कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो, वरिष्ठ पत्रकार सुनील शर्मा ने गोहर में तैयार की सेब की डिलिशियस किस्में 

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कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो, वरिष्ठ पत्रकार सुनील शर्मा ने गोहर में तैयार की सेब की डिलिशियस किस्में 
गोहर से विनोद भावुक की रिपोर्ट
‘कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से फैंको यारो….’ इस कहावत को चरितार्थ किया है गोहर उपमंडल मुख्यालय के सुनील शर्मा ने। वरिष्ठ पत्रकार सुनील शर्मा ने गोहर में सेब की डिलिशियस किस्में तैयार कर क्षेत्र में सेब बागवानी की संभावनाओं को नया रास्ता दिखाया है। सुनील शर्मा ने दो साल के अपने छोटे से बगीचे में इस बार करीब 20 क्विंटल सेब की पैदावार की है और वह ऐसा करने वाले मुख्यालय के पहले बागवान हैं। सुनील शर्मा कहते हैं कि उनके पास 252 वर्ग मीटर के दो पॉलीहाउस हैं, जिनमें उन्होंने पहले सब्जियां तथा बाद में फूलों की खेती की। फूलों की खेती में अच्छा मुनाफा है, लेकिन इसमें किसान पूरी तरह बंध जाता है। यहीं से उन्होंने कुछ नया कर गुजरने की सोची। इसी कड़ी में उन्होंने अपने पॉलीहाउस को नैटहाउस में परिवर्तित कर सेब की खेती के बारे सोचना शुरू किया। चूंकि गोहर मुख्यालय उपमंडल में सबसे कम ऊंचाई वाला क्षेत्र है तथा यहां की समुद्र तल से ऊंचाई 4000 फुट के करीब है, इसलिए बागवानी से जुड़े अधिकतर जानकारों ने उनके विचारों को सिरे से खारिज कर दिया। इसी बीच नर्सरी कारोबार से जुड़े स्व. तुलसी दास शर्मा ने उनको प्रोत्साहित किया तथा सेब के कुछ पौधे लगाकर ट्रायल करने की सलाह दी।
जोखिम उठाने का मिला लाभ
सुनील शर्मा पर जनून सवार था। उन्होंने दिसंबर 2017 में एम-9 किस्म के 350 पौधों को मंगवाने का निर्णय लिया। पौधों की खेप मई 2018 में पहुंची और उनकी भरपूर देखभाल के बावजूद 350 में से करीब 170 पौधे खराब हो गए। सुनील कहते हैं कि इससे उनको बहुत निराशा हुई लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने बचे हुए पौधों की अच्छी सेवा की और इसी बीच विभिन्न स्थानों में जाकर पौधों के बारे जानकारी प्राप्त करते रहे। उनकी मेहनत रंग लाई और पौधों में सेब की अच्छी फसल आई। एक साल के पश्चात ही बचे हुए पौधों से 9 क्विटल सेब की फसल तैयार हुई। फसल अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा पहले तैयार हो गई जिससे कि उन्हें मार्केट में अच्छे दाम मिले और उन्हे 60-65 हजार की आय प्राप्त हुई।
तोड़ दिया मिथक
सुनील ने बगीचे में खाली हुई जगह में भी पौधे लगा लिए और वर्तमान में उनके पास डार्कबैरोन गाला, शनिको रैड, किंग रोट, रैड विलोक्स तथा जैरोमाईन के करीब 350 पौधे हैं। इस बार मौसम के चलते सेब की फसल काफी कम है लेकिन इसके बावजूद भी दो साल के कुछ पौधों से सुनील ने करीब 20 क्विंटल फसल से डेढ़ लाख की आमदनी प्राप्त की। सुनील का कहना है कि क्षेत्र में सेब की पैदावार न होने के मिथक को उन्होंने गलत साबित करने का प्रयास किया है और इसमें वे सफल रहे हैं।
सेब बदल सकता है गोहर का चेहरा
सुनील शर्मा कहते हैं कि यह क्षेत्र थोड़ा गर्म है, इस करके हमें सबसे बड़ा फायदा यह है कि हमारी फसल पहले तैयार हो जाती है, जिससे कि मार्केट में अच्छे दाम मिलने की पूरी संभावना रहती है। युवाओं का आवाहन करते हुए सुनील कहते हैं कि क्षेत्र के युवा यदि वैज्ञानिक तरीक़े से सेब की खेती करते हैं तो आने वाले समय में यह जहां उनके लिए रोजगार का स्थाई स्त्रोत होगा। क्षेत्र की तरक्की के लिए भी यह कारगर साबित होगा।

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