हिमाचल प्रदेश के इस मंदिर से मिलती है स्वर्ग- नर्क के लिए एंट्री, यहां लगती है यमराज के सचिव चित्रगुप्त की कचहरी

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हिमाचल प्रदेश के इस मंदिर से मिलती है स्वर्ग- नर्क के लिए एंट्री, यहां लगती है यमराज के सचिव चित्रगुप्त की कचहरी
चंबा से मनीष वैद की रिपोर्ट
बेशक आप सुन और जान कर हैरान होंगे, लेकिन किवदंतियों और जनश्रुतियों की मानें तो हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिला के भरमौर उपमंडल में स्थित चारासी मंदिर समूह एक खाली कमरा है, जिसे यमराज के सचिव चित्रगुप्त का कमरा कहा जाता है। यहां यह मान्यता है कि जब किसी इनसान की मौत होती है तब यमराज के दूत उसकी आत्मा को पकडक़र सबसे पहले इस मंदिर में चित्रगुप्त के सामने प्रस्तुत करते हैं। चित्रगुप्त जीवात्मा को उनके कर्मो का पूरा लेखा-जोखा देते हैं। उसके बाद आत्मा को यमराज की कचहरी में ले जाया जाता है। इस मन्दिर में मृतक के पाप और पुन्य का हिसाब कर उसी हिसाब से उसे स्वर्ग और नर्क में भेजा जाता है।
84 सिद्धों से सम्बन्ध
चंबा जिला के भरमौर उपमंडल मेंं एक ही परिसर में बनाए गए 84 मंदिरों के कारण इसका नाम चौरासी मंदिर पड़ा। मंदिर किसने और कब बनाया कोई ठोस प्रमाण नही हैं। इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि चौरासी मंदिर का जीर्णोद्धार चंबा रियासत के राजा मेरू वर्मन ने छठी शताब्दी में कराया था। इस मंदिर परिसर का संबंध 84 सिद्धों से भी जोड़ा जाता है।
किवदंती : 84 योगियों को समर्पित मंदिर
एक अन्य किंवदंती के अनसार साहिल वर्मन के ब्रह्मपुरा (प्राचीन भरमौर का नाम) के प्रवेश के कुछ समय बाद, 84 योगियों ने इस जगह का दौरा किया। वे राजा की आतिथ्य से बहुत प्रसन्न हुए। राजा से कोई संतान नहीं थी। योगियों ने राजा को 10 पुत्रो का वरदान दिया। समय बीतने के साथ महल में दस पुत्रों व एक बेटी का जन्म हुआ। बेटी का नाम चंपावती रखा गया। भरमौर का यह मंदिर परिसर 84 योगियों को समर्पित है।
मान्यता : यहां पधारते है शिव भगवान
चौरासी मंदिर परिसर में 84 बड़े और छोटे मंदिर हैं। महाशिवरात्रि के दिन पाताल लोक में विराजमान भगवान शिव कैलाश की ओर प्रस्थान करते हैं। इस दौरान भगवान शिव भरमौर स्थित अति प्राचीन चौरासी मंदिर में विश्राम करते हैं। उनके इस विश्राम को साकार रूप देने के लिए हर साल हजारों श्रद्धालु भरमौर के चौरासी मंदिर में जुटते हैं। साल में यह ऐसा मौका होता है जब रात के चार पहर ढ़ोल- नगाड़े व घंटियों की गूंज के साथ मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

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