हिमाचल की रानियों ने ही किया देश की राजधानी तक का सफर, अभी तक लोकसभा में पहुंची प्रदेश की केवल तीन महिलाए, दो रानियां केंद्रीय मंत्री बनने में भी कामयाब रहीं

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बेटी पढाओ, बेटी बचाओ पर लोकसभा का कभी चुनाव में मत लडवाओ,महिलाओं को संसद में भेजने के लिए बंद हैं शिमला और हमीरपुर के दरवाजे

अभी तक लोकसभा में पहुंची प्रदेश की केवल तीन महिलाए, दो रानियां केंद्रीय मंत्री बनने में भी कामयाब रहीं

वरिष्ठ पत्रकार पौमिला ठाकुर की रिपोर्ट

बेशक पहाड़ सारक्षता के क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचने की उपलब्धि पर इतरा रहा हो। बेटियां जीवन के हर क्षेत्र में बेटों के बराबर होती दिंख रहीं हैं। बेटियो को सशक्त करने के लिए कई योजनाओं की कामयाबी पर प्रशासन की पीठ थपथपाई जा रही हो। राजनीतिक पाटियों में महिलाओं के बढ़ते दखल के चलते अलग से महिला संगठन खड़े किए गए हैं, लेकिन बात अगर देश की राजधानी में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने की हो तो प्रदेश का राजनीति इतिहास इस बात की गवाही देता है कि अभी तक तो सिर्फ हिमाचल की रानियों ने ही राजधानी का सफर किया है। रानियां भी कांगड़ा और मंडी के ही सियासी दुर्ग जीत पाईं, शिमला और हमीरपुर के दरवाजे उनके लिए भी बंद ही रहे।

संगठनों की नहीं महलों की हुकूमत

रानियों के संसद में पहुचने की बड़ी वजह यह है कि उनकी जीत के लिए रेड कार्पेट उनके शाही घरानों ने बिछाए और राजघरानों के प्रभाव उनकी जीत में काम आए। पटियाला की रानी अमृतकौर, कांगड़ा की रानी चंदेश कुमारी और बुशैहर की रानी प्रतिभा सिंह लोकसभा के रास्ते संसद में पहुंचीं। तीन रानियों में से दो रानियां केंद्रीय मंत्री बनने में भी कामयाब रहीं, पर संगठन के रास्ते आम घर की किसी महिला कार्यकर्ता को राजनीतिक पार्टियो ने लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी के काबिल ही नहीं समझा है।

बजीर के रोल में दो रानियां

खैर ,1952 में हुए देश के पहले आम चुनाव में मंडी लोकसभा सीट से कांग्रेस की उम्मीदवार रानी अमृतकौर जीत कर संसद में पहुंची और जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में बनी स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में हैल्थ मिनिस्टर बनीं। इसके 32 साल बाद कांगड़ा राज घराने की रानी चंंद्रेश कुमारी कांगड़ा से कांग्रेस के टिकट पर जीत कर लोकसभा में पहुंची। चंद्रेश कुमारी दूसरी बार 2009 में लोकसभा के लिए चुनी गईं, लेकिन इस बार वे अपने मायके जोधपुर से सांसद बनीं और मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय संस्कति मंत्री रहीं। प्रतिभा सिंह 2004 में मंडी से कांग्रेस के टिकट पर जीत कर पहली बार संसद में पहुंची। दूसरी बार 2013 में उपचुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीत कर दिल्ली पहुंची।

जरा यह भी पढ़ लीजिए

बराबरी का हक तो दूर की बात, राजनीतिक दल महिलाओं को प्रतिनिधित्व में बराबरी का हक देना तो दूर 33 प्रतिशत देने को राजी नहीं। सिक्कम में जरूर महिलाओं को राजनीति में 33 प्रतिशत भारीदारी देने की एक अच्छी पहल हुई है,लेकिन अभी तक महिला बिल पारित होने की राह लम्बी दिखती है। महिला बेशक परिवार की धुरी हो, लेकिन बात अगर राजनीतिक शक्ति की हो तो महिला को हाशिये पर धकेलने की पुरजोर कोशिश हुई है।


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