हिमाचल : यहां मां के दर्शन मात्र से पूर्ण होती हैं कई मनोकामनाएं

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

खूबसूरत प्रकृति से ओतप्रोत गढ़ माता पर्यटन स्थल
चंबा से उत्तम सूर्यवंशी क़ी रिपोर्ट
हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत जिलों में शुमार चम्बा जिला अपनी प्रकृतिक खूबसूरती एवं धार्मिक स्थलों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। जहाँ हर ओर बिखरी प्रकृतिक छटा लाखों सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती है वहीं धार्मिक श्रद्धा भी लाखों लोगों को यहाँ खींच कर लाती है। मणिमहेश, जिले में कई ऐसे प्रकृतिक खूबसूरत मनमोहक स्थल मौजूद हैं और इसी तरह कई ऐसे धार्मिक स्थल मौजूद हैं जो कहीं ना कहीं से इतिहास समेटे हुए हैं। जो देखने वालों का मन मोह लेते हैं। इन्ही में से एक है गढ़ माता जो प्रकृति भी समेटे हुए हैं और धार्मिकता भी और इतिहास भी जिसका वर्णन इस प्रकार से है।
धार्मिक एवं श्रद्धा की दृष्टि से गढ़ माता:
जिला चम्बा के उपमंडल सलूणी की किहार भांदल तेलका घाटी की सुंदर पहाड़ियों के ऊपर चामुंडा माँ का एक भव्य दरवार है। जहां पर हजारों लोग प्रत्येक वर्ष माँ के दर्शन कर अपनी मन्नतों को पूरा करते हैं। यह मंदिर चम्बा रियासत के राजा पृथ्वी सिंह द्वारा पृथल जोत पर बनवाया गया है। कहते हैं कि राजा पृथ्वी सिंह किसी दूसरी रियासत में बंधी थे। तब माँ ने स्वप्न में प्रकट हो कर कहा कि राजा अगर आप गढ़ नाम स्थान पर मेरा मंदिर स्थापित कर दोगे तो मैं किसी भी तरह से आपको यहां से रिहा करवा दूंगी। राजा ने हामी भर दी तब राजा की नींद खुली तो देखा जेल के दरवाजे खुले पड़े थे और सभी रक्षक सोए हुए थे । तब राजा वहां से चुपके से निकल आये और सीधा चम्बा की बजाये माता के कहे अनुसार उपमंडल सलूणी की पहाड़ियों पर पहुंच गए । जब राजा रात रात को एक स्थान पर रुके तो अचानक आसमान में जोरदार गर्जना के साथ आसमानी बिजली एक शिला पर गिरी और शिला फट गई उसमें से माता ने राजा को दर्शन दिए और फिर त्रिशूल रूप में विराजमान हो गई। तब से यहाँ का नाम स्थानीय भाषा में (चोंडी की घोड़ी ) चामुंडा का पत्थर पड़ा। और जिस स्थान पर राजा ने डेरा डाला हुआ था उस स्थान को राजा का डेरा नाम से जाना जाता है। इसके बाद राजा ने समस्त चम्बा की जनता को बुला कर यहाँ एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। समय के साथ-साथ वह मंदिर तो नहीं रहा । लेकिन आस्था में कोई कमी नहीं आई अभी इसका निर्माण नए सिरे से किया गया है। यहाँ पर प्रतिवर्ष अश्वनी माह की संक्रांति सैर, (सितंबर 15,16 ) को जम्मू और हिमाचल के लोग मिलकर एक जातर मेले का आयोजन करते हैं । जिसमे हजारों की संख्या में लोग पहुँचते हैं। जिसमे लोग ढोल नगाड़ों के साथ पहुँचते हैं। लोग अपनी तैयार मक्की की फसल को पहले माँ को संमर्पित करते हैं उसके बाद उसका सेवन करते हैं। अपनी-अपनी श्रद्धा अनुसार पूजा अर्चना करके मन्नतों को पूरा करते हैं।
मेले का आकर्षण:
मेले का मुख्य आकर्षण माता के गुर हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में चेले चेलियां कहा जाता है। उनका विशेष तरह से नाचना जिसे कमना कहते हैं होता है । जो सैकड़ों की तादाद में इकट्ठे हो कर यह विशेष निर्त्य करते हैं । मान्यता है कि तब इनके भीतर माता का प्रवेश होता है। और इसके अलावा चम्बा का प्रसिद्ध घुरही निर्त्य चुराही नाटी का भी इस मेले में आयोजन किया जाता है। जो मेले का आकर्षण का केंद्र है।
इस मेले में हजारों अस्थाई दुकानें एवं होटल लगते हैं जिसमे लाखों का व्यापार होता है।
प्रमुख एवं आकर्षक स्थान
यूँ तो यह समस्त क्षेत्र अपनी प्रकृतिक सुंदरता से ओतप्रोत है यहाँ आकर सारी थकान दूर हो जाती है इसकी सुंदरता मन को आकर्षित कर जाती है, मानो इन्सान जन्नत में पहुंच गया हो। जिस भी रास्ते से गुजरो हर ओर प्रकृति की अद्धभुत छटा बिखरी हुई मन को सुकून पहुंचाती है। सलूणी से किलोड़ रोड़ पर प्रवेश करते ही देवगाह की खूबसूरत देवदार के घने जंगल और त्रिन्युन्द माता की छोटी-छोटी पहाड़ियां बहुत आकर्षक और सुंदर हैं।
तेलका सड़क से प्रवेश पर छोटे -छोटे नाले और झरने मन को हर लेते हैं। इसी प्रकार डिभरी धार, सयूनी धार, टापरू झील, चोंडी की घोड़ी राजे रा डेरा, गढ़ माता मंदिर और झील और चली स्थान पर शिव मंदिर यह सारे स्थान गढ़ माता रास्ते में मौजूद हैं जो बेहद खूबसूरत हैं। गढ़ माता मे पहुंच कर प्रसिद्ध पर्यटन स्थल डलहौजी खज्जियार , ड़ेनकुण्ड , गोबिंद सागर बांध, पंजाब ,जम्मू के कुछ क्षेत्रों को निहारा जा सकता है। गढ़ माता समुद्र तल से 9500 मीटर ऊंचाई पर स्थित है।
गढ़ माता कैसे पहुँचे:
प्रकृति से सुशोभित यह स्थल बेहद खूबसूरत है यह स्थल जम्मू कश्मीर हिमाचल सीमा पर स्थित है जो जम्मू के जिला कठुआ और तहसील बसोली और हिमाचल के जिला चम्बा तहसील सलूणी की सीमा मे पड़ता है। डलहौजी से 83 और चम्बा से 58 किलोमीटर सड़क का रास्ता है जहाँ गाड़ी द्वारा पहुंचा जा सकता है। सलूणी से , तेलका से ,किहार से गढ़ माता पहुंच जा सकता है। तेलका सड़क से चिहु की गली नामक स्थान से पैदल 7 किलोमीटर का , किलोड़ सड़क से 8 किलोमीटर का और किहार सड़क से 10 किलोमीटर का पैदल रास्ता है।
गढ़ माता कब आएं
वैसे तो यहाँ जनवरी फरवरी महीने को छोड़ कर पूरे साल भर आया जा सकता है क्योंकि यहाँ पर बहुत बर्फवारी होती है जिसकारण सर्दी के दौरान यहाँ पर पहुंचना मुशिकल होता है, इसके इलावा बरसात के मौसम मे भी यहाँ आने से यहाँ के प्रकृतिक नजारों को नहीं निहारा जा सकता क्योंकि बरसात के मौसम में ज्यादातर यहाँ पर धुंध पड़ती है। इसलिए मार्च से जुलाई तक और सितंबर से दिसंबर तक यहाँ के प्रकृतिक नजारों को निहारा जा सकता है।
गढ़ माता से दूरी
गगल हवाई अड्डा- 171 किलोमीटर
चम्बा-58 किलोमीटर
डलहौजी -83 किलोमीटर
शिमला- 413 किलोमीटर
पठानकोट- 148 किलोमीटर
भलेई मंदिर – 45
तलेरू वोटिंग साइड – 48
पधरी जोत -45 किलोमीटर
साच पास -120 किलोमीटर
वन्य प्राणी
पक्षी : मोनाल, निलगर , फुलगर कलेसा, कला तीतर जंगली मुर्गा और खखरोला
जंतु: कस्तूरा, घोरल, पिज, रीछ ,काला भालू, तेंदुआ , शेर, कक्कड़, औंस, करथ, जंगली बिल्ला, लंगूर , वानर
आदि कई वन्य पक्षी और जंतु यहाँ के जंगलों में पाए जाते हैं।
औषदि और वनस्पति
पंजा, सालन मिश्री, कुठानबेल, वन लहसुन , वन हल्दी , वन अजवायन, अतीस, कोड, गुच्ची, जंगली मशरूम, नाग बुटी, कुठ, चुकरी, ब्राह्मी, सेन्सपोड आदि कई महत्पूर्ण जड़ी बूटियां यहाँ के जंगलों में पाई जाती हैं।
कहाँ ठहरें
हाल में ही सरकार द्वारा इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के लिए मान्यता दी है इसी कारण यहाँ पर अभी तक सड़क निर्माण नहीं हुआ है और न ही यहाँ कोई होटल स्थापित हुए हैं। फिर भी जब भी आएं तो सलूणी में PWD का विश्राम गृह सलूणी , फारेस्ट विश्राम गृह किलोड़, PWD विश्राम गृह किहार, भांदल व सोनी गेस्ट हाउस जुवांस मे ठहर सकते हैं।
समस्याएं
समुद्र तल से 9500 की लगभग ऊंचाई पर स्थित होने के कारण गढ़ माता मे जब भी आएं मौसम को देख कर ही आएं अपने साथ खाने पीने की कपड़ों की व्यवस्था दवाइयों की व्यवस्था और पानी की व्यवस्था जरूर रखें।
अचानक मौसम खराब होने से ठंड बढ़ जाती है।
पानी की किल्लत है कोई भी दुकान होटल आदि नहीं है।
सरकार , प्रशासन, स्थानीय पंचायते और क्षेत्र के लोग गढ़ माता को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के लिए
अपने-अपने स्तर पर पुरजोर लगा रहे हैं। सुविधाओं को बढ़ाने के लिए कार्य हो रहे हैं। पर्यटक भी इस और धीरे-धीरे रूख कर रहे हैं। अगर सभी के प्रयास सफल होते हैं तो यहाँ के लोगों को घर द्वार पर रोजगार के साधन तो उपलब्ध होंगे ही साथ में सरकार को भी इसका काफी लाभ मिलेगा।
इस स्थल को अगर सही तरीके से पर्यटकों के लिए निखारा गया तो यह अवश्य विश्व मानचित्र पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाएगा। जो सैलानियों की पहली पसंद बन कर उभरेगा।
-उत्तम सुर्यवंशी सलूणी
मोबाइल नंबर 82787-20739


Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *