लोकगीतों पर पीएचडी करने वाले शाहपुर के डॉ. सतीश ठाकुर ने 15 पहाड़ी फिल्मों में गाए गीत

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लोकगीतों पर पीएचडी करने वाले शाहपुर के डॉ. सतीश ठाकुर ने 15 पहाड़ी फिल्मों में गाए गीत

धर्मशाला से कांशी राम बौंथल की रिपोर्ट

उनके गाए गीतों के सैंकड़ों ऑडियो-वीडियो बन चुके हैं, वे 15 पहाड़ी फिल्मों में अपनी आवाज का जादू बिखेर चुके हैं। उनकी मखमली आवाज का आलम यह है कि सुनने वाला झूम उठता है। प्रदेश के लोकगायकों में डॉ. सतीश ठाकुर किसी परिचय के मोहताज नहीं। हिमाचली विवाह-शादियों में उनके गीतों पर अनायास ही सबके पैर थिरकने लगते हैं। कांगडा जिला के शाहपुर हलके के डिंढंब (चढी) के रहने वाले डॉ. सतीश ठाकुर ने लोकगीतों पर पीएचडी की उपाधि हासिल की है। वर्तमान में कॉलेज प्रोफ़ेसर के तौर पर स्टूडेंट्स को संगीत की शिक्षा दे रहे हैं।

पंद्रह पहाड़ी फिल्मों में गायन


डॉ. सतीश ठाकुर हिमाचली शोले, फुलमू-रांझू, मसतू कंडक्टर, तेरे कनै जीणा जैसी पंद्रह हिमाचली फिल्मों में गाने गा चुके हैं। इसके अलावा करीब 100 अपने गीतों की ऑडियो-वीडियो बना चुके हैं। डीजे के लिए पहली बार ‘ताऊ तेरा मुंडा बिगड़दा जाए’, ‘तेरे कनै दिल किंयां लाणा व ‘आया वो जिंदे आया बणजारा हो’ जैसे हिमाचली गीतों की डांस और नॉन-स्टॉप गीत भी इन्हीं की देन है।

मोहम्मद रफी अवॉर्ड

संगीत के प्रति डॉ. सतीश की लगन और प्रतिभा को देखते हुए गियेटी थियेटर शिमला ने इन्हें ‘मोहम्मद रफी’ अवॉर्ड से नवाजा है। इसके अलावा टैगोर थियेटर चंडीगढ में भी उनकी संगीत साधना के लिए अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। उन्हें और भी कई संस्थाओं की ओर से सम्मानित किया जा चुका है।

लोकगायक नजरअंदाज
डॉ. सतीश ठाकुर कहते हैं कि लोक संस्कृति के संरक्षण में जुटे प्रदेश के अधिकतर लोकगायकों को सरकारी स्तर पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में न के बराबर बुलाया जाता है। अगर किसी को बुलाया भी जाता है तो उन्हें प्रोत्साहन के तौर पर इतना पारिश्रमिक नहीं मिलता, जितनाबाहर से बुलाए गए गायकों को दिया जाता है।

 


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