एक मजदूर ने किया था शिमला के शाही थियेटर का लोकापर्ण, केवल महिलाओं के लिए होता था बुधवार को दोपहर का शो

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शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट

आज आपको हम शिमला के एक ऐसे फिल्म थिेटर के निर्माण की कहानी सुना रहे हैं, जिसे उस दौर में आम आदमी का थियेटर कहा जाता था। इस थियेटर का निर्माण उस दौर के मशहूर शाही हकीम ने करवाया था और एक मजदूर के हाथो उसका लोकापर्ण हुआ था। मजदूर वर्ग के मनोरेजन के लिए बनाए गए इस थियेटर के प्रति महिलाओं के आकर्षण को देखते हुए बुधवार को दोपहर का शो केवल महिलाओं के लिए होता था। बात हो रही है शिमला केे शाही थियेटर की, जिसका सभागार पुराने ब्रिटिश डिजाइन का है। इसके लिए एक गैलरी बाद में बनाई गई है। इसकी एक झलक पाने के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने 2005 में 251 सीटों वाले थिएटर का दौरा किया था। बेशक अब इस थियेटरमें अब डिजिटल प्रोजेक्टर प्रणाली पर चलने वाली फिल्मे प्रदर्शित होती हैं और पुश-बैक कुर्सिया, डॉलबी साउंड ट्रैक है और उत्तर भारत का एकमात्र एकल सिंगल- स्क्रीन थ्री डी सिनेमा है, लेकिन एक वक्त था जब यहां बैठने के लिए कुर्सियों की जगह बैंचों की व्यवस्था की गई थी।
‘लक्ष्मी नारायण’ फिल्म के प्रदर्शन के साथ शुरूआत
इस थिेटर के मालिक एवं शाही हकीम के वारिस साहिल शर्मा बताते हैं कि शाही हकीम ज्ञान चंद ने आम आदमी के लिए शिमला में थिएटर शुरू करने के बारे में विचार किया। उनकी नजर राम बाज़ार के फर्ऩ कॉटेज पर पड़ी। इसके मालिक पूर्णमल थे जो एक परोपकारी व्यक्ति थे। उन्होंने साल 1929 में इस संपत्ति का एक भाग धर्मार्थ एक ट्रस्ट को दिया था। इसका ऊपरी हिस्सा जो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के पास था, उसे थियेटर के लिए खाली कर दिया गया था। फिल्में चलाने के लिए लाइसेंस प्राप्त किया गया। कुर्सियों की जगह बैठने के लिए बेंच लगाए गए। एक मजदूर ने इस सिनेमा हॉल का उद्घाटन किया। जून 1953 में नानाभाई भट्ट द्वारा निर्देशित मीना कुमारी और महिपाल के अभिनय वाली ‘लक्ष्मी नारायण’ फिल्म के प्रदर्शन के साथ इस थियेटर की शुरूआत हुई।
‘जंगल’ और ‘संगम’ ने बनाई सिल्वर जुबली
थोड़े से समय में ही शाही थिएटर ने मजदूर वर्ग के लिए सिनेमा हॉल के रूप में लोकप्रियता हासिल की। महिलाओं में इस थियेटर के प्रति खासी दिवानगी थी, जिसके चलते यह निर्णय लिया गया था कि प्रत्येक बुधवार को दोपहर का शो केवल महिलाओं के लिए होगा। जब मुगल- ए आज़म को यहां प्रदर्शित किया गया तो बेंचों को कुर्सियों से बदल दिया गया। यह फिल्म हॉल में 18 सप्ताह तक चली। ‘जंगल’ और ‘संगम’ ने यहां 25 सप्ताह चलने का रिकॉर्ड- बनाते हुए सिल्वर जुबली मनाई। अस्सी के दशक में शाही के मालिक सुशील ने फिल्म निर्माण में कदम रखे औँर 1987 में डैनी, रोमा और बिंदू अभिनीत ‘फकीर बादशाह’ का निर्माण किया।
सियालकोट से छुट्टिया मनाने शिमला आए थे शाही हकीम
साल 1947 के गर्मियों के मौसम में सियालकोट के एक गांव में रहने वाले ज्ञानचंद अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ छुट्टिया मनाने के लिए पहाड़ों की रानी शिमला आए हुए थे। इसी दौरान भारत विभाजन के कारण भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में हिंसा भडक़ उठी। बड़े स्तर पर फैली सांप्रदायिक हिंसा के कारण यह परिवार तो वापस सियालकोट नहीं लौट सका, लेकिन परिवार के बाकि सदस्य भी बाद में शिमला आ गए। ज्ञानचंद यूनानी चिकित्सा पद्धति के प्रख्यात चिकित्सक थे। तत्कालीन रियासत के नवाब ने उन्हें शाही हकीम की उपाधि दी थी। अन्य बीमारियों का इलाज करने के अलावा, त्वचा के रोगों के लिए उनके तैयार किए हुए रक्त शोधक और मलहम रामबाण उपचार थे। लोअर बाज़ार के पूर्वी हिस्से में उनका क्लिनिक था।
शिमला के पगडीवाला और घुड़सवारी का शौक

उस दौर में वे शिमला के उन गिनी चुनी हस्तियों में शामिल थे जो सिर पर पगड़ी पहनते थे और वे अपने घर क्लिनिक घुड़सवारी करते थे। उन्होंने न केवल शाही थियेटर की शुरूआत की, बल्कि झाखू में दशहरा उत्सव की शुरूआत करने का श्रेय भी उनको जाता है। शाही हाकिम ज्ञानचंद ‘मुगल- ए- आजम’ के शीश महल शीश महल से इतना प्रभावित थे कि उन्होंने इसकी प्रतिकृति एक छोटे संस्करण के रूप में अपने घर में बनवाई, जो मधुबाला में ‘प्यार किया तो डरना क्या’ के सेट से मेल खाती है। इंदौर से आए कलाकारों को शीशे के छोटे-छोटे टुकड़ों से तीन महीनों ने इस शीश महल को तैयार किया। साल 1968 में शाही हकीम ज्ञानचंद इस दुनिया को अलविदा कह गए।


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