हैदराबाद में ग़ज़ल की दुनिया पर राज, कर रही कांगड़ा की आवाज़,  ज्वाली में पंजाब घराने की गायकी के बेताज बादशाह रहे लक्ष्मण दास की संगीत परंपरा को निभा रहा उनका पोता

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धर्मशाला से संजीव कौशल की रिपोर्ट

संगीत की दुनिया में गहरा दखल रखने वाले कम ही लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि आज से करीब  पौने दो सौ साल पहले कांगड़ा जनपद के ज्वाली क्षेत्र में ध्रुपद धमर गायकी में माहिर दक्ष्मण दास की तूती बोलती थी। लाहौर से गायकी की तालीम हासिल करने वाले लक्ष्मण दास की तीसरी पीढ़ी संगीत की दुनिया में अपना खासा नाम कमा रही है। उनके पोते अश्वनी वर्मा आज नबावों का शहर कहे जाने वाले  हैदराबाद के सबसे पंससदीदा गज़़ल गायक हैं। परम्परागत ग़ज़ल गायकी की  पारिवारिक परम्परा को कांगड़ा से हैदराबाद तक रोपने वाले अश्वनी वर्मा पिछले करीब साढ़े तीन दशकों से अपनी संगीत कला के दम पर अपनी खास पहचान बनाने में कामयाब रहे हैं। वे दूरदर्शन और रेडियो के अवाला विभिन्न प्रतिष्ठित समारोहो में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं।‘सुर से पूछे बांसुरी’ : राधा-कृष्ण की अंतिम  मिलन रात्रि में हुए संवाद को बेजोड़ अंदाज में पेश करने वाले शायर पूरण एहसान की अलौकिक कृति

यू टयूब पर सुन सकते हैं अश्वनी वर्मा की गज़लें  
अश्वनी वर्मा जहां विभिन्न प्रतिष्ठित समारोहों में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं, वहीं रेडियो और दूरदर्शन पर भी गजल गायकी की पुरातन परम्परा को संरक्षित करते आ रहे हैं। उनकी $गज़लों का आनंद आप यू टयूब पर ले  सकते हैं। वे कई संगीत सम्मेलनों में बतौर जज भी अहम भूमिका निभा चुके हैं। उनका कहना है कि संगीत की उनके लिए जीवन है और संगीत ही जीवन उत्सव है।राइजिंंग मलंग ; सूफी कलाम, भक्ति की तरंग : मस्तमौला आवाज में गायन को फ्यूजन के साथ बंदगी की तरह पेश करने वाला म्यूजिक बैंड

अपनी जड़ों की ओर वापसी के लिए बेताव हैं ये गायक
अश्वनी वर्मा का कहना है कि गायकी ने उन्हें देश- दुनिया में अनूठी पहचान दी है। उनका कहना है कि उन्हें इस बात का मलाल है कि उनका  परिवार हिमाचल प्रदेश से संबध रखता है और उनके दादा ने यहां एक बड़ा नाम हासिल किया था, बावजूद इसके वे अभी तक हिमाचल प्रदेश में कोई संगीत कार्यक्रम नहीं दे पाए हैं। उनका कहना है कि वे अपने प्रदेश में संगीत का कार्यक्रम करने की हसरत रखते हैं।  इतना ही नहीं, संगीत की शास्त्रीय गायकी की इस परम्परा को यहां मजबूत करने के लिए भी काम करने के भी इच्छुक  हैं।धरोहर: कहीं चंचल सरोलवी की कैसेटों और डायरियों में कैद होकर न रह जाए चंबा जनपद लोक गायन, सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए लगा दिए जीवन के चालीस साल, चंबा के लोकसंगीत का बिरला कल्चर एक्टिविस्ट


पहाड़ी संगीत को लेकर भी है बड़ी दीवानगी
अश्वनी वर्मा जहां गजल गायकी में खुद को साबित कर चुके हैं, वहीं पहाड़ी संगीत को लेकर भी उनकी गहरी पकड़ है। फुरसत के क्षणों में वह पहाड़ के गीत- संगीत में खो जाते हैं। उनका कहना है कि पहाड़ी लोक संगीत में गजब की कशिश है, जो उन्हें मोहपाश में बांध लेती है और वे ख्वाबों में उड़ कर अपने पुरखों में घर में पहुंच जाते हैं। उनका कहना है कि जल्द ही वे यहां के लोकगीतों और लोक संगीत को लेकर भी काम करने की हसरत रखते हैं। अश्वनी वर्मा का कहना है कि लोक संगीत भी उनके जीवन में  रस बस गया है।पहाड़ी गीतकार के तौर पर कामयाब रहे शिक्षक प्रवीण कुमार ‘मास्टर’ ‘खट्टी कड़ी खा’ से लोक गायन में उतरे, खुद का लिखा और गाया गीत मचा रहा धूम

दादा, पिता की परम्परा निभा रहा बेटा
अश्वनी वर्मा के दादा स्वर्गीय लक्ष्मण दास  ही नहीं, पिता भी मशहूर गजल गायक रहे हैं। स्टील सिटी भिलई में स्वर्गीय रत्न चंद वर्मा एक बड़ा नाम रहा है, जो पंजाब घराने की पुरातन परम्परा को दशकों तक निभाते रहे हैं। अश्वनी वर्मा ने भी संगीत की अपनी पारिवारिक पारम्परिक विरासत को सहेजने में अपना जीवन लगा दिया है। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की पढ़ाई करने के बाद अपने पिता  से संगीत की बरीकिया सीखी हैं।पहाड़ी गीतकार के तौर पर कामयाब रहे शिक्षक प्रवीण कुमार ‘मास्टर’ ‘खट्टी कड़ी खा’ से लोक गायन में उतरे, खुद का लिखा और गाया गीत मचा रहा धूम

ज्वाली में घर, परागपुर में है  ननिहाल
अश्वनी वर्मा जहां कांगड़ा के ज्वाली से सबंध रखते हैं, वहीं इनका ननिहाल कांगड़ा के ही परागपुर में है। दोनों स्थानों पर उनकी पैतृक संपति भी है।अश्वनी वर्मा का कहना है कि वह अपने गांव से गहरे जुड़े हैं और जब भी मौका मिलता है, वे अपने परिवार सहित यहां आते हैं। अश्वनी वर्मा के व्यक्तित्व की यह भी खूबी है कि कामयाबी के शिखर पर पहुचने के बावजूद वे अपने प्रदेश के लोगों से अपनी मां बोली पहाड़ी में बात करते हैं।पिता से विरासत में मिली नुआल़ा गायन की लोककला के संरक्षण में दो दशक से जुटे भरमौर के शिक्षक सुरेंद्र पटयाल पालमपुर से ललिता कपूर की रिपोर्ट

संगीत का सफर
अश्वनी वर्मा ने 1979 में संगीत विशारद करने के बाद 1085 में संगीत अलंकार की पढ़ाई की। 1992 में आल इंडिया रेडियो से ऑडिशन पास किया। 1994 में उन्हें ए ग्रेड गज़ल गायक और 2004 में एैसटरनल का खिताब मिला। 1990 में उन्हें दूरदर्शन के  सीरियल मकान हाजिर है का टाईटल गीत गाने का अवसर मिला। वह तीन दशक से रेडियो प दूरदर्शन पर कार्यक्रम देते आ रहे हैं। जयंती पर विशेष रिपोर्ट : हिमाचल के निर्माता पहले मुख्यमंत्री के पैतृक गांव को जाने वाले रास्ते का है ऐसा हाल : जहां पैदा हुए परमार, वहां पहुंचना है दुश्वार


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