सर्दी के मौसम के लिए किसान ऐसे करते हैं पशुधन के लिए घास का इंतजाम, पहाड़ पर आज भी प्रचलन में घास संग्रहण की पारंपरिक विधियां

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सर्दी के मौसम के लिए किसान ऐसे करते हैं पशुधन के लिए घास का इंतजाम, पहाड़ पर आज भी प्रचलन में घास संग्रहण की पारंपरिक विधियां
महादेव (मंडी) से पवन चौहान की रिपोर्ट
सर्दियां शुरू होने से पहले किसान अपने पशुओं के लिए घास को इक_ा करने की तैयारी में जुट जाता है। यह उसके लिए बहुत ही व्यस्त दौर होता है। उसे पता है कि इसके बाद अब खेतों या फाटों से हरा घास खत्म हो जाएगा, क्योंकि खेतों में नई फसल बीज दी जाएगी और फाटों का घास सूख जाएगा। बर्फ पडऩे पर कहां से घास लाने की व्यवस्था की जाएगी। ऐसे में उसके पशुओं के लिए मुश्किल हो जाएगी। इस स्थिति से बचने के लिए वह पहले ही घास का जुगाड़ करके उसे पारंपरिक विधियों की सहायता से संग्रहित कर लेता है। ये विधियां सदियों से चली आ रही हैं और आज भी उसी रूप में कार्य करके किसान को सहारा प्रदान कर रही हैं। इन विधियों के द्वारा किसान घास का संग्रहण करता है और इसे सर्दी के मौसम में हरे घास जो बरसीम के रूप में उपलब्ध होता है के साथ मिलाकर पशुओं को खिलाता है।
किसान ने घास संग्रहण की विधियों की खोज
इन सब विधियों का जन्म तब हुआ माना जा सकता है जब हमारे सामने लगभग चार- पांच महीने का सर्दी का मौसम होता था और इस चार- पांच महीने के घास को किसी तालड़ी या टापरे में रख पाना मुष्किल था। पहले पशु काफी पाले जाते थे और उनके हिसाब से घास की मात्रा बढ़ जाती थी। अत: घास संग्रहण की इस जरुरत ने किसान को इन विधियों की ओर मोड़ दिया जो उसके लिए लाभकारी सिद्ध हुई और आज भी उसी रुप में हमारे समक्ष खड़ी किसान को संबल प्रदान कर रही हैं।
घास के पुलों के कोठा
यह विधि फाट के घास को रखने के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है। फाट के घास को पुलों में बांध कर सुखाने के बाद पुल्लों को तह में परत दर परत रखकर कोठे का रूप दिया जाता है। इसे घोठा कहकर भी पुकारा जाता है। इसको दो व्यक्ति आराम से तैयार कर लेते हैं। कोठे को लगाने से पहले उसका आधार (बेस) तैयार किया जाता है। इसके लिए लंबी बड़ी लकडिय़ों या फट्टों को कोठे के आकार के अनुरुप जमीन से लगभग छ: ईंच ऊपर बिछा दिया जाता है। यह इसलिए ताकि बारिश में घास भीगे न। फिर इस पर पुल्लों को परत दर परत आड़े तिरछे या जमा के निशान के अनुरूप रखकर इसे कोठे का रूप दिया जाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 10 से 12 फुट हो सकती है। इसके पूरा होने के बाद इसके ऊपर खुले घास की छांव दी जाती है या फिर तिरपाल से ढक दिया जाता है, ताकि बारिश में ये भीगे न। इस कोठे को घास की रस्सी बनाकर या प्लास्टिक की रस्सी से बांधा जाता है, ताकि हवा के झोंके इसे उड़ा या गिरा न पाए। बाद में कोठे से घास को फिर किसान किसी भी एक तरफ से निकालना प्रारंभ करता है। पहाड़ी क्षेत्र में फाट के इस घास को बेल की तरह बाटकर एक खास तरीके से पेड़ की टहनियों से टांग कर भी रखा जाता है।
पराली के लिए प्लाहोड
जब धान पकते हैं तो इनके पुल्लों को मशीन में डालकर इनसे धान और पराली को अलग- अलग कर दिया जाता है। इस पराली को फिर प्लाहोड का रूप दिया जाता है। इस प्लाहोड के लिए भी पहले कोठे की तरह आधार तैयार किया जाता है। फिर इसके ऊपर उलझी हुई पराली को झटक– झटक कर परत दर परत बिछाया जाता है। इसमें एक व्यक्ति पराली को झटकता रहता है और दूसरा उसे इस पराली को पकड़ाता रहता है। इस प्रक्रिया को दोहराते दोहराते एक अर्धबेलनाकार आकार तैयार हो जाता है। इसे हम प्लाहोड कहते हैं। इसकी ऊंचाई 8 या 9 फुट तक रहती है। इसे भी तरतीब से एक तरफ से निकाला जाता है। पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं क्योंकि इसमें प्राकृतिक रूप से मिठास विद्यमान रहती है।
सजाई जाती थी धान की पुल्लियों से कुंदली
बुजुर्गों के अनुसार मशीनों के कारण आज यह प्रक्रिया सरल हो गई है, लेकिन जब ये मशीनें न थी तो पराली निकालने की यह प्रक्रिया बड़ी ही पेचीदा और समय की काफी खपत करवाने वाली थी। पहले धान की पुल्लियों से कुंदली (धान की पुल्लियों का ढेर) सजाई जाती थी। फिर जब तक अगली फसल को न बीजा जाए तब तक यह धान कुंदली में ही रहता था। फसल बीजने के बाद जब हम फ्री हो जाते तब कुंदली से धान की पुल्लियों को निकाल कर गोबर से लीपे आंगन में तह में गोलाई में बिछाकर उसके ऊपर बैलों को फेरा जाता और कुछ फेरों के अंतराल के बाद पुल्लियों को बदल दिया जाता और जिनसे दाने निकल गए होते। उन्हे एक तरफ को फेंक दिया जाता। यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती थी और इसमें कई व्यक्तियों की जरूरत रहती थी। इसमें बहुत समय लगता था। फसल के हिसाब से कई बार तो कई दिन भी लग जाते थे।
यह भी है पराली रखने की विधि
यह आज की तरह सरल न था कि मशीन में डाला नहीं कि पराली और धान कुछ ही मिनट में अलग – -अलग हो जाए। इस विधि से पराली तैयार करना बेहद कठिन कार्य था।पराली को लगाने की दूसरी विधि में एक सीधी ऊंची लकड़ी को जमीन में गाड़ा जाता है। फिर इस लकड़़ी पर पराली को जमीन से ऊपर की ओर बांधा जाता है। यह विधि एक शंक्वाकार आकार ले लेती है। एक अन्य विधि में धान की पुल्लियों को धान झाडऩे के बाद पेड़ पर टहनियों से बांध कर भी लटका दिया जाता है। बाद में फिर जरुरत के मुताबिक इन पुल्लियों को पेड़ पर चढक़र एक एक करके खींच कर निकाल जाता है।
पेड़ पर मक्की के टांढे
मक्की की फसल पकने के बाद जब मक्की टांढों (मक्की का पौधा) से निकाल ली जाती है तो खाली टांढों का उपयोग पशुओं के लिए घास के रूप में किया जाता है। इन्हे अमूमन तीन विधियों द्वारा सुरक्षित रखा जाता है। इन विधियों को किसी खास नाम से नहीं पुकारा जाता है।
पहली विधि — कम मोटाई वाले पेड़ पर बांधना
पहली विधि में इनको पेड़ पर एक एक करके बांध कर टांगा जाता है। इसके लिए एक सीधे लेकिन कम मोटाई वाले पेड़ का चुनाव करना पड़ता है, ताकि इनके ऊपरी सिरे को आसानी से गांठ लगाई जा सके। इस विधि में टांढों का यह संग्रहण शंक्वाकार रूप लेता है।
दूसरी विधि : टहनियों वाले पेड़ का चुनाव
दूसरी विधि में एक ऐसे पेड़ का चयन किया जाता है जिसकी टहनियां कुछ ऐसी हों कि इन्हे हारिजेंटली तह में रखा जा सके। यदि ऐसा पेड़ न भी मिले तो किसान इस व्यवस्था को अपनी तरफ से लकडिय़ां बगैर जोडक़र अंजाम देता है। इसमें यह संग्रहण लगभग घनाभाकार रुप ले लेता है।
तीसरी विधि : काट कर टांढ़ों का तालड़ी में रखना
तीसरी विधि जो किसान आजकल ज्यादा अमल में ला रहा है वह है टांढों को काट कर रख लेना। मोटर वाली घास काटने की मशीनों के कारण यह संभव हो पाया है। इसमें टांढों को बारीक- बारीक काट कर तालड़ी में रख दिया जाता है।
भूसा रखने के लिए कूप
कूप विधि भूस्से को रखने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। इस विधि को अंजाम देने के लिए हमें गेहूं की ही कंदरालों की आवश्यकता पड़ती है। गेहुं के पौधे को हम कंदराल कहकर पुकारते हैं। इन कंदरालों की हम पुल्ली बांध लेते हैं। कूप बनाने के वक्त इन पुल्लों को खोलकर जमीन पर घास की रस्सी या सेबे की रस्सी के सहारे गोल आकार में खड़ा कर दिया जाता है। फिर इस गोलाकार बाड़ में भूस्से को साथ साथ भरा जाता है। जब खड़ी की गई बाड़ के बराबर भूस्सा भर लिया जाता है तब कंदराल की पहली दीवार के ऊपर दूसरी दीवार चढ़ाई जाती है। फिर इसे दोबारा इसकी ऊंचाई तक भर लिया जाता है। यह प्रक्रिया एक निश्चित ऊंचाई पर पहुंचने के बाद रूक जाती है। इसके बाद इसको इस कंदराल और घास के सहारे ऊपर से बंद कर दिया जाता है। इसकी ऊंचाई आठ- दस फुट तक ही रहती है। इसमें कंदराल को इस तरीके से एक के ऊपर एक व्यवस्थित किया जाता है कि बर्षा का पानी जरा भी अंदर नहीं जा सकता। यह कंदराल एक बहुत ही बढिय़ा छत का कार्य करती हैं।
शंक्काकार होता है कूप
कूप शंक्वाकार आकार का होता है। बाद में हम इसके धरातल से कंदराल को थोड़ा सा एक तरफ सरका कर भूस्सा निकालते हैं। यह विधि गेहुं की फसल काटने के उपरांत प्रयोग में लाई जाती है क्योंकि उसी समय हमें ये गेहुं की यह कंदराल आसानी से मिल जाती हैं। इस विधि में समय काफी खर्च होता है। आजकल यह विधि बहुत ही कम प्रयोग में लाई जाती है। लोग आजकल वैसे भूस्से को पशुशाला की तालड़ी में ही रखना पसंद करते हैं क्योंकि यह कूप विधि से बहुत ही सरल उपाय है।
अब पंजाब से आ रही तूड़ी
हिमाचल में पिछले कई बर्षो से पंजाब से भूस्से को ट्रकों में भरकर लाया जा रहा है और उसे यहां पर बेचा जा रहा है। यह हिमाचल के किसानों को बहुत ही सहारा प्रदान कर रहा है। खासकर उन्हे जिन्होने पशु तो पाल रखे हैं लेकिन जमीन इसके गुजारे लायक नहीं है। सर्दी का ही एक ऐसा मौसम है जब किसान को हरे घास की सबसे ज्यादा किल्लत रहती है। अन्य मौसम में खेतों से किसी न किसी रूप में हरे घास की पैदावार चलती रहती है, लेकिन सर्दी के इस मौसम में हरे घास के रूप में बरसीम ही एकमात्र सहारा होती है लेकिन इसे भी सूखे घास के साथ मिक्स करके खिलाया जाता है। बात चाहे जो भी हो लेकिन सर्दी के इस मौसम में इन विधियों के द्वारा किसान अपने पशुओं के लिए भोजन की व्यवस्था कर चिंतामुक्त हो जाता है। पशु भी दिनभर तीन- चार प्रकार का घास मिलने से उसे बड़े चाव से खाते हैं और अपने मालिक का शुक्रिया अदा करते हैं।
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संपर्क : गांव व डा. महादेव
तहसील-सुन्दरनगर, जिला-मण्डी
हिमाचल प्रदेष- 175018
मो: 98054 02242, 94185 82242

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