100 साल का दुर्लभ लसियाड़े का पेड़, गांव के हर घर तक जिसके फलों की सब्जी की पहुँच

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100 साल का दुर्लभ लसियाड़े का पेड़, गांव के हर घर तक जिसके फलों की सब्जी की पहुँच
धलूँ गांव से विनोद भावुक की रिपोर्ट
यह कोई बोधि वृक्ष नहीं, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था, लेकिन इस पेड़ की काहानी भी बड़ी विचित्र है, जिसके बारे में शायद ही आप जानते होंगे। हैरानी होती है कि एक सदी से भी बुजुर्ग इस पेड़ का तना दशकों पहले खोखला हो चुका है, लेकिन चमत्कारिक रूप से यह पेड़ न केवल साँसे ले रहा है, बल्कि हर साल इस पेड़ के फल मौसमी सब्जी के तौर पर कई घरों के भोजन का हिस्सा बनती है. लसियाड़े का यह पेड़ कांगड़ा जिला के नगरोटा बगवां उपमंडल के तहत आते धलूँ डाकघर की पटियालकर पंचायत के कुफरी मैदान में स्थित है. गांव में कम ही घर होंगे, जहाँ इस पेड़ के फलों की कभी कबार सब्जी न बनी हो.
मार्च में लौट आती है हरियाली
साल भर सूखा सा दिखने वाला यह पेड़ हर साल मार्च का महीना आते आते हरा- भरा दिखने लगता है और अप्रैल के आते इसकी टहनियों पर पत्ते और छोटे- छोटे अंकुर( जिन्हें स्थानीय भाषा में कुर कहते हैं) आने शुरू हो जाते हैं. मई में अंकुर हरे रंग के छोटे फल का रूप धारण कर लेते हैं और जून आखिर और जुलाई के शुरू तक फल पकने शुरू हो जाते हैं. लसियाड़े के अंकुर से लेकर कच्चे और पक्के फल को कांगड़ा जनपद में मौसमी सब्जी के तौर पर खाया जाता है और इसका आचार भी बनाया जाता है.
पेड़ से जुड़े प्रसंग
इस गांव से संबंध रखने वाले शिक्षक एवं साहित्यकार भूपेन्द्र जम्वाल भुप्पी इस पेड़ से जुड़ा एक बताते हैं कि एक दौर वह भी था जब धलूँ स्कूल के शिक्षक भी इस पेड़ के लसियाड़े खाने को लेकर शौक़ीन रहते थे और स्टूडेंट्स अपने टीचर्स के लिए इस पेड़ के लसियाड़े तोड़ कर लाने को अपनी शान समझते थे. नेशनल मेडिसनल प्लांट बोर्ड के रिजनल फेस्लिटेशन सेंटर जोगेंद्रनगर के उपनिदेशक डॉ. सौरभ शर्मा के प्रयास से इस पेड़ की कलमें काट कर नए पौधे तैयार करने का सफल प्रयास हो चुका है. वे कहते हैं कि लसियाड़े के अधिकतर पेड़ बूढ़े हो चुके हैं. ऐसे में जरूरत है कि लसियाड़े के नए पौधे रोपे जाएँ.

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