सेना में पहाड़ – कांगड़ा जिला के डाढ़ गांव के नाम है देश का गौरवशाली रिकॉर्ड, इस गांव के मेजर सोमनाथ शर्मा के नाम है पहला परमवीर चक्र

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सेना में पहाड़ – कांगड़ा जिला के डाढ़ गांव के नाम है देश का गौरवशाली रिकॉर्ड, इस गांव के मेजर सोमनाथ शर्मा के नाम है पहला परमवीर चक्र
धर्मशाला से संजीव कौशल की रिपोर्ट
जब भी भारतीय सेना के पराक्रम का जिक्र होता है, छोटे से पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश के जांबाजों की दिलेरी के किस्सों से शुरू होता है। वीरता की असंख्य प्रेरक कथाओं के नायक पैदा करने वाले पहाड़ों के लाल अपने देश की हिफाजत करने के लिए शहाद्तों के मौसम में भी सबसे आगे रहे हैं। कांगड़ा जिला के डाढ़ गांव के सोमनाथ शर्मा ने रणभूमि में शूरवीरता का ऐसा इतिहास रचा कि उनके कहे शब्द आज भी देश के नौजवानों में देश के लिए मर मिटने का जज्बा जगाने के लिए काफी हैं। ‘.दुश्मन हमारे से सिर्फ 50 गज के फासले पर है। हमारी तादाद न के बराबर है। हम जबरदस्त गोलाबारी से घिरे हैं। मगर मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा जब तक हमारे पास आखिरी गोली और आखिरी फौजी है।’ मेजर सोमनाथ शर्मा के यही वो आखिरी लफ्ज थे, जिन्होंने ने युद्ध के मैदान पर परिस्थितियों के बावजूद अपने सैनिकों के मनोबल को शहादत का जाम पीने तक बनाए रखा और युद्ध का नक्शा बदल दिया।
घर से मिली सेना में जाने की सीख
31 जनवरी 1923 को जन्मे सोमनाथ ऐसे परिवार से संबंध रखते थे जिनके परिवार के कई सदस्य सेना में उच्च पदों पर काम करते थे । उनकी पढ़ाई नैनीताल के शेरवुड कॉलेज से और उसके बाद बाद देहरादून के प्रिंस ऑफ वेल्स मिलिट्री कॉलेज और फिर रॉयल मिलिट्री कालेज में पढ़ाई पूरी की । सोमनाथ को फौजी जज्बा तो विरासत में ही मिला था। पिता मेजर जनरल अमरनाथ शर्मा और अंकल कैप्टन डी वासुदेव की छाया में पले-बढ़े सोमनाथ शर्मा ने फौज में जाने का सपना तो बचपन में ही पाल लिया था।
सेना में कमीशन, मलाया में तैनाती
वर्ष 1942 की 22 फरवरी को सोमनाथ ने 19 हैदराबाद रेजिमेंट की 8वीं बटालियन में कमीशन प्राप्त किया। तब यह ब्रिटिश इंडियन आर्मी थी। बाद में यही कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन बनी। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उनका फौजी कार्यकाल शुरू हुआ और उन्हें मलाया के पास के रण में भेज दिया गया । दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सोमनाथ कर्नल के. एम. थिमैय्या के साथ थे (जो वर्ष1957-1961 के बीच चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ रहे) कर्नल थिमैय्या ऐसे पहले भारतीय अधिकारी थे जिन्होंने इनफेंटरी ब्रिगेड कमांड की।
हाथ पर प्लास्टर, संभाल लिया मोर्चा
भारत की आजादी के ऐलान के साथ ही कश्मीर संघर्ष भी शुरू हुआ। पाकिस्तान की तरफ से कबीलाई दुश्मनों ने कश्मीर की तरफ रुख कर लिया । उस समय मेजर सोमनाथ चौथी कुमाऊं की डेल्टा कम्पनी को संभाल रहे थे। ये कम्पनी भी 31 अक्टूबर वर्ष 1947 को दिल्ली के पालम हवाई अड्डे से श्रीनगर पहुंचा दी गई। उस समय मेजर सोमनाथ के दाहिने हाथ पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था। डाक्टरों की सलाह के उलट मेजर सोमनाथ मोर्चे पर पहुँच गए । दुश्मन श्रीनगर से कुछ ही फासले पर बडगाम तक आ पहुंचा था । इस खबर के मिलते ही 161 इनफेंटरी ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर एल. पी. बोगेसेन ने मेजर सोमनाथ की कम्पनी को बडगाम जाने का आदेश दिया ।
मेजर की कंपनी पर मोर्टार से हमला
बडगाम पहुंचते ही मेजर शर्मा की कम्पनी की टुकड़ी मोर्चाबंदी कर चुकी थी। दोपहर का वक्त था कि अचानक करीब पांच सौ से ज्यादा कबीलाई लश्करों ने मेजर शर्मा की कम्पनी पर मोर्टार से हमला कर दिया । मेजर शर्मा की कंपनी भी जवाबी हमला कर रही थी लेकिन सिर्फ 50 जवानों के बूते पर। हमले में कंपनी के जवान लगातार शहीद हो रहे थे। मेजरसोमनाथ ने कमांड को और मदद के लिए संदेश भेजा, लेकिन वह बखूबी जानते थे कि यहां मोर्चाबंदी रखते हुए दुश्मन को आगे बढ़ने से रोकना जरूरी है। वहां से श्रीनगर हवाई अड्डा ज्यादा दूर नहीं था, दुश्मन अगर हवाई अड्डे पर कब्जा कर लेता तो भारतीय फौज का कश्मीर पहुंचने का हवाई रास्ता बंद हो जाता।
हाथ में फ्रेक्चर पर भरते रहे मशीनगन की मैगजीन
मेजर शर्मा एक मोर्चे से दूसरे तो दूसरे से तीसरे पर खुद ही पोजीशन लेते रहे। सबसे आगे मोर्चा संभाले हुए दो पलटन खत्म हो चुकी थीं, लेकिन बहादुरी सूझ-बूझ और अदम्य साहस से, भारी गोलाबारी के बीच मेजर शर्मा एक से दूसरी जगह पर पोजीशन लिए साथियों के पास पहुंचते रहे और लगातार निर्देश देते रहे। हाथ में फ्रेक्चर होने के बावजूद वह लाइट मशीनगन की मैगजीन में गोलियां भरकर जवानों को दे रहे थे।
मोर्चे की अग्रिम पंक्ति पर देश के लिए कुर्बानी
इसी बीच मेजर सोमनाथ शर्मा मोर्टार के एक गोले की चपेट में आ गए और शहीद हो गए। एक सच्चे योद्धा की तरह मोर्चे की अग्रिम पंक्ति में देश के लिए उनी कुर्बानी बेकार नहीं गई। उनकी शहादत ने बचे सैनिकों में जोश भर दिया और वे दुश्मन पर दोगुनी ताकत से टूट पड़े। छह घंटों में डेल्टा कम्पनी के मेजर शर्मा, एक जेसीओ और 20 फौजी शहादत पा चुके थे। चौथी कुमाऊं की इस कम्पनी को जितना नुकसान हुआ उससे दस गुना से ज्यादा नुकसान दुश्मन को पहुंचाया। कंपनी-एक इंच भी पीछे नहीं हिली।
पहले परमवीर चक्र विजेता, डाक टिकट जारी
मेजर सोमनाथ शर्मा को उनके अदम्य साहस के लिए मरणोपरांत
भारतीय सेना के सबसे बड़े सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। भारतीय सेना के इतिहास में पहली बार यह सम्मान प्रदान किया गया । वर्ष 2003 में भारत सरकार ने शहीद मेजर सोमनाथ पर पांच रुपये का डाक टिकट भी जारी किया। मेजर सोमनाथ की वीरता के किस्से अज भी कांगड़ा जनपद में हर घर में युवाओं को सुनाये जाते हैं। शायद यही वजह है कि पीढी दर पीढ़ी पहाड़ पर फौजी वर्दी के लिए जूनून बरकरार है।

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