वीरता और बहादुरी की बेमिसाल कहानी -ब्रिटेन के डिजिटल अभिलेखागार में पढि़ए कांगड़ा के फौजी की वीरता की कहानी प्रथम विश्वयुद्व में ब्रिटेन के सर्वोच्च बहादुरी पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित 41 डोगरा लांस नायक लाला राम ने दिया अदम्य साहस का परिचय

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वीरता और बहादुरी की बेमिसाल कहानी -ब्रिटेन के डिजिटल अभिलेखागार में पढि़ए कांगड़ा के फौजी की वीरता की कहानी
प्रथम विश्वयुद्व में ब्रिटेन के सर्वोच्च बहादुरी पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित 41 डोगरा लांस नायक लाला राम ने दिया अदम्य साहस का परिचय

शिमला विनोद भावुक की रिपोर्ट

 

इस बार हम आपको हिमाचल प्रदेश के उस सैनिक की अदम्य साहस और दिलेरी वह प्रेरककथा सुना रहे हैं, जिसने पहले विश्वयुद्व के दौरान ब्रिटिश इंडिया आर्मी के सैनिक के तौर पर अपने वतन से दूर फ्रांस और मेसोपोटामिया(वर्तमान इराक)जाकर युद्व लड़ा। मेसोपोटामिया के युद्व के दौरान गोलियों की बौछारों के बीच अपने घायल सैन्य अधिकारियों व सैनिकों को मेडीकल कैंप तक सुरक्षित पहुंचाने में अपनी जान की परवाह न करते हुए जोखिम उठाने वाले इस लॉंस नायक के बहादुरी के किस्सों की गूंज ब्रिटेन तक सुनाई दी और उसे परमवीर चक्र के बराबर समझे जाने वाले ब्रिटेन से शीर्ष सैन्य सम्मान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित लांस नायक लाला राम (आधिकारिक रिकॉर्ड में लाला) हिमाचल प्रदेश के इकलौते सैनिक हैं, जिसकी बहाुदरी की प्रेरक कथा ब्रिटेन सरकार की ओर से बनाए गए डिजीटल म्यूजियम में प्रदर्शित की गई है। पहले विश्वयुद्ध के100 साल पूरे होने पर ब्रिटेन में यह म्यूजियम बना हैं, जिसमें प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सवोच्च साहस दिखाने के लिए विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित 11 देशों के 175 जवानों की वीरता की कहानियां प्रदर्शित की गई हैं। इनमें अविभाजित भारत के वे छह सैनिक भी शामिल हैं, जो ब्रिटिश इंडियन आर्मी के तहत युद्ध लड़े थे। लांस नायक लाला राम इनमें एक हैं।

19 साल की उम्र 41 वीं डोगरा में भर्ती

लाला का जन्म तत्कालीन अविभाजित पंजाब के कांगड़ा जिला के परोल गांव में हुआ था। चूंकि उस दौर में इलाके में कोई स्कूल नहीं था, इसलिए वह औपचारिक शिक्षा नहीं ले पाए।19 साल की उम्र में यह हट्टा कटटा गबरू तत्कालीन ब्रिटिश भारतीय सेना की 41 वीं डोगरा बटालियन में भर्ती हो गया। सेना में नौकरी के दौरान उनकी क्षमता और योज्यता के चलते हमेशा अधिकारियों ने उनकी पीठ थपथपाई।

इराक में दिखाया दम

 

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस में 13 महीने की भीषण लड़ाई लडऩे के बाद 35 वीं ब्रिगेड की बटालियन के तौर पर 41 डोगरा मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) में अल ओराह के खंडहरों के पास तुर्की की टुकडिय़ों पर हमले के लिए डटी हुई थी। 21 जनवरी, 1916 को सुबह 7 बजे 41 डोगरा ने तुर्की की टुकडियों पर हमला किया, लेकिन जल्द ही तुर्की सेना के निशाने पर आ गई। बटालियन के दो अधिकारियों सहित कई सैनिक शहीद हो गए और कई बुरी तरह से जख्मी हो गए। इस मौके पर लाला ने जिस बहादुरी और दिलेरी का परिचय दिया, उसी ने उन्हें विक्टोरिया क्रॉस का हकदार बना दिया।

आर्मी रिकॉर्ड में दर्ज साहस का किस्सा

 

और डोगरा रेजिमेंटल अभिलेखागार की युद्ध डायरी में दर्ज कार्रवाई में लाला की वीरता का उल्लेख कुछ यूं है। 21 जनवरी1916 की सुबह अल ओरहा की टुकडिय़ों पर 41 वें डोगरा के हमले के दौरान, लांस नायक लाला की भूमिका सबसे अहम रही। करीब 200 गज आगे बढऩे के बाद कंपनी को तुर्की के स्टीक हमले का शिकार होना पड़ा। लाला ने पड़ोसी बटालियन के एक ब्रिटिश अधिकारी को दुश्मन की खाइयों के करीब घायल देखा। अपनी सुरक्षा की परवाह न करते हुए घायल अधिकारी को अस्थाई आश्रय स्थल तक पहुंचाया। लाला ने दुश्मनों की गोलियों की बौछारों के बीच न केवल उस अधिकारी बल्कि अन्य घायल सहायकों को भी बटालियन मुख्यालय के नजदीक मेडिकल कैंप तक पहुंचाया।

जमादार लाला विक्टोरिया क्रॉस

 

13 मई 1916 को युद्व के मैदान में लाला की बहादुरी को देखते हुए विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित कर हवलदार के पद पर पदोन्नत किया गया। नॉन कमीशन ऑफिसर के रूप में पांच साल सेवा देने के बाद हवलदार लाला को विक्टोरिया कमीशन प्रदान किया गया और उन्हें जमादार बना दिया गया। वह ब्रिटिश आर्मी से जमादार लाला विक्टोरिया क्रॉस के पद से रिटायर्ड हुए। अपनी बहादुरी से विदेश में पहाड़ का मान बढ़ाने वाला यह सैनिक 23 मार्च,1927 को स्वर्ग सिधार गया।


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