हिमाचल में पांच सौ साल पुराने अखरोट के पेड़ और ‘वालनट किंग’ बन गया अमेरिका, आर्थिकी के लिए बड़ा ताकतवर है अखरोट, कर सकता है पहाड़ की बेरोजगारी पर चोट

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हिमाचल में पांच सौ साल पुराने अखरोट के पेड़ और ‘वालनट किंग’ बन गया अमेरिका, आर्थिकी के लिए बड़ा ताकतवर है अखरोट, कर सकता है पहाड़ की बेरोजगारी पर चोट
विनोद भावुक की रिपोर्ट
अमेरिका के कैलिफोर्निया को ‘वालनट किंग’ बनने में महज तीस साल लगे, जबकि हिमाचल प्रदेश में अखरोट के ऐसे सैंकड़ों पेड़ हैं जिनकी उम्र चार- पांच सौ साल के बीच है। सदियों से यह विशालकाय पेड़ फल देते आ रहे हैं। कैलिफोर्निया का मौसम अखरोट की खेती के लिए दुनिया का सबसे बढिय़ा मौसम है। हिमाचल प्रदेश के बहुत बड़े भू भाग की जलवायु भी कैलिफोर्निया जैसी है। अखरोट के व्यावसायिक उत्पादन में इस वक्त कैलिफोर्निया का जादू चल रहा है और निर्यात में अखरोट अमेरिका टॉप पर है। हिमाचल प्रदेश के किसान- बागवान अमेरिका से पहले अखरोट की बागवानी करना जानते हैं, बावजूद इसके हिमाचल प्रदेश में अखरोट की व्यवसायिक खेती अभी तक अपने शैशवकाल में है। बागवानी विशेषज्ञ कहते हैं कि हिमाचल प्रदेश में अखरोट की खेती के लिए धरातल पर गंभीर प्रयास हुए होते तो प्रदेश की आर्थिकी में अखरोट का सेब के मुकाबले बराबर का योगदान होता।
न कोई नर्सरी, न आयात करने पर सबसिडी
अखरोट की घरेलू जरूरत के लिए अस्सी प्रतिशत आयात पर निर्भर भारत में अभी तक अखरोट के उच्च गुणवता वाले अच्छी प्रजाति के पौधों की कोई आधुनिक नर्सरी ही विकसित नहीं हुई है। देश में अखरोट केे पौधों की अच्छी किस्में मौजूद ही नहीं हैं। एक तरफ उन्नत पौधों की कमी तो दूसरी ओर विदेशों से अखरोट की उत्तम किस्मों के पौधों के आयात पर किसानों को मिलने वाली 75 प्रतिशत सबसिडी सात साल पहले से बंद हो चुकी है। अखरोट की खेती को लेकर उदासीनता का आलम यह है कि अखरोट व गिरिदार फलों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कोई उत्कृष्टता केंद्र तक नहीं है।
अखरोट पर अनुसंधान व विकास का सच
सच किसी से छुपा नहीं है कि अखरोट की उत्तम किस्मों के विकास में हमारे अनुसंधान संस्थानों की भूमिका फिसड्डी रही है। सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ टेम्प्रेट हाटीकल्चर (सीआईटीएच) श्रीनगर की जिम्मेदारी देश के लिए अखरोट की नई किस्मों को विकसित करना है। यहां हर साल महज तीन से पांच हजार अखरोट के पौधे तैयार होते हैं। पौधों की इससे ज्यादा खपत तो अकेले कश्मीर में है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के शिमला केंद्र ने ‘पूसा खोड़’ किस्म विकसित करने का दावा किया है, जो चार साल में फल देने लगेगा, लेकिन अभी तक बड़े स्तर पर पौध उत्पादन शुरू होना बाकि है। डॉ. वाइएस परमार बागवानी व वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के फल विज्ञान विभाग के प्रयास भी अभी तक आंरभिक चरण में है।
फ्रांस व अमेरिका से सीखने की जरूरत
सेब के साथ अखरोट उत्पादन करने वाले हिमाचल प्रदेश के अग्रणी बागवान कुल्लू निवासी नकुल खुल्लर कहते हैं कि अखरोट उत्पादन एवं उसके शोध एवं विकास के क्षेत्र में फ्रांस अग्रणी देश है और अमेरिका वालनट एक्सपोर्ट का नया किंग है। फ्रांस और अमेरिकी अखरोट के पेड़ छोटे होते हैं और तीन साल में फल देने लग जाते हैं। उनका कहना है कि हिमाचल प्रदेश की जलवायु अखरोट की खेती के लिए उपयुक्त है। यहां के बागवानों को पौधे की नई उत्तम किस्मों की आवश्यकता है, जो जल्दी फल दे सकें।
अखरोट बदल सकता है आर्थिकी
‘द वाल नट एंड अदर नट फ्रूट ग्रोवर एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष के सी पांडे कहते हैं कि हिमालयी क्षेत्र के किसानों के लिए अखरोट की खेती रोजगार व सतत् आजीविका का साधन बन सकती है। विशेषकर हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड व अरुणाचल प्रदेश में अखरोट की खेती की अपार संभावनाएं हैं। उनका कहना है कि अखरोट की बागवानी की दिशा में गंभीर प्रयास करने की जरूरत है। अखरोट की खेती पहाड़ की आर्थिकी का चेहरा बदल सकती है।
क्वालिटी प्लांटिंग मैटीरियल पर फोकस
नेशनल मेडीसनल प्लांट बोर्ड के क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत, जोगेंद्रनगर के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. अरूण चंदन का कहना है हिमाचल प्रदेश में अखरोट की पैदावार सलाना 1700 मीट्रिक टन है। कुल्लू, मंडी, कांगड़ा व चंबा के कई भागों में अखरोट उगाया जा रहा है। प्रदेश में ऐसे कई पौधे हैं, जिसकी आयु चार सौ साल से ज्यादा है। प्रदेश के किसानों को अखरोट का उच्च गुणवता वाला प्लांटिंग मैटीरियल उपलब्ध करवाने की दिशा में नेशनल मेडीसनल प्लांट बोर्ड ने कदम बढ़ाए हैं। सदियों पुराने अखरोट के पेड़ों का अध्ययन भी इस परियोजना का हिस्सा है।

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