इतिहास के आईने में रंग – प्राचीन भारत में पेड़ों की छाल से बनाये जाते थे रंग, प्रकृति रंगों में रंगे थे मिश्र के मंदिर

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फोकस हिमाचल फीचर डेस्क

देश रंगोत्सव मना रहा है। रंगों का इंसान से गहरा नाता है। रंग हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हैं। रंगों के माध्यम से ही प्रकृति की हरियाली से लेकर सूरज की सुनहरी रोशनी, आसमान का नीलापन, बादलों की काली घटाएं और चंद्रमा का उजलापन देख पाते हैं। बादलों में खिंचती सात रंगों की इंद्रधनुषी रेखा प्रत्येक रंग की सुंदर कहानी बयां करती है। जिसे देखकर मन रंगीन दुनिया का हिस्सा बन जाता है। जो रंग हमारे जीवन को रंगीन बनाये हुए हैं और जिनके होने से रंग-बिरंगी उड़ती तितलियों का सुखद अहसास होता है। रंगों का जन्म कब कहां और कैसे हुआ इसकी जिज्ञासा हमेशा से बनी रही है।

भारत में रंगों का इतिहास
ऐसा माना जाता है कि रंगों का जन्म लगभग 2000 ईसा पूर्व हुआ। धीरे-धीरे रंगों की छटा पूरे विश्व में फैल गयी। भारत में प्रारंम्भिक काल से ही रंगों का विशेष महत्व रहा है। मोहन जोदड़ों एव हड़प्पा की खुदाई में सिंधु घाटी सभ्यता में बर्तन एवं मूर्तियां पायी गई। साथ ही लाल रंग का कपड़ा भी मिला। इतिहास के जानकारों के मुताबिक इस पर मजीठ या मजीष्ठा की जड़ से तैयार किया गया रंग चढ़ हुआ था। पूर्व में हजारों वर्ष तक मजीठ की जड़ और बक्कम वृक्ष की छाल लाल रंग के स्रोत थे। पीपल, गूलर और पाकड़ जैसे वृक्षों पर लगने वाली लाख कृमियों की लाह से महाउर रंग तैयार किया जाता था। पीला रंग और सिंदुर हल्दी से प्राप्त होता था।

प्राचीन मिस्र का नीले आसमानी रंग
प्राचीन मिस्र में रंगो का उपयोग ‘उपचार रंग’ के रूप में भी किया गया। मिस्र निवासी सूर्य की उपासना किया करते थे। जिनका मानना था कि सूर्य के प्रकाश के बिना जीवन असम्भव है। उन्होंने प्रकृति के रंगो के मुताबिक ही अपने मंदिरों को भी रंगा हुआ था। नीले आसमानी रंग से उनको काफी लगाव था। इनके कक्ष भी विभिन्न रंगों से सजे होते थे। आधुनिक चिकित्सा पद्धति को प्राचीन प्रकाश चिकित्सा से जोड़ कर देखा गया।

यूनान को थी रंगों की गहरी समझ
1500 ईसा पूर्व पेपिरस की सूची पर रंग इलाज उपलब्ध नहीं है। रंगो की गहरी समझ रखने वाला यूनान भी धीरे-धीरे अपनी पकड़ कमजोर करता गया। जिसके कारण यूनान में रंग विज्ञान ही अस्तित्व में रह पाया। हिप्पोक्रेटस (बुकरात नामक यूनानी दार्शनिक) ने रंगो के आध्यात्मिक पक्ष को दूर कर केवल वैज्ञानिक पक्ष को ही माना।

न्यूटन बोले – एक नहीं सात रंग
रंगों की रहस्यमय रंगीन दुनिया को जानने का सटीक अध्ययन सबसे पहले न्यूटन ने किया। जिन्होंने यह कहकर सनसनी फैला दी कि रंग एक नहीं सात होते हैं। इसको प्रमाणित करने के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया जिसमें एक अंधेरे कमरे में छोटे से छेद द्वारा सूर्य का प्रकाश आता था। यह प्रकाश एक प्रिज्म़ कांच द्वारा अपवर्तित होकर सफेद पर्दे पर पड़ता था। पर्दे पर सफेद प्रकाश के स्थान पर इद्रधनुष के सात रंग दिखाई दिये। ये रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला तथा बैंगनी हैं। जब न्यूटन ने प्रकाश के मार्ग में एक और प्रिज्म़ पहले प्रिज्म़ से उलटा रखा, तो इन सात रंगों का प्रकाश मिलकर पुनः सफेद रंग प्रकाश बन गया। इन्हीं सात रंगों को इन्द्रधनुष नाम से जाना जाता है।

इंग्लॅण्ड में इतफाक से बना बैंगनी रंग
सौ साल पहले पश्चिम में औद्योगिकरण की क्रांति ने कपड़ा उद्योग को तेजी से रफ्तार दी। जिससे रंगो की मांग बढ़ गई। प्राकृतिक रंगो के साधन भी सीमित थे। कृत्रिम रंगो की खोज शुरू हुई। रॉयल कालेज ऑफ केमिस्ट्री, लंदन में विलियम पार्कीसन एनीलीन से मलेरिया की दवा कुनैन बनाने में जुटे हुए थे। कई प्रयोगो के बाद कुनैन तो बना नहीं लेकिन बैंगनी रंग जरूर बन गया। 1856 ई. में संयोगवश तैयार हुए इस रंग को मोव कहा गया।

जर्मनी ने बनाया नील
इस क्रम में 1860 में रानी रंग, 1862 में एनलोन नीला और काला 1865 में विस्माई भूरा, 1880 ईं में सूती काला जैसे रासायनिक रंग उत्पन्न हुए। जर्मन रसायनशास्त्री एडोल्फ फोन ने 1865 में तमाम असफलताओं से जूझते हुए नील बनाने में सफलता प्राप्त की। जिसके लिए उन्हें 1905 ई. में नोबल पुरुस्कार से सम्मानित किया गया।

अब नेचुरल नहीं केमिकल रंग
मुम्बई में रंगों का कारोबार करने वाली कंपनी कामराजजी फर्म ने सबसे पहले 1867 ई में मजेंटा (रानी रंग) को बाहर आयात करवाया। 1872 में जर्मन रंग विक्रताओं का एक दल एलिजिरिन नामक रंग लेकर भारत आया। जिन्होंने देश में अपनी पैठ बनाने के लिए मुफ्त में रंग को बांटा।कृत्रिम अथवा रासायनिक रंगों की चमक-दमक ने वनस्पति रंगो को फीका कर दिया जिससे प्राकृतिक रंग अपना अस्तित्व बचाने में नाकाम रहे और रासायनिक रंग चलन में आ गए।

इन्द्रधनुष के रंगो के नाम

लालः लाल रंग को रक्त रंग भी कहा जाता है। लाल रंग प्रकाश का संयोजी प्राथमिक रंग है जो कि क्यान रंग सम्पूरक है। यह वर्ण हमारे मन आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

नारंगीः यह रंग नारंगी फल के छिलके के रंग जैसा दिखता है। भारतीय तिरंगे में इस रंग का प्रयोग किया गया है। इस रंग से त्याग की भावना आती है।

पीलाः इस रंग में लाल और हरे रंग की मात्रा ज्यादा होती है एवं नीला वर्ण कम होता है। पीला रंग शुद्ध एवं सात्विक प्रवृत्ति का परिचायक है। यह रंग शुद्धता एवं निर्मलता का प्रतीक है।

हराःयह इंद्रधनुष का चौथा रंग है। भारतीय तिरंगे में भी इस रंग का उपयोग किया गया है। यह रंग प्रकृति से संबंध और सम्पन्नता दर्शाता है।

आसमानी रंगःआसमान का रंग होने के कारण इसे आसमानी रंग कहा जाता है। इस रंग में नीले और सफेद रंग का मिश्रण होता है। यह द्वितीयक रंग के नाम से भी जाना जाता है।

नीलाःइस रंग को प्राथमिक रंग भी कहा जाता है। भारत के राष्ट्रीय खेलों में भी नीला रंग प्रयोग किया जाता है। यह धर्म-निरपेक्षता को दर्शाता है।

बैंगनी रंगःइन्द्रधनुष के रंगो का यह सातवां और अंतिम रंग है। जिसका नाम एक सब्जी बैंगन के आधार पर रखा गया है।


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