शायद ही नई पीढ़ी को पता हो कि उपज लेने के साथ कभी पहाड़ के हर गांव में सुख या दुख का गवाह ‘ख्वाड़ा’

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कभी हर गांव के गुरुत्वाकर्षण का केंद्र रहा ख्वाड़ा अब अकेला खड़ा अपने अतीत की पहरेदारी कर रहा, अब ख्वाड़े में वह पहले सी रौनक नहीं बची

महादेव (सुंदरनगर) से पवन चौहान की रिपोर्ट
जब हम दो– तीन दशक पीछे झांककर देखते हैं तो पाते हैं कि हम बहुत -सी पारंपरिक चीजों, स्थानों आदि को पीछे छोडक़र बहुत आगे निकल आए हैं। कभी इनसे हमारा गहरा नाता था, वे हमारी संस्कृति और हमारे सामंजस्य का प्रतीक थीं। इनमें से वे सारे स्थान उस गुरुत्वाकर्षण का केंद्र थे जो सभी रुठे हुओं को अपनों के पास खींच लाते थे। इन्ही स्थलों में से एक है ‘ख्वाड़ा’। ख्वाड़ा अर्थात खलिहान। ख्वाड़ा जो अनाज निकालने से लेकर साल भर गांव के कई अन्य कई कार्यक्रमों का गवाह बनता था। यह गांव का वह खाली स्थान होता था जहां पर हर मौसम की फसल को इक्_ा रखकर उससे दाना निकालने, छोटे– बड़े धार्मिक या अन्य कार्यक्रमों जैसे शादी, जन्मदिन आदि के लिए इस्तेमाल में लाया जाता था।
‘ख्वाड़ा’ लीपने के लिए ‘ज्वारी’
वैसे ख्वाड़ा किसी टब्बर या टोली विशेष की सामूहिक वह खुली जगह थी, जहां हर बड़ा- छोटा कार्य निपटाया जाता था। ख्वाड़े में नाच– – गाना भी होता था और समयानुसार किसी उत्सव या त्योहार की तैयारी के साथ अनाज व दालों की छंटाई से लेकर उक्त उत्सव की रंगाई आदि का कार्य तथा नुक्कड़ नाटक का भी मंचन होता था। जब फसल पकती थी तो उससे कुछ दिन पहले ही ख्वाड़े को सजाने की तैयारियां शुरु हो जाती थीं। ख्वाड़े को ‘ज्वारी’ (मिलकर कार्य करने की प्रक्रिया) करके गोबर और मिट्टी से लीपा जाता था। यही प्रक्रिया किसी उत्सव या अन्य कार्यक्रम में भी निभाई जाती थी।
इलाके के हिसाब के खवाड़े का डिजायन
इलाके (पहाड़ी या समतल) के हिसाब तथा जमीन की उपलब्धता के कारण ख्वाड़े का आकार भी अलग- -अलग रहता था। यह कहीं गोल, कहीं चौरस तो कहीं अन्य आकार। समतल इलाके के ख्वाड़े की जमीन को समतल करना काफी आसान रहता था, लेकिन पहाड़ी इलाके के ख्वाडे की अंदर की ऊबड़– खाबड़ व पत्थरीली जमीन को समतल करने के लिए पतले सलेटनुमा पत्थर बिछाए जाते थे। इसके बाद उन्हे मिट्टी और गोबर से लीपकर समतल बनाया जाता था। समतल इलाके में अमूमन ख्वाड़े के चारों ओर दीवार का कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन पहाड़ी इलाकों में ख्वाड़े की जमीन के चारों ओर पत्थर या मिट्टी की हल्की- सी दीवार जरूर रहती थी ताकि दाना, अन्य सामान, बैल या स्वंय व्यक्ति या फिर छोटे बच्चे किसी कार्यक्रम या काम के दौरान इससे बाहर निकलकर गिर न जाएं। हिमाचल के सिरमौर में इस बाउंडरी को ‘डोल’ कहते हैं।
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हर जगह पर ख्वाड़े के लिए अलग नाम
ख्वाड़े को सिरमौर में ‘खल्याण’, सिरमौर के गिरिपार के ऊपरी इलाके में इसे ‘खलचा’ कहते हैं। खल्याण के साथ कई जगह खासकर पहाड़ी इलाके में कमरा भी साथ ही बनाया गया होता था, ताकि मौसम खराब होते ही जितनी फसल हो सके उसे इसके अंदर रखकर नुकसान से बचा जा सके। इस कमरे को सिरमौर में ‘खड़ोली’ कहा जाता है। हिमाचल के मंडी, कांगड़ा, हमीरपुर, बिलासपुर, ऊना में खलिहान को ‘ख्वाड़ा’, शिमला में ‘खलैयल़’ या ‘ख्लेओण’, किन्नौर में ‘खोलाड.’, कुल्लू में ‘खौह’ और चंबा में ‘खल़’ के नाम से पुकारा जाता है।
न गोल गोल घूमते बैल न मस्ती करते बच्चे
पकी हुई फसल को काटकर सुखाने के बाद सभी गांववाले और रिश्तेदार मिलकर खेतों से फसल को अपने सिर पर ढोकर (जब गांव में ढुलाई वाली गाडिय़ों की सुविधा नहीं थी) ख्वाड़े में लेकर आते थे। फसल के पुल्लों को तह लगाकर तथा एक-दूसरे के ऊपर बिछाकर, फिर उसके ऊपर बैलों को घुमाया जाता था। यह जहां बड़ों के लिए अपनी मेहनत की कमाई को इक्_ा करने का समय होता था, वहीं छोटे बच्चों के लिए बहुत ही मजेदार क्षण होते थे। वे इस समय बैलों के पीछे– पीछे गोल दायरे में दौड़ते– भागते, उछलते– कूदते, नाचते और लखमुंडियां (सिर के बल पलटी मारना) मारते हुए चलते जाते।
ख्वाड़े के काम में बैलों की भूमिका
बैलों और आदमी के पैरों से फसल की डालियां टूटती जाती और दाना हर डाली से निकलता रहता। एक- दो आदमी या औरतें इसे ‘कडय़ाठी’ (बांस से बनी एल आकार की छड़ी) और ‘तरयांगल’ (बांस से बना हाथ के पंजे के आकार का डंडा) की सहायता से इन टूटी डालियों को हवा में उछाल– उछालकर अलग करते जाते जिससे की निचली तह सामने निकल आए और बैल फिर उसे रौंदते हुए उनसे दाने निकालते जाएं। इस तरह से दोहराते हुए थोड़े समय के बाद जब फसल की हर डालियां टूटकर छोटे– छोटे टुकड़ों में बदल जाती तो उसे पुणकर दानों का अलग कर दिया जाता था। यह कनक के संदर्भ में रहता। धान के समय सारी प्रक्रिया ऐसी ही रहती, लेकिन उसमें डाली टूटती नहीं, बल्कि वह डाली नरम घास में बदल जाती है। जिसे ‘पराली’ कहते हैं।

हस्तकला के लिए वर्कशॉप

ख्वाड़े में फसलों का मुख्य काम तो रहता ही था, यदि गांव में कोई समस्या आन पड़ती थी तो गांव के सभी लोग (यदि और जगह कम पड़ जाए) ख्वाड़े में इक्_ा होकर उसे निपटाते थे। यही नहीं, मांजरी, बिन्ने, बैठकु आदि की बुनाई का कार्य भी महिलाएं घर के पास के ख्वाड़े में इक्_ा बैठकर करती थीं। यहां वे अपने इन कामों को निपटाती और साथ ही अपने सुख– दुख भी एक– दूसरे से साझा कर लिया करती थीं। मांजरी को बनने के लिए सबने ख्वाड़े में अपने– अपने स्थान का चयन कर वहां लकड़ी या लोहे की खूंटियां गाड़ी होती थीं।

बहुत कम रह गया खवाड़े का उपयोग

ख्वाड़ा एक ऐसा सार्वजनिक स्थल था जहां गांव का हर व्यक्ति किसी न किसी सुख या दुख में जरुर इक्_ा होता था। आज तकनीक के चलते ख्वाड़े का उपयोग बहुत कम रह गया है। बावजूद इसके ख्वाड़े को हम आज भी हिमाचल के पहाड़ी इलाकों में देख सकते हैं। अब यह अकेला- सा विराने में खड़ा रहता है। इसके चारों ओर हर मौसम में अब हरी– हरी घास उग आती है जो इसके विराने को थोड़ा कम अवश्य करती होगी। अब ख्वाड़े में वह पहले सी रौनक नहीं बची है और न ही बचे हैं इसके मध्य वे फसलों के ढेर, गोल— गोल घूमते बैलों के गले की घंटियों की मधुर आवाज, दाना पुणती औरतों के वे लोकगीत, न ही शेष है अब ख्वाड़े में गांव के छोटे बच्चों की खिलखिलाहट, उनका मासूम शोर। अब ख्वाड़ा अकेला खड़ा अपने अतीत की पहरेदारी कर रहा है। आज जब आदमी एक-दूसरे से दूर होता जा रहा है। अपने सामाजिक दायरे से कटता जा रहा है तो इस समय ‘ख्वाड़ा’ बहुत याद आ रहा है।


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