हिमाचल : पानी को लेकर सिख समुदाय की अनुठी कहानी, अपना कुआं अपना पानी

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मंडी शहर क़े दो दर्जन परिवार ऐसे भी हैं, जिन्हें पेयजल संकट का कोई फर्क नहीं पड़ता।

फोकस हिमाचल । मंडी

प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी मंडी में करीब 24 परिवार ऐसे हैं, जिनके घरों में कुएं हैं और वे उन्हीं का पानी प्रयोग करते हैं। आज जब पानी की किल्लत के चलते ‘बिन पानी सब सून’ हर आम-ओ-खास का तकिया कलाम बनता जा रहा है, ये परिवार पानी के लिए किसी पर निर्भर नहीं हैं। हालांकि उनके ऐसा करने के पीछे कुछ धार्मिक धारणा थी और वे नल के पानी से परहेज करते थे, लेकिन इसी बहाने जल संरक्षण, खासतौर से प्राकृतिक जलस्त्रोत के संरक्षण की एक मिसाल बन गई है।

कभी बावड़ियों के लिए मशहूर मंडी शहर में बदलते वक्त के साथ बावड़ियों का वजूद मिटता गया, लेकिन इस बीच मंडी शहर में अनूठी पहल हुई। मंडी ऐसा इकलौता नगर बन गया है, जहां के लोगों ने प्राकृतिक पेयजल स्रोत कुएं के वजूद को बचाए रखा।

मंडी में सिख समुदाय के करीब 24 परिवारों ने पेयजल के लिए अपने घरों में कुओं का निर्माण करवाकर पानी सहेजने की अनूठी पहल की है। इन घरों में कुएं खोदवाने की शुरुआत आधी सदी पहले हुई थी। वे आधी सदी पुराने के कुओं को बचाने में कामयाब रहे हैं।

मंडी नगर के मोती बाजार, समखेतर, मंगवाई, पैलेस कॉलोनी व टारना मोहल्ला में 24 सिख परिवारों के यहां अपने कुएं हैं। मल्होत्रा ज्वेलर्स के मालिक सर्व सुखपाल मल्होत्रा के पिता का खोदवाया कुआं अब भी प्रयोग में लाया जा रहा है। रत्न ज्वेलर्स के मालिक राजा सिंह के घर में 40 वर्ष पुराना कुआं है। व्यवसायी रणजीत सिंह के घर 50 वर्ष पुराना कुआं है तो न्यू एंब्राइडरी के मालिक गुरदीप के घर में 40 वर्ष पुराना कुआं आज भी काम आ रहा है। और भी कई लोगों के घरों में कुएं का पानी पिया जाता है।

मंडी स्थित गुरुघरों में भी पानी की व्यवस्था करने के लिए कुएं खोदे गए हैं। पड्डल स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा गुरु गोबिंद के परिसर में चार कुएं हैं, जिनका पानी प्रयोग में लाया जाता है। नामधारी व नीलधारी गुरुद्वारे में भी पेयजल के लिए कुएं की व्यवस्था है।


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