गुलेर राज परिवार क़ी कुलदेवी है माता बगुलामुखी,  शत्रुओं का करती हैं मां बगलामुखी नाश; जानिए इतिहास

Spread the love

ज्वाली से सुरेश कौंडल क़ी रिपोर्ट

देव भूमि हिमाचल प्रदेश के ज़िला काँगड़ा की ज्वाली विधानसभा में मंडी- पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग-154 पर देहर खड्ड के किनारे बसा एक ऐतिहासिक कस्बा कोटला जहां हरी भरी वादियों और मनोरम प्राकृतिक परिदृश्यों के बीच स्थित है सदियों पुराना मां भगवती बगलामुखी का प्राचीन मंदिर, जो अपने भव्य स्वरूप और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के कारण विश्व विख्यात है ।
शत्रुओं का नाश करती बगलामुखी
व्युत्पत्तिशास्त्र के अनुसार बगुलामुखी शब्द दो शब्दों के मेल से बना है बगल और मुख बगल के अर्थ है लगाम और मुख अर्थात चेहरा अतः बगुलामुखी शब्द का अर्थ हुआ ‘एक चेहरा जो शासन की शक्ति है’। तंत्र शास्त्र दस महाविद्याओं के वर्णन से सजा है. उनमें से प्रमुख हैं मां बगलामुखी. मां भगवती बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है । ऐसा माना जाता है बगलामुखी देवी शत्रुनाशिनी और सिद्धिदात्री है जो अपने भक्तों के मार्ग में आने वाली रुकावटों और बाधाओं का नाश करती और शत्रुओं पर विजय दिलवाती है। उत्तर भारत में इन्हें पितम्बारा माँ के नाम से भी बुलाया जाता है।
देवी क़े संदर्भ में प्रचलित कथा
देवी बगलामुखी जी के संदर्भ में एक कथा बहुत प्रचलित है, जिसके अनुसार एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच जाता है और अनेकों लोक संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया. यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए.इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे तब भगवान शिव उनसे कहते हैं कि शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएँ, तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुँच कर कठोर तप करते हैं. भगवान विष्णु ने तप करके महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया. देवी शक्ति उनकी साधना से प्रसन्न हुई और सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीडा करती महापीत देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ।उस समय चतुर्दशी की रात्रि को देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई, त्र्येलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी नें प्रसन्न हो कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रूक सका.
No photo description available.
विजय पाने क़े लिए मां क़ी पूजा
देवी बगलामुखी को बीर रति भी कहा जाता है, क्योंकि देवी स्वम ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं. इनके शिव को एकवक्त्र महारुद्र कहा जाता है, इसी लिए देवी सिद्ध विद्या हैं. तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं, गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं। पहले रावण और उसके बाद लंका पर जीत के लिए श्रीराम ने शत्रुनाशिनी मां बगला की पूजा की और विजय पाई , कालांतर पांडवों ने भी अज्ञातवास के दौरान मां बगुलामुखी की पूजा अर्चना की थी ताकि वो कौरवों पर विजय प्राप्त कर पाएं। मां बगुलामुखी को पीतांबरी भी कहा जाता है। इस कारण मां के वस्त्र, प्रसाद, मौली और आसन से लेकर हर कुछ पीला ही होता है। युद्ध हो या राजनीति या फिर कोर्ट-कचहरी के विवाद, मां के मंदिर में यज्ञ कर हर कोई मन वांछित फल पाता है।
गुलेर क़े राजा क़ी कुलदेवी
कांगड़ा के निकट कोटला के प्राचीन किले के द्वार पर बगलामुखी का मंदिर स्थित है, जो कस्बा कोटला के बिल्कुल पास एक सुंदर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है । दो उपनदियों के संगम स्थल पर स्थित होने के कारण यह पहाड़ी पानी से घिरी हुई प्रतीत होती है । कहा जाता है यह किला पन्द्रह सौ साल से भी पुराना है किले के द्वार पर बना मन्दिर किले से भी पुराना है यहां विराज मान देवी बगुलामुखी गुलेर के राजा की कुल देवी हैं. यहां वो अपने पुरोहितों के साथ पूजा अर्चना करने आते थे. उन्होंने ही इस मंदिर की सुरक्षा और अपने रहने के लिए किले का निर्माण करवाया था । ये देवी खन्ना, मेहरा, खत्री, सेठ, गुलेरिया, चोपड़ा, कपूर, अरोड़ा सहित भाट ब्राह्मण परिवारों की भी कुलदेवी है।
उत्तर क़ी ओर भगवती का मुख
वर्तमान समय में मन्दिर में राजीव शक्ति, असीम सागर और अमन शर्मा पुजारी के तौर पर भगवती बगलामुखी की सेवा कर रहे हैं। पुजारी असीम सागर के अनुसार इस मंदिर में माँ भगवती का मुख उत्तर की ओर स्थित है । जैसा स्वरूप पांडुलिपियों में मां भगवती का वर्णित है वैसा ही स्वरूप का आज भी इस मंदिर में विराजमान है। मां भगवती के भक्त भारत के कोने कोने से यहां पर अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर आते हैं। यहां तक कि विदेशी मेहमान भी मन्दिर की भव्यता और प्राकतिक सौंदर्य का नज़ारा लेने यहां आते रहते हैं । अकसर विदेशी पर्यटकों को यहां माता के मन्दिर में भजनों और गीतों पर झूमते देखा जा सकता है ।उन्होंने बताया कि पीतांबरा भगवती बगलामुखी के इस शक्तिपीठ पर बड़े-बड़े राजनेता और उद्योगपतियों के अतिरिक्त विदेशों से भी भक्त इस आस्था के मंदिर में अपना शीश नवा चुके हैं। इस शक्तिपीठ में बड़े-बड़े अनुष्ठान विद्वान ब्राह्मणों द्वारा वैदिक और तंत्रोक्त विधि द्वारा किए जाते हैं ।
घने जंगल से घिरा शक्तिपीठ
बगलामुखी शक्तिपीठ चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ है। मंदिर मार्ग पर कुछ कदम की दूरी पर एक प्राचीन किले के खंडहर हैं । इस किले में राजाओं के जमाने की बनी जेलों के अवशेष आज भी विद्यमान हैं। जहां पर राजा महाराजा अपने कैदियों को रखते थे। इस किले में भगवान गणेश का एक प्राचीन मंदिर भी है । इस मंदिर की नकाशकारी और चित्रकारी आज भी मौजूद है, जो देखने में बहुत भव्य है।
पहाड़ी पर स्थित है मंदिर
कोटला बाजार से मन्दिर तक पहुंचने के लिए पैदल रास्ता तय करना पड़ता है । एक विशाल मैदान को पार करने के उपरांत रास्ते में पड़ती खड्ड को पुल की सहायता से पार करके प्राचीन शैली से बनी सीढ़ियों वाले मार्ग से पहाड़ी पर चढ़ने के रोमांचकारी सफर शुरू होता है । जैसे जैसे ऊपर की ओर बढ़ते जाते हैं एक अलौकिक ऊर्जा का आभास होता है जैसे जैसे कदम बढ़ते जाते हैं वहां आस पास का नज़ारा भी बदलता जाता है और रोमांच बढ़ता जाता है । मन्दिर द्वार पर पहुंचने पर एक अलौकिक नज़ारा देखने को मिलता है । कोटला परिक्षेत्र का विहंगम दृश्य मनमोह लेता है । ऊंचे पहाड़ और नीचे सुंदर मैदान के पास से बहती देहर नदी के जल की कल कल करती ध्वनि एक सुरम्य वातावरण का आभास करवाती है ।
कोटला किले क़े खंडहर
मन्दिर में महामाई के विहंगम और अलौकिक स्वरूप को देखने के पश्चात कुछ समय विश्राम कर के प्राचीन समय में निर्मित किले का अवलोकन हमे अतीत के परिदृश्य का चित्रण करता है । खंडहर होती किले की दीवार अपने काल की पुरानी यादों के रहस्य को दबाए निश्चल खड़ी हैं जो अपने अंदर के अनसुलझे सवाल दबाए हुए हैं । किले में स्थित जेलों के अवशेष उस समय में कैदियों को दी जाने वाली यातनाओं की गवाह हैं । कोटला किले की भौतिक संरचना भी इसको अभेद्य बनाती है । सच में कोटला के माता भगवती बगलामुखी मन्दिर के दर्शन अलौकिकता और रोमांच दोनों का संगम है।
जयंती पर हवन का विशेष महत्व
कहा जाता है यहां मां भगवती के दर्शन मात्र से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं । मां अपने भक्तों को निराश नही करती और ना ही खाली हाथ मोड़ती हैं। वर्ष भर इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है । परन्तु बगुलामुखी जयंती वाले दिन का विशेष महत्व है । मान्यता है कि जयंती वाले दिन मां बगलामुखी के मंदिर में हवन करवाने का विशेष महत्व है जिससे कष्टों का निवारण होने के साथ-साथ शत्रु भय से भी मुक्ति मिलती है। जयंती के दिन माता बगलामुखी के दरबार में हवन-यज्ञ और पूजा पाठ करने से सर्व मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और कष्टों से छुटकारा मिलता है।
मौका मिले तो जरूर लें आशीर्वाद

इस प्रसिद्ध शक्तिपीठ बगलामुखी कोटला में मई माह में माता की जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है जयंती के शुभ अवसर पर मंत्रोच्चारण के साथ हवन-यज्ञ किया जाता है। इस दौरान भंडारे का भी आयोजन किया जाता है । जब भी कभी पठानकोट से मंडी राष्रीय राजमार्ग से जाने का कार्यक्रम बने तो ज्वाली उपमंडल में बसे इस सुंदर कस्बे कोटला में स्थित इस प्राचीन शक्तिपीठ का दर्शन जरूर करें । यकीनन मां भगवती के अलौकिक रूप के दर्शन मात्र से आपके कष्टों का निवारण होगा ।साथ में गांव कोटला का प्राकृतिक सौंदर्य आपको भावविभोर कर देगा ।


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *