सामूहिक उद्यमशीलता की छांव, अपने पांव पर खड़ा गांव, सहकारिता के सहारे नारीशक्ति लिख रही आर्थिक बदलाव की पे्ररक कथा, पर्यावरण मित्र बैग बना कारोबार का आधार

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सामूहिक उद्यमशीलता की छांव, अपने पांव पर खड़ा गांव, सहकारिता के सहारे नारीशक्ति लिख रही आर्थिक बदलाव की पे्ररक कथा, पर्यावरण मित्र बैग बना कारोबार का आधार
कसौली से विनोद भावुक की रिपोर्ट
हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला के मशहूर पर्यटन स्थल कसौली के एक छोटे से गांव बंजनी की महिलाएं सामूहिक उद्यमशीलता के दम पर सामाजिक और आर्थिक बदलाव की नई प्रेरककथा रचने मेें जुटी हुई हैं। सहकारिता के दम पर गांव की इन महिलाओं ने पर्यावरण की चिंता को अपने व्यवसाय का आधार बनाते हुए इक्को फ्रेंडली बैग बनाने के उद्यम का सफल संचालन करते हुए कारोबार को नए पंख लगा दिए हैं। ‘महिला एकता समूहÓ गांव की महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया है, जिसके प्रभाव गांव के सामाजिक जीवन में भी देखे जा सकते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के साथ जीविकोपार्जन की सोच
हिमाचल प्रदेश में जब सरकार ने प्लास्टिक थैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया तो महिला एकता समूह ने विकल्प के तौर पर कागज और कपड़े के पर्यावरण मित्र बैग बनाकर सामाजिक उद्यमशीलता के क्षेत्र में छोटा सा प्रयोग किया। स्थानीय व्यापारियों ने इन बैंगों को हाथों- हाथ लिया तो ऐसे बैगों की मांग को देखते हुए गांव की महिला शक्ति को एक बड़े व्यवसाय की दिशा में बड़ा लक्ष्य निर्धारित करने की सीख मिली। तय हुआ कि इस कारोबार को बढ़ाने के लिए हर संभव काशिश की जाए और विस्तार के लिए जरूरी मशनरी व तकनीक प्राप्त की जाए।
अपने गांव में ही स्थापित किया बैग बनाने का उद्योग
कागज और कपड़े के बैग की निरंतर बढ़ती मांग को देखते हुए गांव की महिलाओं ने अपने कारोबार को बड़ा आकार देने के लिए गांव में ही कागज और कपड़े के थैले बनाने का एक छोटा उद्योग की स्थापित कर दिया और यहां बनने वाले बैग आस- पास के बाजारों में बेचने शुरू कर दिए। धीरे- धीरे बाजार में ऐसे बैगों की मांग ने जोर पकडऩा शुरू किया और महिलाओं की आय में बढ़ोतरी होनी शुरू हो गई। अब यहां की महिलाएं आर्थिक रूप में निर्भर होकर गांव की आर्थिकी को बदलने में अहम भूमिका निभा रही हैं। यह सकारात्मक सोच का ही प्रतिफल है कि गांव में जीवन स्तर बदल गया है। गांव के लोगों की आर्थिक सेहत के ठीक होने से यहां के सामाजिक परिवेश में भी बदलाव आया है। अनुभव के चलते अब गांव की महिलाएं अपने उद्यम के संचालन के लिए पूरी तरह से दक्ष हो कर अपने कारोबार को विस्तार दे रही हैं।
समाजसेवा की अदालत
मदद की वकालत
गांव की महिलाओं को सहकारी समिति के गठन के लिए स्थानीय अधिवक्ता एम ठाकुर ने मदद की। उन्होंने सहकारी सभा को पंजीकृत करने के लिए तमाम कागजी औपचारिकताओं को पूरा कर पंजीकरण की प्रक्रिया से महिलाओं को परिचित करवाया। उन्होंने तमाम कानूनी औपचारिकताओं को पूरा कर समिति के सदस्यों को लाइसेंस उपलब्ध करवाया। वह कानूनी मसलों में इन महिलाओं की मदद करते हैं।
छोटा सा गांव, सामाजिक बदलाव का बड़ा काम
बंजनी गांव में सिर्फ 41 परिवार रहते हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक गांव की आबादी 190 थी, जिसमें 99 पुरूष और 91 महिलाएं थीं। गांव में रोजगार के साधन न होने के कारण अजीविका के लिए लोगों को पलायन कर शहर जाना पड़ता था। अधिकतर परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। एक सामाजिक रूप से जागरूक व्यक्ति ने महिला शक्ति को प्रेरित कर गांव को अपने पांव पर खड़ा कर दिया।
शक्ति को पहचाना तो गांव में खुद आ गए अच्छे दिन
सामूहिक उद्यमशीलता की नई इबारत लिख रहीं इस गांव की महिलाओं की मदद करने के लिए सामाजिक उद्यमी संजीव नंदा और उनकी पत्नी गांव में लगातार आते रहते हैं। संजीव नंदा कहते हैं कि कभी बस के अभाव में गांव के बच्चे पैदल स्कूल जाते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए दो जीपों की व्यवस्था की गई है। गांव की महिलाओं के छोटे से हस्तक्षेप ने पूरी तरह से गांव के जीवन को बदल दिया है।
दरअसल सामाजकि कार्यकर्ता संजीव नंदा और उनकी पत्नी मेधा नंदा ने दो साल पहले इस छोटे से गांव की महिलाओं को सामूहिक उद्यमशीलता के लिए पेरित किया। इस दंपति ने महिलाओं को स्वयं सहायता समूह का गठन करने के साथ लाभदायक व्यवसाय के लिए जरूरी सुझाव दिए। सामूहिक उद्यमशीलता के लिए स्वयं सहायता सहकारी समिति की गठित की गई। महिलाओं के रचनात्मक कौशल को व्यवसायिक मंच प्रदान करने में इस दंपति ने अहम रोल अदा किया और महिलाओं के इस उपक्रम को आत्मनिभर बनाने के लिए प्रारंभिक स्तर पर कच्चे माल से लेकर उत्पाद को बेचने- खरीदने में महिला एकता समूह की हर मदद की। इस मदद से महिलाओं ने कामयाबी की इबारत लिख दी।

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