हिमाचल : बेटियों की रक्षक बनी सैन्य अफसर की बेटी एवं पुलिस अफसर की बीबी

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लाडली रक्षक’ संस्था के जरिये सामाजिक- आर्थिक बदलाव की प्रेरककथा की नायिका रेखा जम्वाल
ऊना से विनोद भावुक की रिपोर्ट
ऊना जिला में काम कर रही ‘लाडली रक्षकÓ संस्था से जुड़ी महिलाएं कोविड काल में शुद्ध मसाले, आचार, सब्जी के थैले, शहद, बी-वैक्स, हर्बल नीम, तुलसी साबुन, हॉर्लिक्स जैसे कई उत्पाद घर में बनाने में भी जुटी हैं। इन उत्पादों को महिलाओं के जरिये उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाएगा, ताकि जरूरतमंद बेरोजगार महिलाओं को रोजगार मिल सके। इस संस्था ने जिला की कई गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मोमबत्ती, दीये व फूलों की वरमाला बनाने का प्रशिक्षण दिलवाया है। साल 2018 से पंजाब से सटे हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला में सामाजिक- आर्थिक बदलाव के लिए काम कर रही ‘लाडली रक्षकÓ संस्था की सोच सैन्य पृष्ठभूमि वाले परिवार की बेटी एवं पुलिस अधिकारी पति की पत्नी रेखा जम्वाल की है।
दादी से मिला पोती को हुनर
रेखा जम्वाल का जन्म 18 जनवरी 1979 को हमीरपुर के भोरंज में हुआ।
पिता प्यार चन्द सेना में ऑफिसर रहे हैं जब कि माता सुषमा ठाकुर गृहणी हैं। रेखा का एक छोटा भाई है। पड़दादा रण सिंह, दादा नारायण दास, नाना पिता, चाचा, मामा व भाई सहित अधिकतर परिजन सेना में रहे हैं। अनुशासन, मर्यादा व कड़े नियमों वाले पारिवारिक माहौल में रेखा को दादी कैलाशो देवी ने बचपन में कई कलाओं में दक्ष कर दिया। कैलाशो देवी उस क्षेत्र की पहली महिला थी जो शिक्षित थीं और लेखन कलाओं से लेकर कढ़ाई, सिलाई, बुनाई और पाक कला में निपुण थीं। किशोरावस्था से ही रेखा ने चरखा कातना, कढाई, बुनाई, सिलाई, गृह सज्जा, किताबें पढना, बागवानी करना, लेखन, पेड़ों पर चढऩा, भाषण देने की कला, ज्वेलरी बनाना, चित्रकारी करना सीख लिया। पीडि़तों की मदद करना व जानवरों से प्रेम करना दादी से विरासत में मिला था।
18 साल की उम्र में शादी, घूंघट प्रथा का विरोध
रेखा ने अपनी आरंभिक शिक्षा महाराष्ट्र के पूना और जिला हमीरपुर से ग्रहण की। साढ़े 18 साल की उम्र में साल 1997 में जब रेखा ने बीए प्रथम साल की स्टूडेंट थी तो हिमाचल प्रदेश के सब-इंस्पेक्टर मनोज जम्वाल के साथ उनकी शादी हो गई। मनोज चार भाईयों और दो बहनों में परिवार के सबसे छोटे बेटे हैं। शादी के बाद एक दम से बीस लोगों के परिवार में समायोजन चुनौती भरा था। घूंघट की प्रथा थी, लेकिन रेखा उस क्षेत्र की पहली महिला बनीं जिसने घूंघट प्रथा पर लगाम लगाई। शुरू में जम कर आलोचना हुई, लेकिन उनका कदम बाद में बहु बनकर इस क्षेत्र में आने वाली वरदान सिद्ध हुआ।
शादी के बाद फिर से शुरू की पढ़ाई
शादी के बाद रेखा को लग रहा था कि उसके उच्च शिक्षित होने के सपने कहीं चकनाचूर न हो जाएं। अपनी अधूरी पढ़ाई को पूरा करने की हसरत पति मनोज जम्वाल को बताई। मनोज एक सुलझे हुए इंसान हैं। उन्होंने परिवार द्वारा अवहेलना की परवाह किए बिना रेखा को उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरित व प्रोत्साहित किया। परिवार व पढ़ाई के मानसिक दबाव के चलते विवाह के दूसरे साल उनके जुड़वा बच्चों का गर्भपात हो गया। अस्वस्थ व बेहद कमजोर होने के बाबजूद रेखा ने पढ़ाई जारी रखी।
जब बीए फाइनल में थीं तो बेटे को जन्म दिया पर पढ़ाई चलती रही।
कॉलेज व स्कूल में प्रवक्ता की जॉब
रेखा के बेटे की परवरिश में दादी ने भरपूर मदद की। रेखा को आत्मविश्वास दिलाने, मानसिक और शारीरिक रूप से बलशाली बनाने में दादी और मेरे पति का बड़ा योगदान रहा। शिमला यूनिवर्सिटी से बीए करने के बाद कश्मीर यूनिवर्सिटी से बीएड और बाद में धर्मशाला से एमएड करके बिलासपुर के एक प्राइवेट कॉलेज में साइकोलॉजी प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दीं। पति की प्रमोशन व ट्रासफर के चलते ऊना के एक स्कूल में दो साल सेवाएं दीं। साल 2010 में बेटी में बेटी की मां बनीं और उसकी परवरिश में जुट गयी।
ऐसे पड़ी लाडली रक्षक की नींव
2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड और उसके बाद कोटखाई के गुडिया प्रकरण रेखा के दिमाग में चीत्कार करता रहा। पुलिस विभाग में डीएसपी पद पर आसीन पति के पास अक्सर केस जब आते। रेखा देखती कि पुलिस तो अपनी कार्यवाही के अनुसार धाराएं लगा कर मुकद्दमा दे देती हैं, लेकिन न्यायलयों में पहुंच कर शातिर अपराधी कैसे बच जाता है। बलात्कार के मामलों में औरत या किशोरी को ही समाज के तानों से जलील किया जाता है। इसी कश्मकश में चलते पीडि़तों की आवाज बन कर उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाने के लिए रेखा ने लाडली रक्षक की नींव रखी।
बेहतर समाज के निर्माण में ‘लाडली रक्षक’
संस्था काउंसलिंग के माध्यम से टूटते परिवारों को जोडऩे, सफाई को लेकर जन जागरण अभियान छेडऩे, नशे के खिलाफ जंग लडऩे, बच्चियों को यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठाने व आत्मरक्षा के गुर सिखाने, घरेलू हिंसा व यौन शोषण पीडि़ताओं को न्याय दिलवाने को लेकर मुखर है। संस्था ने प्रवासी मजदूरों के बच्चों को स्कूल जाने की तरफ प्रेरित करने, रोगियों के लिए एक्यूप्रेशर कैंप लगाने, इस का कोई बैंक अकाउंट नहीं है। यह संस्था कैशलेस हैं। संस्था के सदस्य अपने निजी खर्चे से जरूरतमंद की सहायता करते हैं। इस साल संस्था ने 8 बार सफाई अभियान किए। 16 स्कूलों में नशे के खिलाफ अभियान के तहत कवि सम्मेलन व भाषण प्रतियोगिताएं करवाईं, अब में तीन बार फलदार पौधों का रोपण किया गया। संस्था ने आवारा गुंडों भी सजा भी दिलवाई। मानसिक रूप से विक्षिप्त एक महिला को मशोवरा आश्रम पहुंचाने का प्रबंध किया


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