हाईकोर्ट के मालखाने तक जाती है सुरंग, कभी सबसे मशहूर थी खच्चर सुरंग, पांच सुरंगों वाले हिल स्टेशन के नाम से मशहूर पहाड़ों की रानी शिमला

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हाईकोर्ट के मालखाने तक जाती है सुरंग, कभी सबसे मशहूर थी खच्चर सुरंग, पांच सुरंगों वाले हिल स्टेशन के नाम से मशहूर पहाड़ों की रानी शिमला
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
शिमला की एक सुरंग अब भी हिमाचल प्रदेश के हाईकोर्ट के मालखाने तक जाती है। एक दौर वह भी था, जब शिमला की खच्चर सुरंग सबसे मशहूर सुरंग हुआ करती थी। सुरंगों वाले हिल स्टेशन के नाम से मशहूर पहाड़ों की रानी शिमला मेें पांच सुरंगें हैं। यहां साल1945 से पांच सुरंगें है, जिनमें से वर्तमान में दो की स्थिति खराब हैं। ये सुरंगें अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी का रूतबा हासिल करने वाले शिमला में उस दौर में बेहतरीन यातायात प्रबंधन के प्रयासों की झलक भी ताजा करती हैं।
हाईकोर्ट के बेसमेंट तक टनल
शिमला की सबसे पुरानी इमारतों में एक थी रेसंवुड। ऐसा माना जाता है कि रेसंवुड को वर्ष 1850 से कुछ साल पहले बनाया गया था। जब 32 कॉटेज वाले सरकारी इलाके बेमलोर में1922 में अंग्रेज अफसर रहने आए, तो मॉल के लिए एक छोटा रास्ता एक सुरंग के माध्यम से बनाने की योजना बनाई गई, जिसका एक भाग रेंसवुड के करीब था। 65 फुट लंबी यह सुरंग पैदल यात्रियों के लिए मॉल तक जाने वाले रास्ते के लिए एक वरदान थी और 74 वर्षों तक बनी रही। साल 1996 में जब उच्च न्यायालय के नए भवन का निर्माण चल रहा था, तो सुरक्षा कारणों से इसे ध्वस्त करना पड़ा। पर अभी भी इस सुरंग के लगभग दस फुट लंबे हिस्से का प्रयोग उच्च न्यायालय भवन के बेसमेंट के लिए एक निजी पथ के रूप में किया जा रहा है।
2007 की गर्मियों के बाद से सील
साल 1905 में निर्मित एलिसियम सुरंग जिसकी लंबाई लगभग 120 फुट थी। साल 2007 की गर्मियों के बाद से सील की गई थी। इसके किनारे से वाहनों के आवागमन के लिए एक नई सुरंग के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया था, ताकि कैथू की ओर जाने वाले वाहनों को सर्कल रोड़ के लोंगवुड लूप की तरफ जाने से रोका जा सके।
मस्जिद के नीचे सुरंग
जब गंज बाज़ार पड़ोसी रियासतों को खाद्य पदार्थों का निर्यात करता था, तो यहां खच्चरों और कूलियों की काफी आवाजाही होती थी। अंग्रेजों ने मॉल से गुजरने वाले इस ट्रैफिक पर पाबंदी लगा दी। इसलिए 1905 में लोअर बाज़ार सुरंग और संजौली — कैथू सडक़ का निर्माण हुआ। इस सुरंग को खच्चर सुरंग कहा जाता था। सुरंग के ठीक ऊपर, शहर की मुख्य मस्जिद सौदागरों की मस्जिद है। सुरंग के निर्माण के प्रसिद्ध कपड़ा व्यवसासी हकीममल तनीमल सहित कई दुकानदारों को विस्थापित करने के लिए पचास हजार रुपये का मुआवजा दिया गया था। वर्ष 2000 में नगर निगम शिमला ने100 साल पुरानी इस सुरंग का कायाकल्प कर दिया। एक वर्ष के बंद रहने के बाद जब इसे फिर से जनता को समर्पित किया गया तो प्रकाश व्यवस्था के नाम पर सुंरग के दोनों तरफ लगभग एक फुट की चौड़ाई कम हो चुकी थी।
कैदियों के चट्टान खोद बनाई सुरंग
यहां की सबसे पुरानी सुरंग संजौली को ढली से जोडऩे वाली सुरंग है। 560 फुट लंबी इस सुरंग का निर्माण साल1850 में मेजर ब्रिग्स के प्रयासो से शुरू हुआ। दस हजार कैदियों और आठ हजार मजदूरों के प्रयासों से 1851- -52 की सर्दियों में बन कर पूरी हुई थी। यह सुरंग एक ठोस चट्टान को काट कर बनाई गई है। कभी इसका रंग नियमित सफेदी से कम किया जाता था और सूर्यास्त पर छह लालटेन’ जलाई जाती थीं।
सुरंग में पड़ा रहा कमांडर -इन -चीफ
साल1902 के बाद कमांडर -इन -चीफ लॉर्ड किचनर ने वाइल्ड फ्लावर हॉल का पट्टा प्राप्त किया था। वह अपने आधिकारिक निवास स्नोडन तक घुड़सवारी किया करते थे। एक शाम वह वाइल्ड फ्लावर हॉल में लौट रहा था, जब उसका घोड़ा बिदक गया। किचनर का पैर एक टखने के ऊपर मुड़ गया और पैर की दो हड्डियां टूट गई। कमांडर- इन- चीफ आधे घंटे तक ठंड, नम और अंधेरी सुरंग में रहे। सौभाग्य से जेन नाम के एक यूरोपीय, ने उसे देखा और उसे स्नोडन में वापस लाया गया। बाद में इस सुरंग को चौड़ा किया गया और प्रकाश की व्यवस्था की गई।
जीत के जश्न में विक्ट्री टनल
साल 1945 में विक्ट्री सुरंग का निर्माण और उदघाटन हुआ। इसे 8 मई, 1945 को धुरी शक्तियों पर एलॉयड फोर्सेज की जीत के जश्न के तुरंत बाद खोला गया था। यह शिमला की सबसे चौड़ी और अनुकूल रोशनी वाली सुरंग है।

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