाहपुर का यह शीशमहल, हिंदी फिल्मों में कैद हो चुकी है खूबसूरती, कहा जाता है शाहपुर के रेहलू गांव से संबंध रखते थे अकबर के नवरत्नों में शामिल बीरबल

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शाहपुर से रमेश मस्ताना की रिपोर्ट
बेशक उस शीशमहल की वास्तुकला आगरा के ताजमहल से भी कहीं शानदार है, यह अलग बात है कि कांगड़ा जिला के शाहपुर क्षेत्र के रेहलू गांव का यह शीशमहल कला की पारखी नजरों से दूर ही रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्याह्न के बाद निर्मित तीन मंजिला विशाल कोठीनुमा आलीशान भवन उस दौर में निर्माण कला की कहानी खुद कहता है। भवन में अलग — अलग कमरों के साथ पूजा कक्ष, अन्न भंडार, ड्योढ़ी के बाहर का विशेष बैठक कक्ष और सबसे आलीशान शीशमहल बनाया गया है। कहा जाता है कि मोहिन्द्र सिंह चौधरी ने बड़े चाव से इस भवन की निर्माण करवाया था। भवन एवं शीशमहल का निर्माण पत्थर व चूने और कच्ची ईंटों से किया गया है। शीशमहल और बैठक कक्ष में अति प्राचीन वस्तुएं ग्रामोफोन बाजा, दूरबीन, कैमरा, हमाम, लंदन में बनी कारतूसी बन्दूक , ढाल, खुखरी, पीतल व अन्य मिश्रित – धातुओं से बने बर्तन संजो कर रखे हुए हैं। कर्ण परमार पिंटू बताते हैं कि शीशमहल का सौंदर्य कुछ फिल्मों में भी कैद हुआ है। शीशमहल कई कला प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र भी रहा है। वर्तमान में भी कई खोजी प्रवृत्ति के व्यक्ति इसके सौंदर्य कैद करके ले जाते हैं। बता दें कि अकबर के नवरत्नों में शामिल रहे बीरबल का जन्म भी रेहलू में हुआ था।

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तीसरी मंजिल पर शीशमहल

भवन की शान तीसरी मंजिल पर रेहलू के हार की तरफ बना वह कमरा जो शीशमहल के नाम से जाना जाता है। शीशे के टुकड़ों से जड़े, काष्ठकला की अदभुत कारीगरी और दीवारों व छत पर कांगड़ा कलम की चित्रकारी से सजा यह कमरा आज भी किसी अजूबे से कम दिखाई नहीं देती है। कांगड़ा – कलम के लिए विख्यात लदवाड़ा- गगल के चितेरे वर्तमान में रैणा परिवार के बुजुर्गों ने पेंटिंग व चित्रकारी कर शीशमहल में जान डाल दी थी।

लाइब्रेरी में मौजूद ऐतिहासिक पुस्तकें व ग्रंथ

धरातल के कमरों में जहां धन-दौलत और अनाज आदि के संग्रहालय हैं, वहां दूसरी मंजिल पर ड्योढ़ी की ओर बैठक के कमरे में आज भी उस जमाने के पलंग सोफे, कुर्सियां, चारपाइयां और उन पर की गई कारीगरी उस दौर में पहाड़ की काष्ठकला की गवाही देती है। एक कमरे में लाइब्रेरी की है, जिसमें उर्दू का अथाह साहित्य रखा हुआ है। बेशक काफी पुस्तकें ग्रंथ एवं दस्तावेज दीमक का आहार बन चुके हैं, बावजूद इसके उर्दू के कई उपन्यास, शेयर ओ शायरी की पुस्तकें, मौसिकी से संबंधित ग्रन्थ, तत्कालीन राजस्व विभाग के नियमों से सम्बंधित किताबें, महाभारत, गीता, योग-वशिष्ट आदि – आदि की पुस्तकें अभी भी सुरक्षित हैं।

दादा की विरासत संजो रहे पोते- पोतियां

1905 के कांगड़ा के भूकंप से इस शीशमहल को भी नुकसान पहुंचा, फिर भी चौधरी मोहिन्द्र सिंह के सुपुत्र चौधरी उमेद सिंह ने इस प्राचीन विरासत को संभालने एवं सहेजने का पूरा प्रयास किया। चौधरी उमेद सिंह भी अपने पिता के समान एक सुहृदयी व्यक्ति, संगीत प्रेमी, उर्दू लेखन में रुचि रखने वाले, शायरी व इतिहास लेखन में विशेष रुचि रखते हुए बागबानी का भी भरपूर शौक रखते थे। उनकी धर्म पत्नी संध्या देवी भी उतनी ही गुणी एवं संस्कारी गृहिणी थीं। उमेद सिंह के बेटे कर्ण परमार पिन्टू और उनकी पांच बेटियां – संयोगिता, कंचन, बसन्ती, उषा और निर्मल इस पूरी विरासत को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं।
कमांऊ से आये पुकारे जाते कमांण
रेहलू के दरगेला — ठम्बा की ओर के कोने पर स्थित परमारों का बेहड़ा काफी लोकप्रिय एवं धन-धान्य से सम्पन्न जागीरों का मालिक रहा है। माना जाता है कि यह कुमाऊं से यहां आए थे और इसी कारण इन्हें कमांण के नाम से भी जाना जाता था। अंग्रेजों ने इन्हें चौधरी का खिताब दिया गया और इनको जागीरें व मुरब्बे तथा नकद इनाम राशि भी भेंट की जाती थी। इन्हीं परमारों / चौधरियों के समूह में चौधरी मोहिन्द्र सिंह सुपुत्र सुन्दर लाल के राजसी ठाठ-बाट का गवाह है शीशमहल

चंबा रियासत का हिस्सा आज के कांगड़ा का रेहलू

कांगड़ा– चम्बा जिला की सीमा पर धौलाधार के बर्फीले आंचल की तलहटी में स्थित रेहलू कस्बा रजवाड़ों के समय से ही काफी महत्वपूर्ण एवं आकर्षण का केंद्र रहा है। यह कस्बा सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी विभिन्न विशेषताओं को अपने में समेटे रहा है। चम्बा रियासत का हिस्सा होने के कारण और रेहलू के किले के कारण जहां यह प्राचीन काल से ही राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र रहा, वहीं रेहलू का हार बेगमी चावलों के लिए विख्यात रहा है। कई कलाकारों और मौसिकी के फनकारों के अकबर के नवरत्नों में अति प्रसिद्ध बीरबल की जन्मभूमि भी यही रेहलू नामक कस्बा माना जाता रहा है।

डाडासीबा से आए व्यापारी

व्यावसायिक रूप में यह कस्बा व्यापार और विभिन्न वस्तुओं की मंडी के रूप भी प्रसिद्ध रहा है। प्राचीन काल से ही जब आवागमन के साधन न के बराबर थे धारकंडी क्षेत्र, पठानकोट – होशियारपुर आदि व्यापारिक स्थानों से रेहलू के बाजारों का नाम जुड़ा हुआ था। कस्बे के दोनों किनारों पर स्थित दोनों ओरउआरला बाजार और पारला बाजार के नाम से आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। माना जाता है कि किसी समय जब डाडासीबा का बाजार किसी अनहोनी से उजड़ा था तो वहां के व्यापारियों ने रेहलू में आकर अपना कारोबार शुरू किया था।

कस्बे में रहती 26 कौमें

सामाजिक जन जीवन की दृष्टि से भी यह कस्बा राजाओं -, मुगलकाल, ब्रिटिश राज और स्वतंत्रता के उपरांत भी सभी समुदायों के मध्य काफी सौहार्दपूर्ण वातावरण को लिए हुए रहा है। मियां, मिर्जे, चौधरी (राजपूत और वर्तमान में परमार), वैद्य परिवार, महाजन – गुप्ता – अग्रवाल आदि के -साथ यह माना जाता रहा है कि इस कस्बे में छब्बीस कौमें बहुत सौहार्दपूर्ण वातावरण में निवास करती थीं। अध्यात्म की दृष्टि से नृसिंह मन्दिर, राधाकृष्ण मन्दिर, शिव दुआला और नागणी माता के मन्दिर के अतिरिक्त मस्जिद – मसीतें भी रेहलू में हैं।

संरक्षण की है जरूरत

कई अदभुत एवं ऐतिहासिक विरासतों को संजोए हुए यह रेहलू के शीशमहल, रेहलू का किला, बावडिय़ां-, कुओं, तालाबों, मसीतों, मस्जिदों, कोठियों, ऐतिहासिक नृसिंह मन्दिर सहित 1882 में वजीर वल्ली उल्ला खां के खोले गए प्राईमरी स्कूल के गिरते हुए भवन के अस्तित्व को बचाने व संरक्षित करने की जरूरत है। वर्तमान में शीशमहल की लाइब्रेरी में मौजूद पुरातन पुस्तकों को सहेजना भी ज रूरी है। अगर इमानदार पहल हो तो अतीत की इन निशानियां आने वाली पीढय़िों के लिए संजोई जा सकती है।

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