शिक्षक होने की ऐसी दूसरी मिसाल कहां, मौत के डेढ़ दशक बाद भी बने हुए हैं गरीब स्टूडेंट्स के मददगार, दिवंगत शिक्षक एवं साहित्यकार मुलखराज शांतलवी स्थानीय लोगों की मदद से 1982 में ही कर गए गंदड़ स्कूल के लिए स्थाई स्कॉलरशिप का प्रबंध

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शिक्षक होने की ऐसी दूसरी मिसाल कहां, मौत के डेढ़ दशक बाद भी बने हुए हैं गरीब स्टूडेंट्स के मददगार, दिवंगत शिक्षक एवं साहित्यकार मुलखराज शांतलवी स्थानीय लोगों की मदद से 1982 में ही कर गए गंदड़ स्कूल के लिए स्थाई स्कॉलरशिप का प्रबंध
कांगड़ा से वीरेंद्र शर्मा वीर की रिपोर्ट
एक शिक्षक होने की ऐसी मिसाल शायद ही दुनिया में कोई दूसरी मिले। यह एक ऐसे शिक्षक की गहरी सोच ही थी कि स्वर्ग सिधार जाने के बाद भी वे स्टूडेंट्स के मददगार बने हुए हैं। मुलखराज शांतलवी स्थानीय लोगों की मदद से 1982 में ही गंदड़ स्कूल के लिए स्थाई स्कॉलरशिप का प्रबंध कर गए। सबसे पहले उन्होंने अपनी धर्मपत्नी श्रेष्ठादेवी को साथ लेकर अपनी नेक कमाई से स्कूल के नाम एफडी बनवाई। इसके बाद सन 1982 से क्षेत्र वासियों कैप्टन भूमिचंद, मेजर नसीब चंद, भूतपूर्व प्रिंसिपल बालकृष्ण, जीहण (टिक्कर), कनाडा निवासी इंजिनियर मित्र सोम शुक्ला, मरेरा निवासी- मोती लाल एमसी कटोच, सारो देवी, हरदेई देवी, शकुंतला देवी, भूमिचंद कटोच, अमर नाथ मिश्रा, डॉ रमेश शुक्ला, रिखी राम भरेश ने उनकी प्रेरणा से अपने बुजुर्गों के नाम से स्कूल के नाम तेरह एफडी करवाईं और इन्हीं दानी सज्जनों की एक कमेटी बनाकर इस जमापूंजी से प्राप्त होने वाले ब्याज से इस स्कूल में पढऩे वाले गरीब बच्चों को स्कॉलरशिप देना शुरु कर दिया। अब यहां से पास होकर आगे पढऩे वाले गरीब स्टूडेंट्स को उच्च शिक्षा में मदद के लिए इसी पैसे के ब्याज से प्राप्त राशि से पांच से दस हजार की आर्थिक मदद भी की जाती है। मुल्खराज शांतलवी सन 2002 में सेवानिवृत्त हो गए और हृदयाघात के चलते एक वर्ष बाद ही स्वर्ग सिधार गए, किन्तु एक जलाई ये अखंड मशाल आज भी संस्कारों की रोशनी दे रही है।
स्कूल के लिए घर घर जा मांगा चंदा
मुलखराज शांतलवी ने अपने अध्यापन के जीवन में गरीब बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रेरित करने के लिए गांव – गांव जाकर संपन्न लोगों से अपनी नेक कमाई से दान देने की अपील की। वह तत्कालीन मुख्यमंत्री शांता कुमार से ममद मांगने पहुंचे। यह एक शिक्षक की साधना का ही परिणाम था कि लोगों की आपसी सहयोग के दम पर राजकीय उच्च पाठशाला गंदड़ के लिए पांच कमरों का निर्माण हो गया।
मुल्खराज शांतलवी ने गंदड़, कोटलु, लम्बागांव में अध्यापन के दौरान देखा कि अनपढता व गरीबी न केवल बच्चों की योग्यता पर भारी पड़ रही हैं, परंतु सामाजिक ताने-बाने एवं संतुलन पर भी दानव की तरह प्रहार कर रहे हैं । इसके लिए उन्होंने ड्यूटी के बाद आस पास के क्षेत्रवासियों को दहेज कुप्रथा उन्मूलन और पढऩे के लिए प्रेरित करने वाले गीत रचकर, गाकर और नाटकों का सफल लेखन संपादन व मंचन कर आमजन को जागरूक करने का बीड़ा उठाया।
साधारण अध्यापक, असाधारण व्यक्तित्व
तत्कालीन कांगड़ा जिला की पालमपुर तहसाल के छोटे से गांव शांतल निवासी मुलखराज शांतलवी पेशे से तो साधारण से अध्यापक थे, लेकिन अनुभव की भ_ी से खूब तप कर निकले थे। ईमानदारी और समर्पण जैसी अमूल्य निधियां उन के पास थीं। पारिवारिक पृष्ठभूमि सामान्य थी, परंतु संकल्प के धनी थे। वे भविष्यदृष्टा नहीं थे, किंतु अपनी मेहनत और संकल्प के सुफल को देख लेने की दूरदृष्टि उनके पास थी। उन्हें संगठन चलाने का भी कोई अनुभव नहीं था, लेकिन दूसरों की सुनना और अपनी बात सलीके से रखना उन्हें अच्छी तरह से आता था। पिता वैद्य सोमदत्त से मिले संस्कारों, साहस, संतुलित जीवन जीने के तौर तरीकों और हालात से दो चार होते हुए भी सामाजिक दायित्वों के प्रति संवेदनशील रहने की सीख ने एक साधारण से अध्यापक को असाधारण व्यक्तित्व का स्वामी बना दिया।

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