आज़ादी का अमृत महोत्सव : ‘सिंध के गांधी’ वतन को आजाद करवाने की हसरत में मंडी के हरदेव ने छोड़ी अध्यापक की नौकरी, अमेरिका से जापान ओर फिर शंघाई पहुंचकर गदर पार्टी में हुए शामिल, 1914 में आजादी का सपना लेकर लौटे भारत

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मंडी से विनोद भावुक की रिपोर्ट

वतन को आजाद करवाने की हसरत में 1913 में मंडी के हरदेव ने अध्यापक की नौकरी को अलविदा कह दिया। वह अमेरिका होते हुए जापान पहुंचे और फिर वहां से शंघाई चले गए। शंघाई में उनकी मुलाकात गदर पार्टी के नेता डॉक्टर मथुरा सिंह से हुई और वह गदर पार्टी में शामिल हो गए। 1914 में गदर पार्टी का बहुत सा साहित्य लेकर क्रांतिकारी हरदेव भारत लौटे। यहां उन्होंने गदर पार्टी की गतिविधियों का प्रचार प्रसार शुरू किया। हरदेव ने डॉक्टर मथुरा सिंह के साथ मिल कर कश्मीर, अमृतसर और मुंबई में गदर पार्टी के संगठन बनाए। हरदेव मुंबई से मंडी लौट आए। यहां उन्होंने गदर के आंदोलन को धार दी और मंडी व कांगड़ा में संगठन की गतिविधियों को तेज किया। यहां तक की शिमला की पहाड़ी रियासतों में भी पार्टी के क्रांतिकारीउद्देश्यों का प्रचार किया। उनकी गतिविधियां इतनी विस्तृत थीं कि उन्हें लोंगों ने सिंध के गांधी के नाम से पुकारना शुरू कर दिया था।आज़ादी का अमृत महोत्सव : ‘जन मण गन’ राष्ट्रीय गान के बजने पर पूरा भारत देशभक्ति के रंग में डूब जाता है, धर्मशाला के खनियारा गांव से थे इसकी धुन के रचयिता कैप्टन राम सिंह ठाकुर

अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकने में माहिर
19 फरवरी 1915 को मंडी के गदर पार्टी के कई नेताओं को ब्रिटिश पुलिस ने पकड़ लिया। सात मार्च को मंडी में हरदेव के घर में भी पुलिस ने छापा मारा, लेकिन वह पार्टी का साहित्य अपनी भतीजी के घर में छुपाकर कर पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर फरार हो गए। हालांकि मंडी के क्रांतिकारियों के पकड़े जाने और उनको लाहौर में सजा होने के बाद संगठन की गतिविधियां मंद पड़ गई, लेकिन 1916 में गदर पार्टी के क्रांतिकारी यहां फिर सक्रिय हो उठे और अंग्रेज अफसरों को मारने की योजना बनाई गई। यह योजना असफल रही और क्रांतिकारी सिधु खराड़ा पकड़े गए, लेकिन हरदेव बच निकले और भूमिगत हो गए। 1917 में मंडी के क्रांतिकारी सिधु खराड़ा को मंडी षड़यंत्र केस 1914 के अंतर्गत सात साल की कैद हो गई। उनको सजा मिलने के बाद मंडी और सुकेत में क्रांतिकारी गतिविधियां धीमी पड़ गई और और स्वाधीनता आंदोलन के शांतिपूर्ण कार्यक्रम तेज हो गए।आज़ादी का अमृत महोत्सव : छात्राकाल में जगी क्रांति की अलख, क्रांतिकारियों के लिए जुटाया धन, घर छोड़ संगठन में हुई शामिल, आज़ाद के बाद बनी चीफ इन कमांडर प्रकाशवती ने जेल में किया था क्रांतिकारी यशपाल के साथ विवाह

हरदेव से बने कृष्णानंद
1920 में स्वाधीनता संग्राम में जन साधारण की भगीदारी बढ़ गई। इसी काल में क्रांतिकारी हरदेव ने अपना नाम बदल कर स्वामी कृष्णानंद रख लिया और कराची में कांग्रेस के आंदोलन में शामिल हो गए। सन् 1921 में हरदेव अंग्रेजी सरकार की आंखों में धूल झोंक कर कराची में स्वामी कृष्णानंद के नाम से असहयोग आंदोलन को हवा दे रहे थे। स्वामी कृष्णानंद ने 100 स्वयंसेवकों को साथ लेकर शराब की दुकानों की पिकेटिंग की और वह पकड़े गए और एक साल के लिए जेल भेज दिए गए। स्वामी कृष्णानंद अपने कराची प्रवास के दौरान सत्यग्रह आश्रम कराची के संचालक बने। उन्होंने 13 अप्रैल 1930 को सैंकड़ों स्वयंसेवकों के साथ समुद्र से पानी लाकर नमक बनाया और इस तरह नमक का कानून भंग किया। इस आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें वर्ष भर जेल में कड़ी यातनाएं दी गईं।आजादी का अमृत महोत्सव : विक्टोरिया पुल को उड़ाने की थी योजना, गदर पार्टी के क्रांतिकारियों में मियां जवाहर सिंह आंदोलन को धार दी, अपने बेटे बदरी को भी क्रांतिकारी का पहनाया बसंती चोला

रियासतों के एकीकरण की पहल
1936 में मंडी में प्रजामंडल की सथापना हुई और स्वामी कृष्णानंद ने रियासती प्रशासन के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। दो महीनों तक चले आंदोलन में उन्हें कई स्थानीय क्रांतिकारियों का सहयोग मिला। राजा जोगेंद्रसेन ने अंग्रेज सैनिकों की मदद से आंदोलन को कुचल दिया और स्वामी कृष्णानंद सहित कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रजामंडल पर पाबंदी लगने के बाद स्वामी कृष्णानंद ने सेवादल मंडी की स्थापना की और संघर्ष जारी रखा। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी स्वामी कृष्णानंद कई अन्य क्रांतिकारियोंसहित गिरफ्तार हुए और उन्हें दो साल का कारावास दिया गया। दिसंबर 1945 में अखिल भारतीय देशी लोक राज्य परिषद का अधिवेशन उदयपुर में हुआ जिसमें मंडी से स्वामी कृष्णानंद ने भी भाग लिया। इस अधिवेशन में पहाड़ी रियासतों के प्रतिनिधियों ने अपना अलग संगठन बनाने की योजना बनाई। पहाड़ी क्षेत्रों की लोक संस्कृति, भौगोलिक स्थिति और सामान्य समस्याओं के आधार पर हिमालयन हिल स्टेटस रीजनल काउंसिल की नींव रखी गई और स्वामी कृष्णानंद को कौंसिल का प्रधान बनाया गया और पहाड़ी रियासतों के औपचारिक एकीकरण की शुरुआत हुई।जानिये कैसे द्वितीय विश्व युद्ध के इस योद्धा के जॉर्ज क्रॉस मेडल के लिए पत्नी ने लड़ी तेरह साल लड़ाई, लंदन और भारत में चला था केस : कहलूर के शहीद किरपा राम को मरणोपरांत ब्रिटिश सरकार ने जॉर्ज क्रॉस से किया था सम्मानित, जिसके चोरी होने के बाद इंग्लैंड में हो रही थी नीलामी, प्रवासी भारतीयों ने नौ लाख इकट्‌ठा कर जीता केस और भारत पहुंचाई वीरता की अमूल्य धरोहर, 11 मई 2015 को इंग्लैंड के अधिकारियों ने वीरांगना ब्रह्मी देवी को सौंपी


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