हिमाचल प्रदेश में टिशू कल्चर से साल भर उगाएं लुंगड़ू

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हिमाचल प्रदेश में टिशू कल्चर से साल भर उगाएं लुंगड़ू
पालमपुर से विनोद भावुक की रिपोर्ट
लुंगड़ू अथवा लिंगड़ हिमाचल प्रदेश में एक जानी पहचानी जंगली सब्जी है। गर्मियों के मौसम में हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली इस सब्जी को यहां के लोग सदियों से खाते आ रहे हैं। इसका आचार भी बनाया जाता है। लुंगडू जहां रसायनों से दूर प्रकृति के आगोश में पैदा होता है, वहीं सब्जी के रूप में यह बेहद स्वादिष्ट भी होता है। गर्मियों के मौसम में हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, कुल्लू, चम्बा, मंडी व शिमला के बाजारों में लोग लुंगडू बेचते देखे जा सकते हैं। कांगड़ा में व्यवसायिक तौर पर लुंगड़ू का आचार भी उपलब्ध होता है।
लुंगड़ू पहाड़ों में जून से सितंबर माह तक होता है, लेकिन अब टिशू कल्चर के माध्यम से भी इसका उत्पादन होने लगा है, जो साल में कभी भी उगाया जा सकता है। सीएसआईआर-हिमालयन जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर के वैज्ञानिकों ने लुंगड़ू को प्रयेागशाला में उगाने में सफलता हासिल की है। हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों में अब साल भर लुंगड़ू की व्यवसायिक खेती की जा सकती है।
लुंगड़ू में विटामिन ए, विटामिन बी कॉम्लेक्स, पोटाशियम, कॉपर, आयरन, फैटी एसिड, सोडियम, फास्फोरस, मैगनीशियम, कैरोटिन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में मौजूद हैं, जिसके चलते लुंगड़ू की सब्जी कई औषधीय गुणों से भरपूर है। सीएसआईआर-हिमालयन जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर में कुछ साल पहले लुंगड़ू पर शुरू हुए प्रारंभिक शोधों में यह बात सामने आई है कि लुंगड़ू में कई औषधीय गुण मौजूद हैं। लुंगड़ू के गुणों की चर्चा संस्थान की राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुई है।
लुंगडू में मैग्नीशियम, कैल्शियम, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम, आयरन और जिंक के कारण इसे कुपोषण से निपटने के लिए एक अच्छा स्रोत माना गया है। सीएसआईआर- हिमालयन जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर में हुए शोध में पाया गया है कि लुंगडू चर्मरोग व मधुमेह रोग से काफी बचाव करता है और इससे सेवन से त्वचा अच्छी रहती है। शोध कहता है कि लुंगड़ू का सेवन दिल के मरीजों के लिए भी अच्छा है। लुंगड़ू में अन्य कौन-कौन सी और खतरनाक बीमारियों से लडऩ़े व जीतने की शक्ति है, संस्थान के वैज्ञानिक इस पर अब भी शोध कर रहे हैं।
लुंगडू का इतिहास काफी पुराना है। लुंगडू यानि डाप्लेजयि़म मैक्सिमम एक बड़े पत्तों का फर्न है, जोकि लाखों वर्षों से जीवित रहा है। यह हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पत्तेदार पौधा है, जिसका उपयोग सब्जी व आचार में हो सकता है। इसकेअत्यधिक नरम घुमावदार हिस्से (क्रोजियर) को मौसमी जून से सितंबर व्यंजन के रूप में खाया जाता है। वैसे कच्चा लुंगडू तीखापन या कसैलापन लिए होता है, पर इसे उबालने पर इसका कसैलापन दूर हो जाता है।
हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं व देश भर में लुंगडू की अभी तक 1200 प्रजातियों का पता लगाया गया है। सीएसआईआर- हिमालयन जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर में हुए शोध में लुंगड़ू पर हुए शोध से पता चला है कि इसमें वे गुण हैं जो मधुमेह आदि बीमारियों से बचाव करते हैं। यह प्रकृति रूप से एंटीआक्सीडेंट होता है। इसमें ओमेगा 3 और ओमेगा 6 प्रचूर मात्रा में मिलता है। यह आयरन और फाइबर का बड़ा स्रोत है। हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला लुंगडू कुपोषण सहित अन्य कई बीमारियों के लिए बेहतर सब्जी है। इस पर किए गए शोध से पता चला है कि इसमें विभिन्न पोषक तत्व भरपूर मात्रा में हैं।
लुंगड़ू उत्तराखंड में भी लिंगडा के नाम से जाना जाता है। दार्जिलिंग और सिक्किम क्षेत्र में इसे नियुरो, असम में इसे धेकिया झाक, वहीं जम्मू कश्मीर में इस कसरोड कहते हैं। दुनिया के कई देशों में अलग-अलग नाम से यह रसोई का हिस्सा है। अमेरिका जैसे देशों में भी लोग इसका उपयोग करते हैं।
सीएसआईआर- हिमालयन जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर के प्रयासों से अब कुदरती तौर पर उगने वाले लुंगड़ू की व्यवसायिक खेती करना संभव हुआ है। बसंत के मौसम में इसकी खेती की जा सकती है। अपने औषधीय गुणों के कारण लुंगड़ू की बाजार में जबरदस्त मांग रहती है, जिससे इसकी अच्छी कीमत मिलती है।

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