पुस्तक समीक्षा :- रंग बिरंगी दुनिया की सैर का आनंद, ‘दुनिया जैसी मैंने देखी- 43 किस्से मेरी विदेश यात्राओं से’

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पुस्तक समीक्षा :- रंग बिरंगी दुनिया की सैर का आनंद, ‘दुनिया जैसी मैंने देखी- 43 किस्से मेरी विदेश यात्राओं से’
समीक्षक – विनोद भावुक
भारत में शवों को जलाना मृत्यु संस्कार हैं, लेकिन अफ्रीका में हिंदुओं के इस संस्कार को उनके सबसे घटिया कृत्य के तौर देखा जाता है। वहां के समाज में अपने प्रिय को मौत के तुरंत बाद आग के हवाले कर देने की बात सोचना तक गुनाह समझा जाता है। सुनने में अटपटा लगे लेकिन यह सच है कि इराक में सभी महमानों को एक ही गिलास से पानी पिलाने का रिवाज है। एक मेहमान के पानी पीने के बाद गिलास को धोया नहीं जाता, बल्कि उसे फिर से भर पर दूसरे मेहमान को भेंट कर दिया जाता है। मंडी के फल वैज्ञानिक डॉ. चिरंजीत परमार की पुस्तक ‘दुनिया जैसी मैंने देखी- 43 किस्से मेरी विदेश यात्राओं से’ को पढ़ते हुए ऐसे ही चिलचस्प किस्सों से दो- चार होते हुए हम रंग बिरंगी दुनिया की सैर करते चलते हैं। इस पुस्तक में उन्होंने सभी महाद्वीपों के 34 देशों की अपनी यात्राओं के 43 किस्सों को सरल हिंदी में रोचक व मंनोरजक बनाकर पाठकों के समुख प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा मुहावरेदार है और इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक को यह कतई नहीं लगता कि किस्सागोई की इस किताब का लेखक कोई स्थापित लेखक होने के बजाये एक फल वैज्ञानिक है। बता दें कि हिमालय के जंगली फलों पर शोध करने वाले इकलौते वैज्ञानिक डॉ. चरणजीत परमार www.fruitipedia.com का संचालन करते हैं। यह भी काम रोचक नहीं है कि 80 साल की उम्र में एक वैज्ञानिक ने अपने विदेशों के अनुभवों को एक पुस्तक के तौर पर हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध करवाया है।
यात्रा में सहयात्री हो जाता पाठक
अस्सी के दशक से शुरू हुआ उनकी विदेश यात्राओं का सिलसिला चार साल पहले तक निरंतर चलता रहा। अधिकतर विदेश यात्राओं में उनकी पत्नी सहयात्री रहीं। हर किस्से को पढ़ते हुए पाठक भी उनकी यात्राओं में उनका सहयात्री हो जाता है। अपने हर यात्रा वृतांत में ऐसी दिलचरूप जानकारी पाठक के सामने रखते हैं कि पहले किस्से को पूरा पढ़े ही पाठक अगले किस्से को पढऩे के लिए उत्सुक हो जाता है। हर संस्मरण से जुड़े चित्र उस किस्से से जुड़े देश और काल का परिचय देने में बेहद सहयोगी होते हैं। लेखक हर किस्से को आधार बना कर उस देश की सभ्यता, समाज, रहन- सहन, शिक्षा, संस्कृति, शिष्टाचार,कानून व्यवस्था, उद्योग, व्यवसाय व पर्यटन की सूचना देने के साथ वहां के समाज की विसंगतियों पर भी अपनी कलम चलाते हैं। पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक अपने अध्यापन के पेशे के साथ साथ हर देश की आधिकारिक जानकारियां भी जुटाते रहे, जो इस पुस्तक की विषयवस्तु को रोचक बनाने में वरदान साबित हुईं।
लंदन में धूप को तरसते अंग्रेज
पुस्तक की शुरूआत साल 1984 के एक किस्से से होती है, जब लेखक ने लाइबेरिया के विश्वविद्यालय में दो साल पढ़ाने का अनुबंध पूरा होने पर भारत लौटने से पहले न्यूयार्क व लंदन रूकने का कार्यक्रम बनाया। लंदन से 70 किलोमीटर दूर रैंडिंग में रहने वाले अपने कॉलेज के सहपाठी बलराज के गेस्ट बने लेखक पाठकों को लंदन के मौसम से परिचित करवाने के लिए ‘वैरी गुड’ वाले प्रसंग को हाइलाइट करते हैं। रैंडिंग में धूप खिलने पर अंग्रेज ‘गैरी गुड’ बोल कर जश्र क्यों मना रहे हैं। इसमें खास क्या है? भारत में नौ महीने धूप निकलती है। तह तक जाने पर लेखक को पता चलता है कि यहां साल में महज 15- बीस दिन ही ऐसी धूप निकलती है। अंग्रेज धूप के लिए इतना तरसते हैं कि जिस दिन धूप निकलती है, उस दिन को वैरी गुड बोल कर जश्न मनाते है। लेखक के मुताबिक धूप के मामले में भारतीय लक्की हैं।
पचास डॉलर का भारतीय ताबीज
लेखक पश्चिमी अफ्रीका के देश लाइबेरिया की इकलौती युनिवर्सिटी के एग्रीकल्चर कॉलेज में वे 1982 से 84 तक हॉर्टीकल्चर के एसीस्टेट प्रोफेसर रहे। सर की जगह प्रोफेसरों को प्रोफ, डॉक अथवा नाम से पुकारने वाले, कोक व हेम्बर्गर लेकर क्लास में आने वाले स्टूडेंट्स के बर्ताव को सुधारने का किस्सा हो अथवा विज्ञापन पढ़ कर पचास डॉलर खर्च कर भारतीय ताबीज खरीदने वाले क्लर्क सोको का किस्सा हो, लेखक लाइबेरिया के सांस्कृतिक व सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं। लाइबेरिया के कई किस्से पुस्तक का हिस्सा हैं।
ठगों का जाल
ठगों का जाल पूरी दुनिया में फैला हुआ है। अमरीका की तीसरी यात्रा के दौरान साल 1995 में न्यूर्याक में ब्रिटिश एयरबेज के बुंकिंग ऑफिस में चोर पलक झपकते ही लेखक का बैकपैक ले उड़ा था। लेखक को आशंका है कि वहां सब लोग आपस में मिले होते हैं। ‘लंदन के चोर’ शीर्ष से ऐसा ही एक किस्सा लंदन में भी उनके साथ घाटित हुआ। इसी तरह वह जनेवा के ठग दुकानदारोंं की भी एक किस्से में पोल खोलते हैं।
किफायत व कंजूसी
लाइबेरिया में अपनी महिला सहयोगी मैलवीना आकेच के प्रसंग के बहाने लेखक बताते हैं कि वहां के रेस्तंराओं में महिला बिल अदा करे, इसे बुरा समझा जाता है। विदेश में कमाने जाने वाले अधिकतर भारतीय किफायत व कंजूसी बरतते हैं। महिला सहयोगी से फिफ्टी फिफ्टी बिल अदा करने की तरकीक ढूंढने का किस्सा भी लाजवाब है। अमरीका की स्टार्क ब्रदर्ज नर्सरी की यात्रा को वह किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं मानते। सत्यांनद स्टोक्स ने इसी नर्सरी के डलीसियस किस्म के सेब के पौधे लोकर शिमला में सेब उत्पादन की पहल की थी, जिसने हिमाचल को बागवानी उद्योग में शिखर पर पहुंचाने में बड़ी भूमिका अदा की।
रोचक जानकारियों से भरपूर पुस्तक
अमरीका का भैंस फार्म हो, इंडोनेशिया के बाली में होने वाली रामलीला के मंचन का प्रसंग अथवा मुश्लिम देश कम्बोडिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर, हर किस्सा पाठक के ज्ञान को आकार- व विस्तार देता है। परमार हमें 1980 – 81 के बगदाद में भी लेकर चलते हैं। यह सद्दाम हुसैन के शासन के शुरूआती दिन है। वहां की कानून व्यवस्था की स्थिति और अपराधियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई के एक किस्से के जरिये वह कामना करते हैं कि काश भारत में भी यहां जैसी कानून व्यवस्था हो। साल 1990 में दो महानों की जापान यात्रा के अनुभवों को सांझा करते हुए लेखक जापानियों के समय के पांबंद होने व सफाई के प्रति गंभीरता को लेकर रोचक जानकारियां प्रदान करते हैं।
पर्यटन व पर्यटक स्थलों की बात
डैनमार्क की राजधानी कोपनहैगन की लिटल मार्मेड मूर्ति व बेलिज्यम की राजधानी ब्रुस्सेल्ज की मैनेकिन मूर्ति बेशक पर्यटकों के आकर्षण का केेंद्र हो, लेकिन लेखक को यह मूर्तियां ज्यादा प्रभावित नहीं करतीं हैं। पुस्तक में मूर्तियों की स्थापना से जुड़े हुए इतिहास पर हाथ रखते हुए लेखक पर्यटन से जुड़े इन स्थलों की विस्तृत जानकारी पाठकों को परोसते हैं।अफ्रीका के आखिरी छोर केप प्वांइट, अर्जेटीना के कामोत्तेजक नृत्य टैंगो, रियो डि जनेरो की यात्रा, ब्यूनस आयर्स की सिमेटरी, पैरिस व डैड सी जैसे पर्यटक स्थलों को भी किस्सों में बांध कर पाठकों के मानसिक पटल पर अटल कर देते हैं। वे वकालत करते हैं कि जोगेंद्रनगर- बरोट ट्रामवे अमरीका, ब्राजील व हाँगकाँग की ट्राम वे से बेहतर हो सकती है।
हिरोशिमा व जोहांसबर्ग
लेखक जहां जापान के हिरोशिमा शहर की यात्रा के साथ परमाणु बम गिराए जाने की घटना का स्मरण करते हुए हृदयविहिन राजनीति पर व्यंग्य कसते हैं, वहीं जोहांसबर्ग के उपनगर सावेता में नेल्सन मंंडेला के निवास की सैर के साथ दक्षिणी अफ्रीका के लोकतंत्र के हीरो नेल्सन मंडेला के प्रति आभार पकट करते हैं। ‘स्वीडन का थाना’, ‘स्वीडन के नाजुक बदन वैज्ञानिक’, ‘स्वीडन में बेरोजगारी भत्ता’, ‘बगदाद युनिवर्सिटी के पे पैकेट’ जैसे किस्से भी पाठकों की सोच के आकार को विस्तृत करते हैं।
ब्लॉग से पुस्तक तक
पुस्तक की प्रस्तावना में ही डॉ. चिंरजीत परमार साफ कर देते हैं कि मंडी से सम्बन्ध रखने वाले प्रतिष्ठित एवं वयावृद्व कहानीकार प्रोफेसर सुंदर लोहिया अक्सर उन्हें विदेश यात्राओं के किस्सों को किताब का रूप देने के लिए जोर देते थे। चार साल पहले दोहते मेजर शौर्या की तकनीकी मदद से उन्होंने अपनी विदेश यात्राओं के संस्मरण अपने ब्लॉग around the world in search of fruits friends and new experiences लिखने शुरू किए। कुछ ब्लॉग्स अंग्रेजी में लिखे और फिर हिंदी में लिखने का सिलसिला शुरू हो गया। ये तमाम किस्से ब्लू हाउस पब्लिेकेशन के जरिये ‘दुनिया जैसी मैंने देखी- 43 किस्से मेरी विदेश यात्राओं से’ किताब के रूप में 2019 में पाठकों के सामने आए। इस किताब का मूल्य मात्र 175 रूपए है और पुस्तक ऑनलाइन भी उपलब्ध है।

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