10वीं सदी के समृद्ध ब्रजेश्वरी देवी के मंदिर को पांचवीं सदी में कई बार लूटा गया, 51 शक्तिपीठों में है ब्रजेश्वरी देवी, त्वचा के रोग व जोड़ों का दर्द दूर करता ब्रजेश्वरी देवी मां के मक्खन का प्रसाद,

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कांगड़ा से संजीव कौशल की रिपोर्ट

दुर्गा स्तुति में जिस नगरकोट का वर्णन किया गया है, वह हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा में स्थित है। यहां पर ब्रजेश्वरी मंदिर या कांगड़ा देवी मंदिर स्थित है। ब्रजेश्वरी देवी मंदिर को नगरकोट की देवी व कांगड़ा देवी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में इस मंदिर में इतना दान आता था कि यह सोना, चांदी, रत्नों से भरा रहता था। इसकी प्रसिद्धि सुनकर सन 1009 में महम्मद गज़ऩी ने यहां आक्रमण किया और सारा धन लूटकर ले गया। उसने मंदिर को ध्वस्त कर दिया, जिसे बाद में यहां के स्थानीय राजा ने बनवाया। इस मंदिर को नगरकोट धाम भी कहा जाता है। कांगड़ा का पुराना नाम नगरकोट था। कहा जाता है कि यह मंदिर पांडव काल में बनाया गया था। मंदिर के गृभगृह में माता एक पिंडी के रूप में विराजमान है। इस पिंडी की ही देवी के रूप में पूजा की जाती है। मंदिर में कई देवी- देवताओं की प्रतिमाएं विराजमान हैं। मंदिर के बायें तरफ भैरवनाथ की मूर्ति स्थापित है। भैरवनाथ को भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता है। ब्रजेश्वरी देवी का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। नवराात्रि के त्यौहार के दौरान बड़ी संख्या में लोग दर्शनों के लिए मंदिर में पहुंचते है। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी सती के पिता दक्षेस्वर द्वारा किये यज्ञ कुंड में उन्हे न बुलाने पर उन्होंने अपना और भगवान शिव का अपमान समझा और उसी हवन कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिये थे। तब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्माण्ड के चक्कर लगाने लगे। उसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया। जहां- जहां उनके शरीर के अंग गिरे वहां एक शक्तिपीठ बन गया। सती की बायां वक्षस्थल इस स्थान पर गिरा था, जिसे मां ब्रजेश्वरी या कांगड़ा माता के नाम से पूजा जाता है। यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था, इसलिए ब्रजेश्वरी शक्तिपीठ में मां के वक्ष की पूजा होती है। मां ब्रजेश्वरी देवी के इस शक्तिपीठ में प्रतिदिन मां की पांच बार आरती होती है। सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही सबसे पहले मां की शैय्या को उठाया जाता है। उसके बाद रात्रि के श्रृंगार में ही मां की मंगला आरती की जाती है। मंगला आरती के बाद मां का रात्रि श्रृंगार उतार कर उनकी तीनों पिंडियों का जल, दूध, दही, घी, और शहद के पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। उसके बाद पीले चंदन से मां का श्रृंगार कर उन्हें नए वस्त्र और सोने के आभूषण पहनाएं जाते हैं। फिर चना पूरी, फल और मेवे का भोग लगाकर मां की प्रात: आरती संपन्न होती है। दोपहर की आरती और मां को भोग लगाने की रस्म को गुप्त रखा जाता है। इस मंदिर के प्रति न केवल स्थानीय लोगोंं में गहन आस्था है, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से लोग मां के आशर्वाद के लिए यहां पहुंचते हैं। बृजवासियों की तो यह देवी कुलदेवी है। वे हर साल यहां आते हैं।धार्मिक पर्यटन – यहां कुदरत ने खुद किया मंदिर का निर्माण, खुद निर्मित होती हैं रहस्यमयी पींडियां, सुल्याल़ी के डिंबकेश्वर महादेव

ब्रजेश्वरी देवी मंदिर के तीन गुंबद हैं तीन धर्मों के प्रतीक
10वीं सदी तक समृद्ध मंदिर
एक आख्यान के अनुसार जालंधर दैत्य की अधिवासित भूमि जालंधर पीठ पर ही देवी ने वज्रास्त्र के प्रहार से उसका वध किया था।  प्रचीन कथा के अनुसार कांगड़ा में जालंधर दैत्य का किला हुआ करता था। इस दैत्य का वक्ष और कान का हिस्सा कांगड़ा की धरती पर गिरकर बज्र के समान कठोर हो गया था। उसी स्थान पर वज्रहस्ता देवी का प्राकट्य हुआ। वज्रवाहिनी देवी को शत्रुओं पर विजय पाने के लिए भी पूजा जाता रहा है। कहा जाता है कि माता का यह मंदिर 10वीं शाताब्दी तक बहुत ही समृद्ध हुआ करता था।शत्रु पर विजय पाने के लिए करते हैं बनखंडी में बगलामुखी की साधना, अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने बनाया था यह प्राचीन मंदिर

कई बार लूटा गया मंदिर
इस मंदिर को कईं विदेशी आक्रमणकारियों ने कई बार लूटा था। सन 1009 में मुहम्मद गजनी ने इस मंदिर को पूरी तरह से तबाह कर दिया था और इस मंदिर में चांदी से बने दरवाजों तक को उखाड कर ले गया था। मुहम्मद गजनी ने इस मंदिर को ही पांच बार लुटा था। उसके बाद 1337 में मुहम्मद बीन तुगलक और पांचवी शाताब्दी में सिंकदर लोदी ने भी इस समृद्ध शक्तिपीठ में लूट मचाई थी और नष्ट कर दिया था। इस मंदिर को कई बार लुटा और तोड़ा गया, लेकिन फिर भी इसे पुन: स्थापित किया जाता रहा। मंडी की बल्ह घाटी के राजगढ़ में है माता कोयला माता का मंदिर, जिसकी चट्टान से टपकता था घी


1905 के भूकंप में नुक्सान
1905 में बहुत बडा भूकंप आया था और उस भूकंप ने इस मंदिर को पूरी तरह से नष्ट कर दिया था। वर्तमान मंदिर का पुन: निर्माण 1920 में किया गया था। माता ब्रजरेश्वरी का यह शक्तिपीठ अपने आप में अनूठी और विशेष है क्योंकि यहां मात्र हिन्दू भक्त ही शीश नहीं झुकाते बल्कि मुस्लिम और सिख धर्म के श्रद्धालु भी इस धाम में आकर अपनी आस्था के फूल चढ़ाते हैं। ब्रजेश्वरी देवी मंदिर के तीन गुंबद इन तीन धर्मों के प्रतीक हैं। पहला हिन्दू धर्म का प्रतीक है, तो दूसरा मुस्लिम समाज का और तीसरा गुंबद सिख संप्रदाय का प्रतीक है।नाग मण्डोर को निमंत्रण को साथ शुरू होता चुवाड़ी का हर शुभ कार्य, चंबा जिला के चुवाड़ी में कुठेड़ गांव में है मंदिर


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