जहरमुक्त आनाज उगाने क़ी राह बना रही इंदिरा राणा, कई महिलाएं भी दे रहीं साथ

Spread the love

जहरमुक्त आनाज उगाने क़ी राह बनाने वाली इंदिरा राणा क़ी प्रेरककथा, कई महिलाओं को दिखाई प्राकृतिक खेती क़ी राह.

जैसा कि इंदिरा राणा ने फोकस हिमाचल को बताया

पद्मश्री सुभाष पालेकर द्वारा चलाई गई मुहिम प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण प्राप्त करके गाांवों में मिसाल कायम करना कोई आसान कार्य नही था। जब प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लेकर मैं घर आई और घरवालों को इस बारे में बताया तो एक दम से सब ने मुझे डांट दिया. उनका कहना था कि बिना खाद के फसल नही उगाई जा सकती.मेरी बातों पर सब हंसने लगे. लेकिन मेरे मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा था. मै अपने परिवर को रसायनयुक्त अनाज से लगी बीमारियों से बचाना चाहती थी. मैंने अपने ससुर जी को बोला कि जितना अनाज खेतों में होता है आप उसके पैसे ले लो, लेकिन मुझे कुछ खेत बीजने को दे दो. अगर फसल अच्छी नही होगी तो मै अगली बार कोई जिद नही करूंगी.
मेरे आग्रह को वे मान गए और 2 बीघा जमीन मुझे बीजने को दे दी. मैंने उन खेतो में गेहूं , चने क़े साथ मटर लगाया . इस को मैने बिल्कुल प्राकृतिक तरीके से किया. इसमें जीवामृत घनजीवामृत का प्रयोग किया. फसल में पीलापन आने लगा तो मैने खट्टी लस्सी का छिड़काव कर दिया. कीट दिखे तो दरेकास्र का छिड़काव समय समय पर कर दिया. जब फसल तैयार हो गई तो सब की नजर मेरे खेतों पर थी. फसल का रंग बिल्कुल प्राकृतिक था इसमें जो हरियाली आई थी वो देखने लायक थी. मेरे खेत उस वक्त आकर्षण का केंद्र बन गए. सच बोल बोलूं तो कहीं न कहीं मुझे भी एक भय था कि बिना रसायन ओर गोबर की खाद डाले मेरी फसल उगेगी भी की नही, लेकिन, शानदार रिजल्ट सामने आए. मेरी फसल बहुत अच्छी हुई थी.
फिर मेने बहुत सी औरतों को अपने साथ जोड़ा जो प्राकृतिक खेती करके घर बैठे पैसे कमा रही है. अब मैं पांच बीघा में प्राकृतिक खेती कर रही हूं. मैने गेहूं की वंशी किस्म लगाई थी. जब सब के खेतों में पीला रतुआ आया और फसल खराब हो गई, उस समय केवल मेरे खेत मे गेहूं लहलहा रही थी. क्योंकि जीवामृत ने पिला रतुआ आने ही नही दिया. इसके लिए मै जोगिंदरनगर के द्रंग ब्लॉक के आत्मा प्रोजेक्ट क़े अधिकारियों का धन्यवाद करना चाहूंगी जिन्होंने समय समय पर आकर मेरा मार्गदर्शन किया.
प्राकृतिक खेती करना इतना आसान भी नही है. बीज को बीजने से पहले बीजामृत से उपचारित किया जाता है. जहां पानी नही लगता कभी कभी बारिश होती है, वहां आच्छादन करना पड़ता है जिससे नमी बनी रहती है.जो भी फसल बीजनी है उसमें सह फसल लेनी पड़ेगी, ताकि नाइट्रोजन की कमी पूरी हो सके. फसल अच्छी हो इसके लिए बीज को लाइनों में लगाया जाता है.जो भी खाद बनाई जाएगी उसे देशी गाय के गोबर और गोमूत्र से ही बनाया जाएगा.

इसमें किसी भी खरपतवार दवाई का प्रयोग नही किया जाता. तो जो भी खरपतवार होता है उसे हाथ के द्वारा ही निकाला जाता है . इक्कीस – इक्कीस दिन के बाद जीवामृत का छिड़काव करना पड़ता है. प्राकृतिक खेती का मतलब शून्य लागत अधिक उपज, उच्च गुणवत्ता, स्वस्थ पर्यावरण कृषि कर्ज चिन्तामुक्त खेती. इसके साथ साथ किसान बागवान को खुशहाल ओर स्वालम्बी बनाने वाली खेती ही सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती है ।


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *