साल में एक बार खुलता है यह मंदिर, मंडी जिले में है हत्या देवी का मंदिर

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मंडी से संजय भारद्वाज की रिपोर्ट
क्या कभी आपने हत्या देवी का मंदिर का नाम सुना है? प्रदेश के मंडी जिले में हत्या देवी का मंदिर है। साल में एक बार खुलने वाले इस मंदिर में हत्या देवी की ही पूजा होती है। हिमाचल के मंडी जिले को पहले सुकेत नाम से भी जाना जाता था। इसे स्थान को रूप सेन के तीन बेटों में से एक वीरसेन ने बसाया था। मंडी के समीप ही है पांगणा गांव और यहीं के महामाया देवी कोट के मंदिर परिसर में ही है हत्या देवी का मंदिर।10वीं सदी के समृद्ध ब्रजेश्वरी देवी के मंदिर को पांचवीं सदी में कई बार लूटा गया, 51 शक्तिपीठों में है ब्रजेश्वरी देवी, त्वचा के रोग व जोड़ों का दर्द दूर करता ब्रजेश्वरी देवी मां के मक्खन का प्रसाद,

क्या है हत्या देवी मंदिर के पीछे कहानी
कहा जाता है कि राजा राम सेन की बेटी राजकुमारी चंद्रावती भगवान शिव-पार्वती की उपासक थीं। एक बार राजकुमारी महल में सहेलियों के साथ खेल रही थी। खेलते समय एक सहेली ने पुरुष रूप के वेश में थी। उसी समय राज पुरोहित ने उन लोगों को खेलते हुए देखा और राजा से कहा कि राजकुमारी किसी पुरुष के साथ हैं। राजा ने तुरंत राजकुमारी को अपने राज्य की शीतकालीन राजधानी पांगणा भिजवा दिया। राजकुमारी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने इसे अपना अपमान समझा।कभी यहां बसता था बिलासपुर का एक शहर : गर्मियों में जब जलस्तर गिर जाता है तो यहां के मंदिर व खंडहर एक शहर की यादें जिंदा कर देते हैं

खुद को पवित्र सिद्ध करने के लिए राजकुमारी ने खाया जहर
अपने को पवित्र सिद्ध करने के लिए राजकुमारी ने रती नाम का जहरीला बीज एक पत्थर पर पिसकर खा लिया। बताते हैं कि इसके खाते ही उनकी मृत्यु हो गई। यह पत्थर आज भी पांगणा में है।हाथियों ने दिया भगवान शिव को कुंजर महादेव का नाम, चंबा के भटियात के कुंजरोटी में स्थित मंदिर के बारे में कई दंत कथाएं प्रचलित

6 महीने बाद भी सुरक्षित निकला राजकुमारी का शव
मरने के बाद राजकुमारी ने अपने पिता राजा राम सेन के स्वप्न में कहा कि मेरी देह को महामाया देवी कोट मंदिर पांगणा के परिसर में दफनाया जाए। छह महीने बाद दोबारा से मेरे शरीर को जमीन से निकालना। अगर मैं पवित्र हूं तो यह उस समय भी अभी की तरह पूरी तरह से यथावत रहेगा और नहीं तो सड़ जाएगा। राजा ने राजकुमारी की इच्छा के अनुसार अंतिम संस्कार कर दिया। छह महीने बाद जब वह स्थान खोदकर राजकुमारी के शव को निकाला गया तो वह पूरी तरह से सुरक्षित था। इससे यह सिद्ध हो गया कि चंद्रावती पवित्र थी और पुरोहित द्वारा कही गई बात सत्य नहीं थी। राजा को बहुत पछतावा हुआ।यहां से किसी को भी निराश नहीं जाने देते मगरू महादेव छतरी, 13वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की पाषाण प्रतिमाएं हैं दर्शनीय

 छह मंजिला भवन में मंदिर
महामाया देवी कोट मंदिर पांगणा के छह मंजिला भवन बने मंदिर में देवी चंद्रावती की हत्या देवी के रूप में पूजा की जाती है। यह मंदिर साल भर बंद ही रहता है और विशेष उपलक्ष्य में ही इसे खोला जाता है। पुरोहित सिद्धू राम का परिवार हत्या देवी की पीढ़ी दर पीढ़ी पूजा-अर्चना करता है।

दक्षिणेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है मंदिर
राजकुमारी चंद्रावती की इच्छा थी कि उसका शव वहां जलाया जाए जहां इससे पहले किसी का अंतिम संस्कार नहीं हुआ हो। उनके शव का पांगणा के समीप चंदपुर नामक स्थान पर अंतिम संस्कार किया गया। राजकुमारी के इच्छा के अनुसार उस स्थान पर शिव-पार्वती का मंदिर भी बनाया गया। इस मंदिर को आज दक्षिणेश्वर महादेव के नाम से जाता जाता है। हिमाचल के अलावा जिन लोगों को भी हत्या देवी के मंदिर के बारे में जानकारी है वह यहां दर्शन और मनौती मांगने आते हैं।

राज परोहित को मिली सजा
राजा रामसेन उन्माद से पीडि़त हो गए और उनकी इससे मौत हो गई, मगर इससे पहले उन्होंने झूठी शिकायत करने वाले पुरोहित को सजा के तौर पर राजधानी से बाहर निकालकर चुराग नामक स्थान पर भेज दिया, जहां पानी से लेकर हर वस्तु का अभाव था। उनके वशंज आज इस क्षेत्र में लठूण कहे जाते हैं। कहते हैं आज तक पुरोहित के वशंज माता के कोप के डर से महामाया देवी कोट मंदिर में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं कर पाते। उन्हें डर है कि कहीं देवी चंद्रावती उनके पूर्वजों द्वारा किए गए कृत्य की सजा उन्हें न दें।कुगती के केलंग बजीर मंदिर में पूरी होती है चेले से गूर बनाने की प्रक्रिया, कुगती गांव में देव मान्यता के चलते आज तक न तो मुर्गा पाला जाता है और न ही खाया जाता है

ग्रामीणों पर माता की कृपा

उसी समय से आज तक दशकों से महामाया देवी कोट मंदिर पांगणा के कलात्‍मक छह मंजिला भवन के भूतल भाग में वामकक्ष यानि बाईं तरफ बने मंदिर में देवी चंद्रावती की हत्यादेवी के रूप में पूजा की जाती है। हालांकि यह मंदिर साल भर बंद ही रहता है और विशेष उपलक्ष्य में ही इसे खोला जाता है। मगर आज भी सुकेत राजवंश सहित इस गांव के लोगों पर देवी की अपार कृपा है।देहरा से चार किलोमीटर दूर पुरानी डाडासीबा रियासत के पास है चनौर मंदिर , यहां सत्य नारायण को चावलों का भोग, कश्मीरी पंडित करते पूजा,


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