चौधरी मल्लाह सिंह का कमाल, जला गए शिक्षा की मशाल, गांव की समस्याओं के लिए सारी पूंजी की दान

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जीते जी समाजसेवा के जमीन जयदाद दान कर जाने वाले इंदौरा के समाजसेवी की जीवनगाथासुखदेव सिंह की रिपोर्टचौधरी मल्लाह सिंह की यश कीर्ति आज भी अगर लोगों की जुबान पर है तो इसके पीछे उनकी दूरदर्शी सोच और शिक्षा की मशाल जलाने में उदारता जैसे उनके गुण शामिल हैं। चौधरी सहहब ने गरीब परिवारों की लड़कियों के विवाह पर सहायता, पानी की कमी को दूर करने के लिए कुओं, बावड़ियों का निर्माण और पाठशालाओं की स्थापना की। अपनी तमाम जमा पूँजी को वे सामाजिक कार्यों के लिए जीते जी दान कर गए।

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शिक्षा की अलख जगाई

29 फरवरी 1916 को चौधरी मल्लाह सिंह ने इंदौरा में एक विधालय की आधारशिला रखी। 1921 को दस कमरे,एक हाल, दस अध्यापकों के लिए आवास, दो हास्टल,तीन भंडार कक्ष ओर एक खेल प्रांगण सहित किलेनुमा स्कूल जनता को समर्पित कर दिया। उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाहर जाने वालों के लिए अपने बेटे अनंत के नाम से हास्टल बनवाया। इंदौरा और नूरपुर में दो सरायें, पेयजल के लिए पक्के कुँए भी बनवाए। वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला सुजानपुर व स्नातन धर्म कॉलेज पठानकोट का निर्माण भी चौधरी मल्लाह सिंह के अथक प्रयासों का ही फल था।

ठुकरा दिया गवर्नर का प्रस्ताव

पिता सुंदर सिंह के घर 22 फरवरी 1855 को चौधरी मल्लाह सिंह का जन्म हुआ। पिता की मौत के बाद वह जागीरदार बने।1905 में जब जिला कांगड़ा में भयंकर भूकंप आया। उस वक्त चौधरी मल्लाह सिंह ने जरूरतमंद लोगों की हर संभव सहायता की थी। पंजाब के गवर्नर ने चौधरी साहब को राय बहादुर का ख़िताब दिया और साथ ही सौ एकड़ जमीन भी उन्हें देने की घोषणा की, मग़र मल्लाह सिंह ने गवर्नर का यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

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बेटे की मौत ने दिया मकसद

चौधरी मल्लाह सिंह अपने पुत्र अनंत की अचानक हुई मौत से निराश रहने लगे। उनके मित्रों और रिश्तेदारों ने उन्हें इस गम से बाहर निकालने की बहुत कोशिश की। चौधरी मल्लाह सिंह ने दोस्त पंडित बेली राम से अपने बेटे की स्मृति में स्मारक बनाने की इच्छा जाहिर की।पंडित बेली राम ने उन्हें शिक्षा की ज्योति जलाने की सलाह दी। बस यहीं से मल्लाह सिंह ने शिक्षा के क्षेत्र में मजबूत नींव रखने का कार्य शुरू कर दिया। खुद महाजनी भाषा टांकरी जानते थे, अगली पीढ़ी के लिए शिक्षा की रोशनी कर गए।

सादा जीवन,उच्च विचार

चौधरी मल्ला सिंह क रहन-सहन बड़ा ही सादा था वह खद्दर के कपड़े पहनते थे गांव में देसी जूता भी किसी स्थानीय कारीगर का बना हुआ होता था। कुर्ते के बटन भी कपड़े के होते थे. चौधरी साहिब धार्मिक वृत्ति के व्यक्ति थे ।सांय काल की आरती में वह मंदिर अवश्य जाते थे सभी धार्मिक उत्सव में भाग भी लेते थे.स्वभाव से नरम, मिलनसार, अहंकार रहित और दृढ संकल्पी थे।

वसियत में सब कुछ दान23 दिसंबर 1929 को चौधरी मल्लाह सिंह का देहांत होने से पहले उन्होंने अपनी वसीयत में तमाम जमीन, जायदाद मानवता के लिए दान कर दी। चौधरी साहब ने इंदौरा कॉलेज के लिए करोड़ो रुपयों की जमीन दान कर शिक्षा की ज्योति जलाई। यही कारण है कि इंदौरा के राजकीय महाविद्यालय के प्रांगण में स्थापित चौधरी मल्लाह सिंह की प्रतिमा को लोग आज भी प्रणाम करते हैँ।


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