केरल के डॉक्टर ने मनाली में खेती से हासिल किया मुकाम, अब विदेशी भी करते हैं इस फार्महाउस में काम

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रूस में पढऩे के बावजूद प्रोफेशन की जगह पैशन को प्राथमिकता देने वाले बाबू सागर की कामयाबी की प्रेरक कथा

मनाली से विनोद भावुक की रिपोर्ट

डॉक्टरों के परिवार से संबंध रखने वाले केरल के बाबू सागर ने जब रूस से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने शौक को जिंदा रखने के लिए मनाली जाकर किसान बनने का फैसला लिया था तो कई अपनों ने ही उसे पागल करार दे दिया था। परिजनों के प्रखर विरोध के बावजूद बाबू ने अपने करियर के बजाये अपने सपने के साथ जीने का फैसला किया और अपने सपनों में मेहनत के ऐसे रंग भरे कि आज वही लोग उसे सफल आदमी कहते हैं। आज बाबू न केवल मनाली के वशिष्ठ में न केवल एक फार्महाउस का मालिक है, बल्कि एक रेस्टारेंट भी चला रहा है। पहाड़ के सम्मोहन में बंधे केरल के युवा बाबू की कामयाबी की यह प्रेरक कथा में रोंमाच और साहस की खूशबू शामिल है।

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केरल से बाइक पर लद्दाख पहुुंच गया किशोर
1990 के दशक में केरल के कोझिकोड में जिला के कोइलांडी गांव के किशोर बाबू सागर को एक पर्यटन पत्रिका से लद्दाख की यात्रा के रोमांच को पढ़ऩे का अवसर मिला। लद्दाख ने उस किशोर को कुछ इस तरह से अपने मोहपाश में बांध लिया कि बाइक से लद्दाख पहुंचने की ठान की। यह वह दौर था जब सूचना क्रांति अभी अपने शैशवकाल में थी और लद्दाख तक बाइकिंग करना बेहद चुनौती वाला टॉस्क था, लेकिन धुन के पक्के किशोर ने केरल से लद्दाख की राइड कर अपने परिजनों को हैरत में डाल दिया।
विदेश में पढ़ाई, पहाड़ से प्यार
लद्दाख और राइडिंग के लिए अब उसके दिल में जुनून पैदा हो चुका था। बंगलुरू में कॉलेज के दौरन एक बार फिर से बाबू सागर अपने आरएक्स 100 बाइक से लद्दाख की राइड पर निकला। बाबू पर जहां पहाड़ों ने जादू कर दिया था, वहीं दूसरी ओर उसके परिजन चाहते थे कि वह पारिवारिक परम्परा को कायम रखते हुए डॉक्टरी की पढ़ाई करे। जब बाबू वापिस अपने घर पहुंचा तो परिजनों ने चिकित्सक की पढ़ाई करने के लिए रूस भेज दिया, लेकिन विदेश में पढ़ाई भी पहाड़ों के प्रति बाबू के प्रेम की राह का रोड़ा नहीं बन पाई।
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मौसम खराब और फार्महाउस की रात
सेंट पीटर्सबर्ग में आठ साल तक पढ़ाई की लेकिन इस दौरान भी बाबू अपने परिजनों को बताए बिना कई बार रूस से सीधे कुल्लू, मनाली की ओर निकल आता। ऐसे ही एक बार जब वह परिजनों को सूचित किए हिमाचल में घूमने निकला तो खराब मौसम के चलते वशिष्ठ के एक फार्महाउस में कुछ दिन रहना पड़ा। इस फार्महाउस में रहते हुए बाबू को जीवन के असली आंनद का आभास हुआ। अब वह लम्बे अर्से के लिए यहां रहने की योजना पर विचार कर चुका थे।
रेस्टोरेंट से शुरूआत, फिर खेती में आजमाया हाथ
बाबू के परिवार के अधिकतर सदस्य डॉक्टर हैं और वे चाहते थे कि वह भी चिकित्सा के पेशे में अपना करियर बनाए। परिवार के तमाम विरोध के बीच डॉक्टरी की पढ़ाई करने के बावजूद बाबू ने अपने शौक को जिंदा रखने के लिए किसान बनने का फैसला किया। वह मनाली आ गया। बाबू ने ‘बाबुशका’ (बाबुशका का अर्थ है रूसी में दादी) नाम से एक छोटा रेस्टोरेंट खोला, लेकिन वह हर पल यहां खेती करने के बार में सेाच रहे थे। कुछ सालों बाद बाबू ने उसी फार्म हाउस जहां कभी वे ठहरे थे, में से कुछ खेत खरीद कर अपने किसान बनने के सपने को पूरा कर दिखाया। किसान बना बाबू रेस्तरां भी चला रहा है।
गोबर का प्रयोग, जैविक उत्पाद
बाबू ने अपने फार्महास में पूरी तरह से जैविक सब्जियों का उत्पाद शुरू किया। अब वह यहा कई प्रकार की सब्जियां उगाता हैं। उनके फार्म में कई तरह के फल भी होते हैं। फार्महाउस में घोड़ों सहित कई मवेशी हैं। वे अपने खेतों में खाद के तौर पर सिर्फ गाय के गोबर का प्रयाग करता है। घास के बदले स्थानीय गांव वाले भी फार्महाउस के लिए गोबर खाद उपलब्ध हो जाती है। बाबू के फार्महाउस में 13 नेपाली मजदूर सब्जी, फल और दूध उत्पादन का काम करते हैं।
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विदेशी करते हैं खेतों में काम
‘बाबुशका परमकल्चर फार्महाउस’ बाबू का शौक है। उसने इस पर खासा ध्यान दिया। यही कारण है कि यहां घूमने आने वाले देसी विदेशी पर्यटक यहां पहुंचने लगे और फार्महाउस में भी हाथ बंटाना शुरू कर दिया। बाबू का कहना है कि जब तक वे मेरे साथ काम करना चाहते हैं, तब तक वे यहां रह सकते हैं। बदले में उन्हें एक निश्चित राशि का भुगतान करना होता है। हर साल यहां कई विदेशी ठहरते हैं, जो खेत में काम भी करते हैं और अच्छा भुगतान भी करते हैं। बाबू मलयाली टूरिस्टों के लिए यहां मुफ्त रहने और भोजन की व्यवस्था करते हैं।

मलयाली में साइन बोर्ड

बाबू ने फार्महाउस में बने अपने कुटीर में ‘केरिवाडा मक्कले’ (आओ, बच्चों) का मलयाली में साइनबोर्ड लगा रहा है। बाबू का फार्महाउस यहां आने वाले पर्यटकों के लिए जो पैकेज प्रदान करता है उसमें योग कक्षाएं, ट्रेकिंग, खाना पकाना और खेती करना आदि शामिल है। इन दिनों बाबू अपने फार्महाउस में बांस झोपडियों और कृत्रिम गुफाओं का निर्माण कर अपने कॉटेज के विस्तार में व्यस्त है। अपने सपनों के रास्ते चल कर लीक से हट कर खुद का मुकाम बनाने वाला बाबू सच में एक यात्री, दार्शनिक और दयालु व्यक्ति है।


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