5000 साल पुराना, 200 ग्राम का दाना : करसोग घाटी के ममेल गांव में स्थित है ममलेश्वर महादेव का मंदिर

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मंडी से संजय भारद्वाज की रिपोर्ट
क्या आपने कभी 200 ग्राम वजन का गेहूं का दाना देखा है वो भी महाभारत काल का यानी कि 5000 साल पुराना? यदि नहीं तो आप इसे स्वयं अपनी आंखों से देख सकते है। इसके लिए आपको जाना पड़ेगा ममलेश्वर महादेव मंदिर जो प्रदेश की करसोग घाटी के ममेल गांव में स्थित है। हिमाचल प्रदेश जिसे देवभूमि भी कहा जाता है। इसके प्रत्येक कोने में कोई न कोई प्राचीन मंदिर स्थित है। उन्हीं में से एक है ममलेश्वर महादेव मंदिर जो कि भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस मंदिर का संबंध पांडवो से भी है, क्योंकि पांडवो ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इसी गांव में बिताया था।देव पशकोट: चौहार घाटी के पहाड़ी बजीर, जोगिंद्रनगर से 31 दूर किलोमीटर मराड़ में है प्रसिद्ध मंदिर


भीम ने मारा था एक राक्षस, विजय की याद में अखंड धुना  
इस मंदिर में एक धुना है जिसके बारे में मान्यता है कि ये महाभारत काल से निरंतर जल रहा है। इस अखंड धुनें के पीछे एक कहानी है कि जब पांडव अज्ञातवास में घूम रहे थे तो वे कुछ समय के लिए इस गांव में रुके। तब इस गांव में एक राक्षस ने एक गुफा में डेरा जमाया हुआ था। उस राक्षस के प्रकोप से बचने के लिये लोगों ने उस राक्षस के साथ एक समझौता किया हुआ था कि वो रोज एक आदमी को खुद उसके पास भेजेंगे ताकि उसके भोजन के लिए जिससे कि वह सारे गांव को एक साथ न मारे। एक दिन उस घर के लड़के का नंबर आया जिसमें पांडव रुके हुए थे। उस लड़के की मां को रोता देख पांडवों ने कारण पूछा तो उसने बताया कि आज मुझे अपने बेटे को राक्षस के पास भेजना है। अतिथि के तौर पर अपना धर्म निभाने के लिए पांडवों में से भीम उस लड़के की बजाय खुद उस राक्षस के पास गया। भीम जब उस राक्षस के पास गया तो उन दोनों में भयंकर युद्ध हुआ और भीम ने उस राक्षस को मारकर गांव को उससे मुक्ति दिलाई। कहते हैं कि भीम की इस विजय की याद में ही यह अखंड धुना जल रहा है।यहां है आधा शिव, आधा पार्वती रूप, कांगड़ा जिले के इंदौरा में हैं काठगढ़ महादेव का मंदिर

शिव-पार्वती की युगल मूर्ति
मंदिर के मुख्य भवन की चारों ओर दीवारों पर काष्ठ मूतिज़्यां बनी हैं। मंदिर की मुख्य इमारत लकड़ी की है। लकड़ी की दीवारों पर बेहतरीन नक्काशी है, जिसमें देवी-देवताओं के साथ अन्य मूतिज़्यां उकेरी गई हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान शंकर व मां पार्वती की मूर्ति युगल के रूप में स्थापित है। मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर भी शिव-पार्वती की युगल मूर्ति है।कभी यहां बसता था बिलासपुर का एक शहर : गर्मियों में जब जलस्तर गिर जाता है तो यहां के मंदिर व खंडहर एक शहर की यादें जिंदा कर देते हैं

भीम का ढोल

 शिव-पार्वती को समर्पित मंदिर
यह मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस मंदिर में सबसे प्रमुख गेहंू का दाना है जिसे पांडवों का बताया जाता है। यह गेहूं का दाना पुजारी के पास रहता है। यदि आपको यह देखना हो तो इसके लिए पुजारी से कहना पड़ेगा।

पांच शिवलिंगों की अनोखी कहानी


यहां प्रचलित मान्यता के अनुसार, मंदिर में पांच पांडवों के पांच शिवलिंग भी स्थापित हैं। धारणा है कि भगवान परशुराम ने करसोग घाटी में 80 शिवलिंगों की स्थापना की थी और 81वां शिवलिंग भगवान शिव की प्रतिमा के रूप में इस मंदिर में स्थापित किया था। मंदिर की काष्ठ कला और शैली उत्कृष्ट है।यहां से किसी को भी निराश नहीं जाने देते मगरू महादेव छतरी, 13वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की पाषाण प्रतिमाएं हैं दर्शनीय

पांडवों से गहरा नाता
इस मंदिर में एक प्राचीन ढोल है जिसके बारे में कहा जाता है कि ये भीम का ढोल है। इसके अलावा मंदिर में स्थापित पांच शिवलिंगों के बारे में कहा जाता है कि इसकी स्थापना स्वयं पांडवों ने की थी। और पुरात्तव विभाग भी इन सभी चीजों की अति प्राचीन होने की पुष्टि कर चुका है।

मंदिर के समीप ही दी जाती थी नर बलि
इस मंदिर के पास एक प्राचीन विशाल मंदिर और है जो सदियों से बंद पड़ा है। माना जाता है कि इस मंदिर में प्राचीन समय में भूंडा यज्ञ किया जाता था जिसमें की नर बलि भी दी जाती थी। तब भी इस मंदिर में केवल पुजारियों को ही प्रवेश की अनुमति थी। अब भी इस मंदिर में केवल पुजारी वर्ग को ही जाने की आज्ञा है।

ऐसे पहुंचे ममलेश्वर मंदिर

ममलेश्वर महादेव मंदिर जाने के लिए आप मंडी और शिमला दोनों रास्तों से करसोग पहुंच सकते हैं। शिमला से करसोग की दूरी करीब 115 किलोमीटर है। शिमला से करसोग को बसें जाती हैं। आप निजी वाहन से भी जा सकते हैं। अगर शिमला से सुबह निकलें तो मंदिर के दर्शन कर उसी दिन शिमला वापस आ सकते हैं। ममलेश्वर महादेव का मंदिर करसोग बस स्टैंड से मात्र दो किलोमीटर दूर है। मंदिर परिसर में ठहरने की व्यवस्था मुफ्त उपलब्ध है।शत्रु पर विजय पाने के लिए करते हैं बनखंडी में बगलामुखी की साधना, अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने बनाया था यह प्राचीन मंदिर


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