नुआला : गद्दी समुदाय के नौ व्यक्ति रात भर करते हें भोले शंकर की स्तुति, चार ‘बंदे’, पांचवां कुटआल और छठा बुटआल, सातवें का काम मंडल सजाना, आठवां चेला और नौवां रसोईया

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भरमौर से कपिल मेहरा की रिपोर्ट

नुआला परंपरा विशेषकर गद्दी समुदाय से जुड़ी एक प्राचीन परंपरा है, जिसे आज भी चंबा घाटी के लोग पूरी श्रद्धा के साथ निभाते हैं। यूं तो इस संदर्भ में कई दंतकथाएं प्रचलित हैं, लेकिन चंबा घाटी के लोगों के मुताबिक नुआला मतलब नौ व्यक्त्यिों द्वारा भगवान भोले शंकर की स्तुति या भोले की महिमा का गुणगान करना होता है, जिसे केवल गद्दी समुदाय के लोग ही गाते हैं। बताया जाता है कि इन 9 व्यक्तियों को अलग– अलग कार्यभार सौंपा गया होता है। इनमें शामिल 4 लोगों को बंदे कहा जाता है, जो पूरी रात भोलेनाथ की स्तुति या उनकी महिमा का गुणगान करते हैं। पांचवा व्यक्ति कुटआल और छठा बुटआल होता है। कुटआल का काम सारी रात जागकर शिव का गुणगान करने वाले 4 बंदों की सेवा करना होता है और बुटआल का काम लोगों में प्रसाद आदि बांटना होता है। इस रात को चार हिस्सों में बांटा जाता है और बुटआल रात को चार बार प्रसाद बांटता है। सातवां व्यक्ति नुआले के लिए मंडल बनाता है और इसके समीप बैठकर सारी रात धूप– दीप जलाता है। आठवें व्यक्ति को चेला कहते हैं, जिसे किसी भी देवता की पौण या खेल आ सकती है। नौवां व्यक्ति रसोइया होता है, जो रसोई यानि खाना बनाता है और लोगों को भोजन करवाता है।

32 कोठे, 4 छोटे कैलाश और बीच में एक बड़ा कैलाश

नुआला शुरू करने से पहले फूलों की माला बनाई जाती है। इसके बाद गेहूं या मक्की के आटे से जमीन पर मंडल की सरंचना की जाती है। मंडल में 32 कोठे बनाए जाते हैं। इसके बीच में 4 छोटे कैलाश और बीच में एक बड़ा कैलाश पर्वत बनाया जाता है। मंडल में बनाए गए 32 कोठों पर चावल व उड़द के दाने डाले जाते हैं। इसके साथ 32 दाल के बड़े व 64 बबरू साथ में चढ़ाए जाते हैं। हर कोठे पर एक दाल का बड़ा और 2 बबरू चढ़ाए जाते हैं। इसके साथ ही धूप-दीप जलाया जाता है। अगर नुआला वैष्णव है तो मंडल में मीठा प्रसाद व फल आदि चढ़ाया जाता है। अगर पैरू अर्थात भेडू देना है तो मंडल के पास भेडू की मुंडी या पंजा रखने की परंपरा भी कहीं– कहीं निभाई जाती रही है। हालांकि बलि प्रथा पर प्रतिबंध के चलते अब लोग वैष्णव नुआला को तवज्जो देने लगे हैं।
‘ऐंचली ’से शुरूआत करते हैं ‘बंदे’
मंडल संरचना के बाद 4 लोग, जिन्हें बंदे कहा जाता है, वे शिव की अराधना ऐंचली से शुरू करते हैं। एक ऐंचली के कुछ बोल इस प्रकार हैं।
आ सामिया, लै वो समीया लै वो सामी अपणे उधारो
भोले आ वो सामिया।
32 वो कोठे तेरा मंडल साजे, लै वो सामी अपणे उधारो
भोले आ वो सामिया।
चौले वो माहे तेरा मंडल सज्जे
लै वो सामिया, अपणे उधारा।
चौले वो माहे तेरा मंडल सज्जे
लै वो स्वामीआ, अपणे उधारा।
भोले आ वो सामिया।
अक अरज मेरी होर हुणे
भुखेआं जो भोजन दिएं
भोले आ वो सामिया
अक अरज मेरी होर हुणे
अंधेआं जो लोजन लाएं
भोले आ वो सामिया
आ सामिया, लै वो समीया लै वो सामी अपणे उधारो
भोले आ वो सामिया।
रात के चार हिस्सों में शिव की स्तुति
इसके बाद निभाई जाती है नुआले की आगे की परंपरा अर्थात विधि के अनुसार रात के चार हिस्सों में शिव की स्तुति क्रमवार की जाती है। शिव की अराधना के साथ ही भोलेनाथ का आह्वान किया जाता है और उन्हें मंडल में विराजमान होने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इसके साथ ही भोलेनाथ से यह भी अनुमति ली जाती है कि हे भोलेनाथ आज सारी रात आपके ये चार बंदे आपकी स्तुति अर्थात नुआला करेंगे और आप अपने मौजूदगी में इस कार्य को सफल करें एवं अपना आशीर्वाद यहां मौजूद लोगों को भी प्रदान करें। रातभर चार पहरों के दौरान चार बार प्रसाद बांटा जाता है।
नुआले के बाद धाम का आयोजन
पहले पहर में भोले के आमंत्रण एवं स्वागत में गीत गाए जाते हैं। दूसरे पहर में भी भोलेनाथ की स्तुति या शिव लीला के अलावा रामायण भी गा सकते हैं। तीसरे पहर में महाभारत या पंडवीण व चौथे पहर में कृष्णलीला भी गा सकते हैं। चौथे पहर में शिवपूजन करके भोलेनाथ को विदाई दी जाती है और उनकी विदाई में गीत गाए जाते हैं। इसके बाद प्रसाद बांटकर सभी लोगों में धाम परोसी जाती है।
नुआले में रामायण की कथा
नुआले के दौरान गाए जाने वाले रामायण के बोल कुछ इस प्रकार हैं।
राम ते लछमण चौपण खेले
सिया राणी कडदी कसीदे रामा ए
राम ते लछमण चौपण खेले
सिया राणी कडदी कसीदे रामा ए
अक बाजी खेली रामे दूजी लाई ए
पाणी री लगदी प्यास रामा ए
उठदी सिया घड़ै लागी गया
ना वो घड़े पाणिए रा चोड़ा ओ
कठिए हो ला मेरा शीश घड़ुआ
कठि हो ला नारी अरा बिना रामा ए।
कांगड़ा जिले में भी प्रचलित है नुआला:
चंबा घाटी के साथ-साथ कांगड़ा जिले के भी कई इलाकों में लोग नुआला करवाते हैं। कहा जाता है कि पहाड़ों पर बर्फबारी के बाद जब गद्दी लोग अपनी भेड़- बकरियों के साथ मैदानी क्षेत्रों में पलायन करते थे तो कभी- कभी रात के समय वे नुआला करके भोले की अराधना करते थे। उन्हें ऐसा करते देख कांगड़ा घाटी के लागों ने भी धीरे– धीरे इसे करवाना शुरू कर दिया। अब तो कांगड़ा घाटी के कई लोग मन्नत पूरी होने पर घर में विवाह-शादी होने होने पर नुआला करवाकर भोलेनाथ की अराधना करते हैं।
दंतकथा एक: गंगा का वेग को रोकने को 32 कोठे
एक दंतकथा के अनुसार इश्वांकु कुल के सूर्यवंशी राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार करने के लिए ब्रह्मा की अराधना की और उनके करमंडल से गंगा को मृतलोक मेें आने के लिए कहा। हालांकि, गंगा मृतलोक में आने के लिए तो तैयार हो गई, लेकिन उनके वेग को संभाल पाना मुश्किल था। इसलिए ब्रह्मा ने भागीरथ से कहा कि गंगा के वेग को तो भोलेनाथ ही रोक सकते हैं। उन्होंने भागीरथ को भोलेनाथ की अराधना करने को कहा। ब्रह्मा के कहने पर भागीरथ ने भोले नाथ की अराधना की। भोले नाथ के प्रकट होने पर भागीरथ ने उनसे गंगा के वेग को कम करने के लिए कहा। भोलेनाथ ने भागीरथ की बात मान ली और कहा, ठीक है मैं गंगा के वेग को कम कर दूंगा, लेकिन जब गंगा ब्रह्मा के करमंडल से आएगी तो मैं उसे अपनी जटाओं में समा लूंगा और उसका वेग कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इस दौरान पृथ्वी लोक में चार चेलों को मेरा गुणगान करना होगा। तभी से नुआले की शुरूआत मानी जाती है। कहा जाता है कि गंगा के वेग को रोकने के लिए नुआले के दौरान 32 कोठे आटे के बनाए जाते हैं। इस दौरान शिव भक्त भोलेनाथ की महिमा का गुणगान करते हैं और नाच गाकर अपना भक्तिभाव व श्रद्धा प्रकट करते हैं।
दंतकथा दो : गंगा और गौरां की कथा
एक अन्य दंतकथा के अनुसार यह भी बताया जाता है कि जब गंगा ब्रह्मा के कमंडल से निकलकर आई तो सीधे शिवजी की जटाओं में समा गई थी और इसके बाहर न निकलने पर भागीरथ परेशान हो गए थे। उन्होंने सोचा कि गंगा अब भोलेनाथ की जटाओं में समा गई है और इसे बाहर कैसे निकाला जाए। अगर गंगा जटाओं से बाहर न निकली और पृथ्वी लोक में न आ पाई तो उनके पूर्वजों का उद्धार कैसे होगा। इसके बाद भागीरथ मां गौरी के पास गए और उनसे कहा कि भोलेनाथ की जटाओं में गंगा समाई हुई है। उन्होंने गौरां से कहा कि अगर आपको यकीन न हो तो खुद भोलेनाथ की जटाओं में देख लेना। इसे बाद गौरां को शक हो गया कि आखिर भोलेनाथ खाना खाते वक्त एक ग्रास अपनी जटाओं में क्यों रखते हैं। इस सवाल के पूछने पर भोलेनाथ ने गौरां से कहा कि मेरी जटाओं में मेरे ठाकुर रहते हैं। इस पर गौरां ने जिद की कि उसने भोलेनाथ के ठाकुर यानि देवते देखने हैं। भोलेनाथ ने गौरां से फिर कहा कि मेरे ठाकुर औरत का मुहं नहीं देखते। इस पर गौरां ने भोलेनाथ से पूछा कि आपसे बड़ा कौन है। भोलेनाथ ने कहा कि मेरे से बड़ी तो पृथ्वी है। इसके बाद गौरां पृथ्वी के पास गई और उससे पूछा कि आपसे बड़ा कौन है। पृथ्वी ने कहा कि उससे बड़ा तो धौलू बैल है, जिसने अपने एक सिंग पर उसे उठाया हुआ है। इसके बाद गौरां बैल के पास गई और पूछने लगी की आपसे बड़ा कौन है। बैल ने कहा कि उससे बड़ा तो शेषनाग है, जिसने उसे उठाकर रखा है। परेशान होकर गौरां शेषनाग के पास जा पहुंची और पूछने लगी की आपसे बड़ा कौन है। शेषनाग ने कहा कि उससे बड़ा तो कमल का फूल है, जिस पर वह विराजमान हैं। इसके बाद गौरां कमल के फूल के पास जा पहुंची और कमल के फूल ने कहा कि उससे बड़ा तो सर्वतालाब है, जिसमें वह खिलता है। सर्वतालाब से पूछने पर उसने कहा कि उससे बड़ी तो बज्रशिला है। अंतत: बज्रशिला से पूछा गया तो जवाब मिला कि भोलेनाथ ने ही उसे बनाया है और शिव ही सर्वोत्तम एवं सर्वव्यापी और सबसे बड़े हैं। इसके बाद गौरां वहां से कैलाश पर्वत पर आ गई और उसे पूरा शक हो गया कि भोलेनाथ ने अपनी जटाओं में किसी औरत को छिपा कर के रखा हुआ है। इसके बाद माता गौरां को भागीरथ की बात पर यकीन होने लगा और गौरां कैलाश छोडक़र चौबारे में आ गई और पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गई। वहां पर मनमोहिनी को बुलाकर यह कहा गया कि भोलेनाथ को जादू करना है, ताकि वे अपनी जटाओं को खोलें और उसे पता चल सके कि भोलेनाथ की जटाओं में कौन औरत बैठी हुई है। मनमोहिनी की दी हुई चीज माता गौरां ने भोलेनाथ को दी और उन्हें पेटदर्द होने लगा। उन्हें ठीक करने के लिए पूर्व निर्धारित योजना के तहत भागीरथ को बतौर चेला बुलाया गया। भागीरथ के बीण बजाने पर भोलेनाथ नाचने लगे और जैसे ही शिवजी ने जटाओं को नीचे किया तो गंगा बाहर निकल आई और नीचे गिर पड़ी।

गंगा को अपने साथ ले गए भागीरथ

यह भी कहा जाता है कि गंगा के शिव की जटाओं में निकलने के बाद गौरां का शक यकीन में बदल गया और वह भोलेनाथ से नाराज होकर बोलीं, मैंने आपके ठाकुर देख लिए हैं, जो आपने अपनी जटाओं में छिपाकर रखे थे। उसने गंगा से पूछा कि आप कौन हो, जो मेरे पति की जटाओं में छिपकर बैठी थीं। उसने उसे उसकी सौतन यानी सौंकण बताया। इस पर हिमाचली लोकगीत भी है, जिसे अक्सर गाया जाता है।
धुड़ु नच्चैआ, जटा वो खलारी ओ,
धुड़ु नच्चैआ, जटा वो खलारी ओ,
नच्चै धुड़ुआ, बाजे तेरे नगाड़े ओ।
नच्चै धुड़ुआ, बाजे तेरे नगाड़े ओ।
गंगा-गौरां पाणिए जो गईयां ओ।
गौरां पूछदी तू लगदी क्या मेरी ओ।
गंगा बोलदी, मैं सौकण तेरी ओ।
गंगा बोलदी, मैं सौकण तेरी ओ।
गंगा-गौरां सरोसर लड़ी ओ ।
टूटे हार चौरासी पड़ी ओ।
गंगा लेई गया भागीरथ चेला ओ।
गंगा लेई गया भागीरथ चेला ओ।
धुड़ु रेई गया केलमकेला ओ।
गौरां पेटे पीड़ मचेाई ओ।
धारा धारा ते बुटी मंगाई ओ।
धारा-धारा ते धूणी मंगाई ओ।
इयां शिवजिए पीड़ गवांई ओ।
धुड़ु नच्चैया जटां वो खलारी ओ।
नच्चै धुड़ुआ बजै तेरे बाजे ओ।
पनिहार पर गंगा और गौरां की बहस के बाद गंगा वहां से जाने लगी तो भागीरथ उसे अपने साथ ले गए और उसे पृथ्वी लोक पर छोड़ दिया ताकि उसके पूर्वजों का उद्धार हो सके। कहा जाता है कि नुआले के आधार इसी दंतकथा से जुड़ा माना गया है।
(लेखक गांव, डाकघर व तहसील जवाली, कांगड़ा के निवासी है और पेशे से शिक्षक हैं। इन दिनोंं भरमौर में तैनात हैं।)
( फाइल फोटो )

 


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