फॉसिल ट्री:जापान में परमाणु विस्फोट के बाद भी जिंदा रहा स्मरण शक्ति बढ़ाने वाला दुनिया का सबसे पुराना एवं दुर्लभ पेड़ है जिंको सीएसआईआर- हिमालयन जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर के जैव विविधता फार्म में तैयार हैं जिंको बाइलोबा के तीस हजार पौधे

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फॉसिल ट्री:जापान में परमाणु विस्फोट के बाद भी जिंदा रहा स्मरण शक्ति बढ़ाने वाला दुनिया का सबसे पुराना एवं दुर्लभ पेड़ है जिंको
सीएसआईआर- हिमालयन जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर के जैव विविधता फार्म में तैयार हैं जिंको बाइलोबा के तीस हजार पौधे
पालमपुर से विनोद भावुक की रिपोर्ट
जापान के हिरोशिमा में 1945 में हुए परमाणु बम विस्फोट के दो किलोमीटर के बीच के दायरे में लगे जिंको बाइलोबा के छह पेड़ उन चंद जीवित वस्तुओं में से थे, जो उस क्षेत्र में हुए विस्फोट के बावजूद बचे रहे।विस्फोट से उस क्षेत्र के लगभग सभी अन्य पौधे और जानवर नष्ट हो गए थे। हालांकिपरमाणु विस्फोट से जिंको बाइलोबा के पेड़ भी जल गए थे, लेकिन वे बच गए और जल्द ही फिर से हरे हो गए। हिरोशिमा के ये पेड़ आज भी जीवित हैं। जिंको बाइलोबा न्यूक्लियर पॉल्यूशन से बचाव करने वाला पेड़ है। धरती पर मानव सभ्यता की गवाह कहे जाने वाली डायनासोर युग की दुर्लभ वृक्ष प्रजाति जिंको बाइलोबा के वजूद को बचाने के लिए नेशनल मेडीसनल प्लांट्स बोर्ड की परियोजना वरदान साबित हुई है। नेशनल मेडिसनल प्लांट्स ने सीएसआईआर- हिमालयन जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर को परमाणु प्रदूषण से बचाने वाले दुनिया के सबसे पुराने औषधीय पेड़ जिंको बाइलोबा की प्रमाणिकवंशवृद्वि और कृषि तकनीक विकसित करने के लिए दो चरणों में वित्त पोषण किया।
डेढ़ दशक की मेहनत के बाद कामयाबी
जनवरी 2005 में इस परियोजना पर काम शुरू हुआ। मसूरी, देहरादून, रानीखेत, नैनीताल, शिमला, मनाली व कल्पा से जिंको बाइलोबा की कलमें जुटाकर इसकी वंशवृद्वि के लिए पालमपुर में प्लांटिंग शुरू की गई। वर्ष 2007 में चीन से जिंको बाइलोबा के बीज मंगवाकर जर्मीनेशन ट्रायल शुरू हुआ। यह अहम परियोजना सीएसआईआर- हिमालयन जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर के वैज्ञानिक डॉ. गोपी चंद के नेतृत्व में आगे बढ़ी और वर्तमान में संस्थान के वैज्ञानिक रामजी लाल मीणा इस परियोजना की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। संस्थान के वैज्ञानिक कलम और बीज दोनों विधियों से जिंको बाइलोबा का क्वालिटी प्लांटिंग मैटीरियल विकसित करने में सफल रहे हैं। संस्थान के निदेशक डॉ. संजय कुमार कहते हैं कि संस्थान के जैव विविधता फार्म में पांच एकड़ पर जिंको बाइलोबा के तीस हजार पौधे तैयार हैं। संस्थान के लाहौल स्थित रिसर्च सेंटर में भी जिंको बाइलोबा के पौधे विकसित करने में कामयाबी हासिल की है। आठ हजार पौधे हिमाचल प्रदेश वन विभाग, गैर सरकारी संस्थाओं व किसानों को आबंटित किए हैं।
कलम और बीज दोनों से सफल प्रयोग
नेशनल मेडीसनल प्लांट्स बोर्ड की इस परियोजना के तहत सीआएसआईआर- हिमालयन जैवसंपदा प्रोद्योगिकी संस्थान पालमपुर के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2005 से 2013 तक दो चरणों में जिंको बाइलोबा की वंश बढ़ोतरी के लिए प्रयोग किए और कलम और बीज दोनों तरीकों से इसकी प्रमाणिकपौधे विकसित करने की एग्रो टेक्नीक विकसित की। प्रयोगशाला और नर्सरी में विभिन्न प्रयोग कर संस्थान के वैज्ञानिकों ने जिंको बाइलोबा का क्वालिटी प्लांटिंग मैटीरियल विकसित करने में सफलता हासिल की है। नेशनल मेडीसनल प्लांट्स बोर्ड अब इस पौधे के व्यापक कृषिकरण की तैयारियों में है।
यहां पैदा हो सकता है जिंको बाइलोबा
सीएसआईआर- हिमालयन जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार जिंको बाइलोबा को समुद्रतल से 500 मीटर से लेकर 3500 मीटर की ऊंचाई तक उगाया जा सकता है। इसकी खेती के लिए 10 डिग्री सेल्शियस से लेकर 25 डिग्री सेल्शियस तक तापमान आदर्श है। वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि पांच साल तकनर्सरी में तैयार पौधे का ही रोपण करना चाहिए। जिंको वाइलोबा का क्लालिटी प्लांटिंग मैटीरियल सीआएआईआर हिमालयन जैवसंपदा प्रोद्योगिकी संस्थान पालमपुर से प्राप्त किया जा सकता है।
प्रति हेक्टेयर होगी दो लाख कमाई
7- 8 साल के बाद जिंको बाइलोबा आय देना शुरू करता है। इसे फार्म में लगाने के साथ खेतों की मेढ़ों पर भी लगाया जा सकता है। जिंको बाइलोबा से प्रति हैक्टेयर डेढ़ क्विंटल तकसूखी पत्तियां प्राप्त की जा सकती हैं। दवा उद्योग में वर्तमान में जिंको बाइलोबा की पत्तियां 300- 400 रूपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिक रही हैं। ऐसे में कृषिकरण के तमाम खर्चे निकालने के बाद सलाना प्रति हेक्टेयर दो लाख से ज्यादा की आय हासिल की जा सकती है।
लाइलाज रोगों में रामबाण हैं पत्तियां
जिंको बाइलोबा की पत्तियों के चिकित्सीय प्रभावों पर दुनिया भर के तीन सौ वैज्ञानिकों ने अध्ययन और शोध किया और इसके बाद मानव सभ्यता के लिए इस पेड़ के नए युग का सूत्रपात हुआ। जिंको बाइलोबा की पत्तियों में मौजूद जिंको लाइड्स व ग्लाइको साइड्स रसायन अल्जाइमर, कैंसर, जोड़ों का दर्द, किमोथैरेपी के दुष्प्रभाव कम करने व अवसाद जैसे लाइलाज रोगों में रामबाण है। जिंको बाइलोबा को स्मरण शक्ति वृक्ष भी कहते हैं।
दवा उद्योग में तेजी से बढ़ रही मांग
दवा उद्योग में जिंको बाइलोबा की पत्तियों की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है। इसका सत्व दुनिया के टॉप दस कमर्शियल उत्पादों में शामिल है और इसकी मांग में सलाना 26 से 32 प्रतिशत बढ़ोतरी हो रही है। चिकित्सा जगत में बढ़ती मांग को देखते हुए जिंको बाइलोबा के वंश को बढ़ाने की दुनिया भर मे कोशिशें हो रही हैं। प्रमाणिक कृषि तकनीक के जरिये दुनिया के सबसे पुराने औषधीय पेड़ की खेती पर जोर दिया जा रहा है।
चीन का धार्मिक व राष्ट्रीय पेड़
जिंको चीन का मूल धार्मिकपेड़ है। यह पेड़ चीन का राष्ट्रीय पेड़ भी है। बौद्ध मठों में इसका खास महत्व है। इसकी पत्तियों का चीनी चिकित्सा पद्धति में लगभग डेढ़ हजार वर्षो से उपयोग होता आ रहा है। चीन में लंबे समय से जिंको बाइलोबा की खेती होती आ रही है। माना जाता है किबौद्ध मठों में स्थित पेड़ 1,500 साल पुराने हैं। आज से 350 साल पहले तक इस गुणकारी पेड़ के औषधीय गुणों के बारे में केवल चीन के लोग ही जानते थे। चीन से ही इसके बीज जापान ले जाए गए। बौद्ध धर्म में इस पेड़ की खास हैसियत के चलते कोरिया और जापान के कुछ हिस्सों में इसे बड़े पैमाने पर लगाया जाता है। वर्ष 1690 में जर्मन वनस्पति शास्त्री केंफर इन्गेलबर्ट ने जब जापानी मंदिर के बागानों में इस पेड़ को देखा तब यूरोपीय लोगों का इस पेड़ के साथ पहला परिचय हुआ। इस पेड़ के औषधीय गुणों के चलते यूरोप और अमेरिका में भी इस पेड़ को लेकर संरक्षण की पहल हुई।
खतरे में है जिंको बाइलोबा का वजूद
धरती पर मानव सभ्यता का गवाह कहे जाने वाले जिंको बाइलोबा वृक्ष का वजूद संकट में है। भारत में इसके मात्र 33 ही पेड़ बचे हैं। बचे हुए पेड़ों में भी 60 प्रतिशत पेड़ों की उम्र 30- 35 साल के बीच है, जबकि 40 प्रतिशत पेड़ सूखने लगे हैं। जिंको बाइलोबा के प्राकृतिक पुनरोत्पादन में नर के साथ मादा पेड़ का होना जरूरी है, तभी बीज बनते हैं। मादा पेड़ विलुप्त हो रहे हैं, इसीलिए पेड़ के वजूद पर संकट है।

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