स्कंद पुराण में रिवालसर झील का हृदयलेश नाम से है उल्लेख, पूर्व काल में लोमश ऋषि ने की थी यहां तपस्या, पंचपुरी भी इस झील का पौराणिक नाम है

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संकलन- लीलाधर शर्मा, किशोरी लाल

स्कंद पुराण के हिमवान खंड के प्रथम, द्वितिय और तृतीय अध्यायों में हृदयलेश का वर्णन आता है। हृदयलेश अर्थात झीलों का राजा (हद-तालाब, आलय- स्थान, ईश- राजा)। रिवालसर का प्राचीन नाम हृदयलेश है।
ब्रह्म पर्वत से लोमश ऋषि को दिखा  सुशोभित सुंदर तालाब : पूर्व काल में लोमश ऋषि हिमालय पर तप कर रहे थे, इसी दौरान ऋषि लोमश ने ब्रह्म पर्वत पर चढ़ कर एक तालाब देखा जो अत्यंत सुंदर, जिसके चारों ओर सुंदर वृक्षों की छाया, विभिन्न प्रकार के पक्षियों से सुशोभित। जिसका जल अत्यंत निर्मल और शुद्ध है। जिसमें अप्सराएं क्रील्डा कर रही हैं। इस सुंदर तालाब को देखकर ऋषि बहुत प्रसन्न हुए। पर्वतों में छिपे इस तालाब में स्नान कर लोमश ऋषि इसके किनारे तपस्या करने बैठ गए। कुछ देर बाद उन्हे नींद आ गई, स्वपन में उन्होने एक भस्म और रूद्राक्ष माला धारण किए हुए यति को देखा।रामपुर के नीरथ में है सातवीं शताब्दी का बना उत्तरी भारत का इकलौता सूर्य मंदिर, राहुल सांस्कृत्यायन की पुस्तक में है इसका उल्लेख

यति ने लामेश ऋषि को इस स्थान पर तप करने को कहा
यति ने लोमश ऋषि को इस स्थान पर तप करने को कहा। तब लोमश ऋषि ने इस तालाब की पश्चिम दिशा में कठोर तपस्या करनी शुरू की। तीन माह तक कठोर तप करने पर इंद्र भयभीत हो गए तथा उन्होने लोमश ऋषि की तपस्या को भंग करना चाहा परंतु ऋषि विघ्न बाधओं के बावजूद तपस्या करते रहे। शिव भगवान, ऋषि की अखंड तपस्या से प्रसन्न होकर पार्वती सहित इस तालाब में भूखंड पर नहल का रूप धारण कर नौकायन करने लगे। लोमश ऋषि अपनी तपस्या समाप्त कर सरोवर की ओर देखकर हैरान हो जाते हैं कि यह कौन सी माया है।मूर्ति को आए पसीना तो समझो आपकी मन्नत होगी पूरी, जिला चंबा में हैं प्रसिद्ध देवीपीठ भलेई माता का मंदिर

तपस्या से प्रसन्न होकर शिव- पार्वती ने ऋषि को दिए दर्शन  
तब प्रसन्न होकर शिव पार्वती उन्हे दर्शन देते हैं लोमश ऋषि पाद्यार्थ से शिव पूजन कर गदगद वाणी से शिव स्तुती करने लगे। यह स्तुति नौ श्रलोकों वाली है जिसे शिव भगवान ने नवरत्न कहा है। तब भगवान शिव ने ऋषि को मन वांछित वर प्रदान किया तथा महाकल्प पर्यन्त जीवित रहने का वर दिया तथा मनोवेग से वायु मेें भ्रमण करने का आशीर्वाद दिया।

पंचपुरी : रिवालसर की भूमि में निवास करते हैं पांच देवता
लोमश ऋषि ने भगवान शिव से इस तालाब का महत्व पूछा, तब शिव ने इसे मां पार्वती से पूछने को कहा। इस संवाद के दौरान विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्रादि देवता, किन्नर नागादि, तीर्थराज प्रयाग, पुष्कर सहित सभी पवित्र तीर्थ तथा नदियां यहां पर उपस्थित हुए। ब्रह्मा, विष्णु, गणपति, सूर्य एवं शिव पार्वती सहित पांच देवताओं ने भूखंड में निवास कर झील में तैरने लगे तथा यहां पर टिल्लों व बेडों में निवास करने का निश्चय किया। इस  कारण रिवालसर को पंचपुरी अर्थात जहां पांच देवता वास करते हैं, के नाम से भी जाना जाता है।

शिव के आदेश से देवता हिम रूप में कर रहे हैं यहां निवास
स्कंद पुराण के हिमावान खंड के अनुसार उल्लेख के अनुसार भगवान शिव के आदेश से देवता हिम रूप होकर देवांगनाएं मंजुला, मालती और बेल रूप होकर पितरगण वृक्ष रूप में, निशाचर गंधर्व,किन्नर आदि गुम रूप होकर निवास करने लगे।

 सिख संदर्भ : गुरू गोविंद सिंह ने औरंगजेब से लडऩे के लिए  रिवालसर में की थी 22 राजाओं से मंत्रणा


धार्मिक त्रिवेणी रिवालसर में हिंदू व बौध धर्म के आलावा एक संदर्भ सिख इतिहास से जुड़ा है। सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह हिमाचल प्रवास के दौरान वर्ष 1758 में यहां आए थे। बाइस धाराओं के राजाओं से मिलकर मुगल सम्राट औरंगजेब से टक्कर लेने के बारे में यहां मंत्रणा व युद्ध योजनाएं परवान चढ़ाने पर भी विचार-विमर्श हुआ। गुरु यहां लगभग एक महीना रहे। बताते हैं जब गुरु ने झील की प्रदक्षिणा की तो पद्मसंभव ने प्रकट हो गुरु को कार्य सिद्धि का आशीर्वाद दिया। मंडी के राजा जोगेन्द्र सेन द्वारा सन् 1930 में बनवाया गुरुद्वारा रिवालसर काफी ऊंचाई पर निर्मित है। एक सौ ग्यारह सीढिय़ां चढ़कर या फिर संकरी पक्की सड़क से भी वहां पहुंच सकते हैं। गुरुद्वारे में मेहनत से गढ़े सुंदर पत्थरों का खूबसूरती से प्रयोग किया गया है जो अंदरूनी कक्ष को सरलता व कलात्मकता भरी भव्यता प्रदान करते हैं। गुरुद्वारा परिसर काफी खुला है जिसमें लगभग एक हजार श्रद्धालु एक समय में ठहर सकते हैं। यहां हमेशा ठंडी बयार चलती है।5000 साल पुराना, 200 ग्राम का दाना : करसोग घाटी के ममेल गांव में स्थित है ममलेश्वर महादेव का मंदिर


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