600 करोड़ की कंपनियों के मालिक मदन लाल गर्ग बिजनेस से रिटायर होकर पांवटा साहिब में संचालित कर रहे ‘नेकी की दीवार’ ‘नेकी की दीवार’ एक शोरूम है जहां लोग अपने पुराने कपड़े टांग कर चले जाते और जरूरतमंद उन्हें पहनकर शरीर ढांपते हैं और मौसम की मार से भी बचते हैं

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600 करोड़ की कंपनियों के मालिक मदन लाल गर्ग बिजनेस से रिटायर होकर पांवटा साहिब में संचालित कर रहे ‘नेकी की दीवार’
‘नेकी की दीवार’ एक शोरूम है जहां लोग अपने पुराने कपड़े टांग कर चले जाते और जरूरतमंद उन्हें पहनकर शरीर ढांपते हैं और मौसम की मार से भी बचते हैं
पांवटा साहिब से वीरेंद्र शर्मा ‘वीर’की रिपोर्ट
600 करोड़ की कंपनियों के मालिक मदन लाल गर्ग बिजनेस से रिटायर होकर गुरू की नगरी कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश के पांवटा शहर में ‘नेकी की दीवार’ संचालित कर रहे हैं। ‘नेकी की दीवार’ एक शोरूम जैसा है, जहां लोग अपने पुराने कपड़े टांग कर चले जाते और जरूरतमंद उन्हें पहनकर शरीर ढांपते हैं, मौसम की मार से बचते हैं। कपड़ों के रख- रखाव के लिए शोरूम की तरह रैक लगाए गए हैं, जहां अलग— अलग साइज के कपड़ों को धोने के बाद सजाकर रखा जाता है। इस शोरूम में एक सेल्स गर्ल तैनात है, जिसका काम कपड़े लेने आने वाले जरूरतमंदों को उनके साइज के कंपड़े ढूंढने में मदद करना है। मदनलाल गर्ग अब अपना अधिकतर समय यहीं दुकान पर साधारण सा पंखा लगाकर बिताते हैं। पंजाब के पटियाला की सामाना मंडी से शुरू हुए कारोबारी सफर के पचास सालों में अथक मेहनत के दम पर हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब में तीन बड़े कारखानों तृप्ति मैडिकेयर, पौंटिका ऐरोटेक लिमिटिड और पैकेजिंग कारोबार में कंपनी स्थापित करने वाले मदन लाल गर्ग अब साधारण आदमी सा जीवन जी रहे हैं। जनवरी 2019 में उन्होंने मुंबई की ‘नेकी की दीवार’ के बारे सुना और इसी मॉडल को पांवटा साहिब में अपना लिया। अपने जान– पहचान वालों से पुराने कपड़े दान करने की अपील की और ‘नेकी की दीवार’ की शुरूआत हो गई।
पानीपत : आपातकाल से चौपट हो गया कारोबार
मदन लाल गर्ग का जन्म पंजाब के पटियाला जिला के सामाना मंडी में कपड़े की छोटी सी पुश्तैनी दुकान चलाने वाले धार्मिक प्रवृति के मालिक नंद लाल गर्ग के घर हुआ। उन्होंने चंडीगढ़ से ग्रेजुएशन किया कर पिता के साथ कारोबार में हाथ बंटाना शुरु कर दिया। कारोबार बढ़ा तो बड़ा करने की सोच लेकर वर्ष 1974 में पानीपत के पास नट– बोल्ट बनाने का छोटा सा कारखाना लगाया। नया कारोबारअभी पूरी तरह से स्थापित भी नहीं हो पाया था कि साल 1975 में देश में आपातकाल लगने से सब चौपट हो गया। भारी घाटा होने के बाद वर्ष 1976 में मदन लाल गर्ग जमीन पर आ गए, पर सकारात्मक ऊर्जा बनी रही।
दिल्ली : मेहनत से पाया मुकाम
मदनलाल गर्ग ने 1976- से लेकर 1982 तक छह सालों तक पुश्तैनी कपड़े के कारोबार को खड़ा किया। कंस्ट्रक्शन के काम में हाथ आजमाने शुरु कर दिए। साल 1982 में दिल्ली जाकर इसी काम पर फोकस किया। बेटा प्रभात गर्ग पढ़- लिखकर अमेरिका में स्थापित हो गया। आज वो किसी आईटी कंपनी में जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत है। दोनों बेटियों की शादी हो गई। मदन गर्ग का कंस्ट्रक्शन कारोबार का सिलसिला साल 2006 तक चला। बाईपास सर्जरी करवानी पड़ी और कंस्ट्रक्शन कंपनी बंद करना मजबूरी हो गई और मदन लाल गर्ग सामाना मंडी लौट आए।
पांवटा साहिब : 600 करोड़ का कारोबार
मदनलाल गर्ग के एक दामाद का पांवटा साहिब में छोटा सा कारखाना था। ससुर का मन लगा रहे, इसलिए दामाद ने उनको अपने पास बुला लिया। मदन लाल गर्ग ने दामाद के कारोबार में हाथ बंटाकर अपने कारोबारी अनुभव व कुशल प्रबंधन से छोटी की कंपनी को बड़ा कारोबारी समूह बनाने में अहम रोल अदा किया। साल 2006 में चंद करोड़ का कारोबार करने वाली तृष्ति मैडिकेयर साल 2019 तक आते– आते तीन कंपनियों का बड़ा समूह बन गया गई और कारोबार छह सौ करोड़ सालाना से अधिक हो गया । इन तीनों कंपनियों में मदनलाल गर्ग की बड़ी आर्थिक हिस्सेदारी है।

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