अपने प्रेमी संग गन्धर्व विवाह रचाकर सामाजिक परम्परा को चुनौती देने वाली किन्नौर घाटी की भिक्षुणी डोलमा के अमर प्रेम की मार्मिक कथा, मरकर एक हुए दो प्रेमी

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विनोद भावुक की रिपोर्ट

यह दुखांत प्रेमकथा किन्नौर घाटी के एक छोटे से गांव की युवती डोलमा के अमर प्रेम की है, जो घाटी की परम्परा के मुताबिक भिक्षुणी बन चुकी है और अब उसके लिए विवाह वर्जित है. प्रेम में वशीभूत डोलमा इस परम्परा को तोड़ कर गन्धर्व विवाह कर अपने प्रेमी तौंगकू से परिणय सूत्र में तो बंद जाती है, लेकिन एक भिक्षुणी के शादी करने के फैसले को समूची घाटी अधर्म और अनैतिक करार देते हुए डोलमा की दुश्मन बन जाती है और उसे कई प्रकार का भय दिखाया जाता है और शादी तोड़ने का दबाव बनाया जाता है. समाज के तानों से तंग आकर एक रोज डोलमा अपने प्रेमी के नाम का उच्चारण करते हुए गहरी खड्ड में छलांग लगा कर अपनी इहलीला समाप्त कर अपने प्रेम के लिए कुर्बान हो जाती है. कहा जाता है कि इस घटना के बाद तौंगकू का भी कोई अता- पता नहीं चला. बताया जाता है कि घाटी में आज भी कई लोगों को एक छाया घूमती- फिरती नजर आती है और लोकमत है कि आज भी छाया बन कर डोलमा अपने प्रेमी तौंगकू को ढूंढती है.
प्रेमी की बांसुरी पर प्रेमिका मोहित
डोलमा एक बेहद खूबसूरत कबायली युवती थी और उसकी सुन्दरता के चर्चे घाटी में दूर – दूर तक थे. डोलमा रोज अपने मवेशियों को चराने घाटी में जाती थी. उसी गांव का युवक तौंगकू भी डोलमा का हमउम्र था और अपनी अपनी बकरियां चराने घाटी की ऊँची धारों पर जाता था. वह गज़ब का बांसुरी वादक था. डोलमा जब तौंगकू की बांसुरी सुनाती तो व्याकुल हो जाती. एक बार काशंग घाटी के मेले में दोनों की मुलाक़ात हुई और पहली नजर में ही दोनों एक- दूसरे को दिल दे बैठे. फिर नियमित मुलाकातें होने लगी और प्रेम परवान चढ़ने लगा.
भिक्षुणी को शादी का प्रस्ताव
एक रोज तौंगकू ने डोलमा को बाहों में भर शादी का प्रस्ताव दिया और उसके पिता से उसका हाथ मांगने की बात की. सदा- सदा के लिए एक- दूसरे के होने की बातें डोलमा पर वज्रपात सी गिरीं. बेशक वह तौंगकू को जी- जान से चाहती थी, लेकिन वह तो घाटी की परम्परा के मुताबिक पिछले साल ही भिक्षुणी बन चुकी थी और भिक्षुणी के लिए विवाह करना वर्जित था. डोलमा जीवन के दोराहे पर खड़ी थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. तौंगकू कहता है कि अगर परम्पराएं उनके प्यार में बाधक हैं तो क्यों न दोनों किसी मंदिर में जाकर गन्धर्व विवाह रचा लें, परन्तु डोलमा इस बात का कोई उत्तर न देकर घाटी की तराई उतरकर गांव की ओर बढ़ गई.
मर कर एक हुए दो प्रेमी

इसके बाद दो प्रेमियों का मिलाना बंद हो गया, पर एक दूसरे के प्रति प्रेम गहरा होता गया. तौंगकू ने डोलमा के घर वालों को समझाने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन सामाजिक परम्परा को तोड़ने में कोई समर्थ नहीं बना. गांव में फिर से मेला लगा और मेले में फिर दोनों की मुलाक़ात हुई. दोनों ने प्रेम की राह में बाधक रूढ़ियों और परम्पराओं को कोसते हुए यह निर्णय लिया कि बेशक दुनिया दुश्मन हो जाए लेकिन वे गन्धर्व विवाह कर एक हो जायेंगे. कुछ दिनों बाद दोनों ने समाज की इच्छा के विपरीत शादी कर ली. भिक्षुणी की शादी की खबर से सारी घाटी दोनों की दुश्मन हो गई और दोनों को डराया- धमकाया जाने लगा. समाज से डर और तानों से तंग आकर तौंगकू के घर से लौटते हुए एक रोज डोलमा ने भयंकर खड्ड में कूद कर जान दे दी और तौंगकू भी रहस्यमयी ढंग से लापता हो गया. फेयर ब्रदर्स एंड कंपनी जालंधर से प्रकाशित वरिष्ठ साहित्यकार डॉ गौतम व्यथित की साल 2003 में प्रकाशित पुस्तक ‘चौपाल- हिमाचल की प्रेम एवं बलिदान संबंधी कहानियां’ में इस अमर दुखांत प्रेमकथा को शामिल किया गया है.

(फोटो प्रतीकात्मक)


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