लड़ी देश की लड़कियों के हक़ की लड़ाई, थल सेना में अफसर बनाने की राह बनाई, ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई कैडेट नंबर 001, शिमला की प्रिया झिंगन की प्रेरककथा

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लड़ी देश की लड़कियों के हक़ की लड़ाई, थल सेना में अफसर बनाने की राह बनाई, ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई कैडेट नंबर 001, शिमला की प्रिया झिंगन की प्रेरककथा
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
इस बार की प्रेरक कथा की नायिका है भारतीय सेना के स्वर्णिम इतिहास में अनूठा अध्याय जोड़ने वाली एक शरारती और चुलबुली पहाडी बाला. उसने देश की लड़कियों के हक़ की लड़ाई लड़ी और लड़कियों के लिए भारतीय थल सेना में अफसर बनाने की राह बनाई. ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई कैडेट नंबर 001, शिमला की प्रिया झिंगन की भारतीय थल सेना में पहली महिला अफसर बनने की कहानी एक हिमाचली बाला के हुनर और साहस की कहानी है. प्रिया ने न खुद थल सेना में पहली महिला अफसर बनने का गौरव हासिल किया, बल्कि देश की बेटियों के लिए थल सेना में अफसर बनने के दरवाजे खोलने का अद्भुत काम कर इतिहास रच दिया.
खुद राह निकाली, सबसे आगे खुद चली
वर्ष 1992 से पहले महिलाओं को भारतीय थलसेना में प्रवेश नहीं दिया जाता था महिलाओ की केवल डॉक्टर के तौर पर उनकी नियुक्ति की जाती थी, लेकिन वह फौजी अफसर नहीं बन सकती थीं, लेकिन एक आर्मी अफसर की बेटी प्रिया बचपन के दिनों से आर्मी अफसर बनने के सपने बुन रही थी. प्रिया के प्रयासों से थल सेना में महिलाओं के लिए अफसर बनने की राह निकली और इस राह पर सबसे पहले चलने वाली खुद प्रिया बन गई.
सेना प्रमुख से अधिकार की वकालत
लोरेटो कान्वेंट स्कूल शिमला से स्कूली पढ़ाई पूरी कर प्रिया ने लॉ की पढ़ाई शुरू की । प्रिया जब लॉ ग्रेजुएशन के तीसरे साल में थी तो एक दिन अखबार में भारतीय सेना में भर्ती सम्बंधित विज्ञापन देखा जिसमें केवल पुरुषों की भर्ती की बात लिखी थी। प्रिया ने तत्कालीन सेना प्रमुख General Sunith Francis Rodrigues को एक लंबी चिट्ठी लिखी जिसमें उन्होंने कहा कि लड़कियां लड़कों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं, इसलिए उन्हें भी सेना में अफसर बनने का अधिकार मिलना चाहिए।
सेना प्रमुख के जवाब में शुभ सूचना
प्रिया को अपने पत्र पर सेना अध्यक्ष से जवाब मिलने की उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी, मगर उनकी उम्मीदों को पंख तब लग गए, जब उन्हें सेना प्रमुख से जवाब मिला। सेना प्रमुख की और से लिखा गया था कि भारतीय सेना इस पर विचार कर रही है और कुछ समय में ही महिलाओं की नियुक्ति भी शुरू हो जाएगी। यह प्रिया के लिए इतिहास रचने की पहली शुभ सूचना थी.
कोर्ट में मिली सेना भर्ती की सूचना
सेना प्रमुख से मिले जवाब के बाद एक साल से ज्यादा का समय गुजर चुका था, सेना में महिलाओं की भर्ती से जुडी कोई सूचना नहीं मिली तो पिता के कहने पर उन्होंने हाईकोर्ट में प्रशिक्षु के तौर पर शुरुआर कर दी. वर्ष 1992 में एक दिन जब प्रिया अदालत परिसर में बैठी थीं तो एक अखबार पर नजर पड़ी, जिसमें महिलाओं की सेना भर्ती के लिए विज्ञापन प्रकाशित हुआ था। प्रिया के भारतीय सेना में अफसर बनने की राह में दूसरी शुभसूचना थी.
ओटीए चेन्नई की पहली कैडेट
प्रिया ने भर्ती के लिए आवेदन कर दिया। 21 सितम्बर को भारतीय सेना में एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई । 24 महिला अफसरों ने एक नए सफर की शुरूआत की। प्रिया झिंगन भारतीय सेना की ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकडेमी (ओटीए) ज्वाइन करने वाली पहली महिला कैडेट बनी। वह ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई में प्रवेश लेने वाली कैडेट नंबर 001 थीं।
ट्रेनिंग से पहले लीवर में प्रोब्लम
प्रिया जब अपनी ट्रेनिंग के लिए चेन्नई जा रही थी तो अचानक पेट में असहनीय दर्द होने लगा और नौबत हाॅस्पिटल ले जाने की आ गई. जांच में मालूम चला कि प्रिया को लीवर में समस्या है. बीमारी के चलते उसे ट्रेनिंग अकादमी में रेलीगेट कर दिया जाएगा, यह सुनते ही प्रिया ने गुजारिश कर अस्पताल से छुट्टी ले ली। दर्द के बीच अकादमी पहुंचने के अगले ही दिन ढाई किलोमीटर की दौड़ में टॉप पर रही.
कोर्ट मार्शल का ट्रायल
प्रिया ने मार्च 1993 को अपनी ट्रेनिगं को सिल्वर मैडल के साथ पूरा किया, जिसके बाद उन्हें जज एडवोकेट जनरल के दफ्तर में तैनात किया गया। पहली जिम्मेदारी कोर्ट मार्शल करना था, जिसकी कार्यवाही देखने वाला अधिकारी एक कर्नल था। प्रिय ने इस गंभीर ट्रायल को बेहद गंभीरता से हैंडल किया। जब वरिष्ठ अधिकारियों को यह मालूम चला कि यह उनका पहला ट्रायल था तो सभी अधिकारी हैरान रह गए थे।
इतना भी आसान नहीं था रिकॉर्ड बनाना
प्रिया के नाम बेशक देश की पहली महिला थल सेना अधिकारी बनने का रिकॉर्ड है, लेकिन इस रिकॉर्ड को कायम करना इतना भी आसान नहीं था. ट्रेनिंग के दौरान प्रिया को पुरुष कैडेट्स की ही तरह सख्त ट्रेनिंग करनी पड़ती थी। वे कहती हैं कि जवान पुरुष अफसरों को तो सलाम किया करते थे, लेकिन एक महिला अफसर को नहीं। एक महिला को अपने सीनियर के रूप में अपनाने की जवानों में झिझक थी। महिलाओं के लिए अलग से शौचालय नहीं थे, लेकिन प्रिया ने अपने हुनर से हर परेशानी का समाधान ढूंढ निकाला.

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