फ़ौजी ने बिलासपुर के गर्म इलाके में उगा दिया स्ट्रॉबेरी का बगीचा, कोविडकाल में हमीरपुर में प्राकृत लखनपाल का पायलट प्रोजेक्ट सक्सेस, मनाली में बन रहा स्ट्रॉबेरी का जैम

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फ़ौजी ने बिलासपुर के गर्म इलाके में उगा दिया स्ट्रॉबेरी का बगीचा, कोविडकाल में हमीरपुर में प्राकृत लखनपाल का पायलट प्रोजेक्ट सक्सेस, मनाली में बन रहा स्ट्रॉबेरी का जैम
मंडी से विनोद भावुक की रिपोर्ट
इस प्रेरक कहानी की शुरुआत कुछ अलग अंदाज में करते हैं। जंगली तौर पर पैदा होने वाली स्ट्रॉबेरी को उगाने की पहली कोशिश फ़्रांस में हुई और फ़्रांस के ब्रिटनी में स्ट्रॉबेरी का पहला बगीचा लगाया गया। प्रसंगवश, अंग्रेजी हुकूमत में भारत की ग्रीष्णकालीन राजधानी और वर्तमान में हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में स्ट्रॉबेरी हिल नाम का स्थान है तो ब्रिटेन की राजधानी लन्दन में भी स्ट्रॉबेरी हिल की जगह है। इतना ही नहीं, स्ट्रॉबेरी हिल नाम का रिसोर्ट्स भी है। भारत में स्ट्राबेरी की खेती की पहल का श्रेय हिमाचल प्रदेश को जाता है।1960 के दशक में हिमाचल प्रदेश के साथ- साथ उत्तर प्रदेश के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए ट्रायल हुए, लेकिन कई कारणों से किसानों ने इस फल को उगाने में कोई ख़ास रूचि नहीं दिखाई, लेकिन कोविड 19 के चलते पिछले दो साल में स्ट्रॉबेरी की सफल खेती कर हिमाचल के कई किसान- बागवान मिसाल पेश कर रहे हैं। इनके शामिल हैं भारतीय सेना के एक फ़ौजी जिन्होंने बिलासपुर जैसे कमोवेश गर्म इलाके में स्ट्रॉबेरी का बगीचा लगा दिया तो कोविडकाल में हमीरपुर में प्राकृत लखनपाल का स्ट्रॉबेरी उगाने का पायलट प्रोजेक्ट पूरी तरह से सक्सेस रहा और मनाली में स्ट्रॉबेरी की खेती के बाद अब किसान वैल्यू एडिशन कर स्ट्रॉबेरी का जैम बेच रहे हैं।
फौजी छुट्टी आया, स्ट्रॉबेरी का बगीचा लगाया
बिलासपुर जिले के झंडूता क्षेत्र के भटेड़ गांव के प्रवीण चंद भारतीय सेना में सैनिक हैं। छुट्टी पर घर आये प्रवीण ने सिरमौर के बागवानी विभाग से स्ट्रॉबेरी के पांच सौ पौधे खरीदे और अपने बगीचे की शुरुआत की और अब उनकी आधा बीघा जमीन पर स्ट्रॉबेरी के डेढ़ हजार पौधे फल दे रहे हैं। प्रवीण अपने स्ट्रॉबेरी के बगीचे में फव्वारा और टपक विधि से सिंचाई की करते है। बगीचे की देखभाल उनके पिता नंद लाल शर्मा करते हैं और उनकी मदद के लिए एक व्यक्ति को काम पर रखा है। स्थानीय बाजार में स्ट्रॉबेरी का दाम 200 से 300 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच रहता है। सेना में सेवायें देने के दौरान छुट्टी के सीमित समय गर्म इलाके में स्ट्रॉबेरी का बगीचा लगाने वाले प्रवीण ने कृषि आर्थिकी की नई राह निकाली है।
कोविडकाल में स्ट्रॉबेरी उगाई, हमीरपुर में चौखी कमाई
कोविडकाल में हमीरपुर के साथ लगते विकास नगर में 21 साल के युवा प्राकृत लखनपाल ने अपनी खाली भूमि पर सफाई करके ट्रायल के तौर पर स्ट्रॉबेरी के एक हजार पौधे लगाए, जो अब उसकी अच्छी आमदन का सोर्स बन गए हैं। प्राकृत लखनपाल ने बंगलुरु से स्ट्रॉबेरी के एक हजार पौधे मंगवाए और उन्हें अपनी जमीन में रोप कर सही ढंग से देखभाल की। मार्च माह से स्ट्रॉबेरी के पौधों पर फल लगना शुरू हुए और अब रोजाना 5 से दस किलो स्ट्राबेरी मिल रही है। प्राकत लखनपाल कहते हैं कि उन्होंने शौक के तौर पर स्ट्राबेरी लगाई थी, लेकिन जब अच्छा उत्पादन होने लगा तो उन्होंने इसे स्थ्क़नीय सब्जी मंडी में बेचना शुरू कर दिया।
मनाली में मिलता है लोकल स्ट्रॉबेरी जैम
कोरोना के चलते इंटरनेशनल टूरिस्ट डेस्टिनेशन मनाली के कई किसान स्ट्राबेरी की खेती की ओर मुड़े हैं। गधेरनी, बरोड़, पारसा और छियाल गाँवों के किसान दो वर्ष से बड़े पैमाने पर स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। गधेरनी के तुले राम ठाकुर बताते हैं कि वे लगभग छह बीघा भूमि पर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं और बीस हजार महीना कमा रहे हैं। लोग उनके पास स्ट्राबेरी के पौधे खरीदने भी पहुँच रहे है। बरोड़ गांव के दुनी चंद ठाकुर ने न केवल स्ट्रॉबेरी की खेती है, बल्कि उन्होंने स्ट्राबेरी से जैम बनाने की फैक्ट्री भी लगा ली है। उन्होंने फ्रेंच हिमालया ब्रांड नाम के साथ स्ट्रॉबेरी जैम को मार्केट में उतार दिया है।
स्ट्राबेरी की खेती बन रही आजीविका का आधार
आज अधिक उपज देने वाली विभिन्न किस्में, तकनीकी ज्ञान, परिवहन सुविधा, शीत भण्डार और प्रसंस्कण व परिक्षण की जानकारी होने से स्ट्राबेरी की खेती लाभप्रद व्यवसाय बनती जा रही है। मल्टी नॅशनल कम्पनियों ने स्ट्राबेरी के संसाधित पदार्थ जैसे जैम, कोल्ड ड्रिंक, कैंडी बनाने शुरू किये हैं, ऐसे में स्ट्राबेरी की खेती को प्रोत्साहन मिल रहा है। हिमाचल में स्ट्राबेरी की खेती शीतोष्ण क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के क्षेत्रीय केन्द्र शिमला के शोध बताते हैं कि दिसम्बर से फरवरी माह तक स्ट्राबेरी की क्यारियां प्लास्टिक शीट से ढक देने से फल एक माह पहले तैयार हो जाते हैं और उपज भी 20 प्रतिशत अधिक हो जाती है। स्ट्राबेरी की उपज इसकी जाति और जलवायु पर निर्भर करती है। सामान्यतया इसकी उपज 200-500 ग्राम प्रति पौधा मिल जाती है। विदेशों में स्ट्राबेरी की अधिकतम उपज 900-1000 ग्राम प्रति पौधा ली जा चुकी है।

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