लहसुन की हाई एल्टीट्यूड ‘पर्पल रूट्राइप’ बैरायटी ने किसानों को किया मालोमाल

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

लहसुन की हाई एल्टीट्यूड ‘पर्पल रूट्राइप’ बैरायटी ने किसानों को किया मालोमाल, दक्षिण भारत के ‘ओए देसी’ स्टार्टअप ने कुल्लू- मंडी से की 100 टन लहुसन की खरीद, पिछले साल के मुकाबले लहसुन से 40 लाख की अधिक इनकम, मटर के बीज की खरीद में लाखों बचाए

कुल्लू से विनोद भावुक की रिपोर्ट
कोरोना काल में कुल्लू और मंडी के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में पैदा होने वाली लहसुन की हाई एल्टीट्यूड ‘पर्पल रूट्राइप’ बैरायटी ने किसानों को मालोमाल कर दिया। दक्षिण भारत के ‘ओए देसी’ स्टार्टअप ने कृषि आधारित कुल्लू के समूह फेसकॉर्प इंडिया के माध्यम से कुल्लू-मंडी जिलों के किसानों से सीधे एक करोड़ के 100 टन लहुसन की खरीद की। कंपनी ने किसानों को खुद पैङ्क्षकंग मैटीरियल उपलब्ध करवाया और उत्पाद का किसानों के बैंक खातों में भुगतान किया। ऐसा पहली बार हुआ कि किसानों का लहसुन घर पर ही बिक गया और कीमत भी100 रूपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से डिजिटल पेमेंट के रूप में मिली। यह अब तक की लहसुन की सबसे बेस्ट कीमत है।

40 लाख की अधिक इनकम
फेसकॉर्प इंडिया के संस्थापक डॉ. देव भारद्वाज कहते हैं कि क्षेत्र के सौ किसानों से लहसुन की खरीद की गई। हर साल किसानों को लहसुन की अधिकतम कीमत साठ रूपए मिलती थी और उपज का भुगतान भी तीन माह होता था। इस बैरायटी के लहसुन की मांग दक्षिण भारत में होती है, लेकिन इस बार लॉकडाउन के कारण दक्षिण के व्यापारी लहसुन खरीद के लिए यहां नहीं पहुंच पाए। इस बार न केवल 40 लाख की अतिरिक्त आय किसानों को हुई, बल्कि भुगतान भी नकद हुआ।

बीज की खरीद में लाखों बचाए
डॉ. देव भारद्वाज कहते हैं कि किसानों ने मटर की फसल के लिए नकद भुगतान कर बीज खरीदा तो बाजार में 205 रूपए प्रति किलोग्राम वाला बीज 125 रूपए में घर के पास उपलब्ध हो गया। 200 किसानों ने मटर का बीज खरीदा और किसानों को अस्सी रूपए प्रति किलोग्राम में बचत हुई। इस तरह किसानों ने बीज खरीद में भी बीस लाख बचाए। फेसकॉर्प इंडिया ने ऑनलाइन ट्रांसफर के लिए भी किसानों को जागरूक किया। किसानों को पहली बार समूह में उत्पाद खरीदने व बेचने के फायदों के बारे में पता चला। फेसकॉर्प इंडिया ने किसानों से मटर खरीद के लिए भी करार किया गया।

पर्पल स्ट्राइप’लहसुन के खास गुण
6000 फुट की ऊंचाई से ऊपर वाले क्षेत्रों में पैदा होने वाली लहसुन की ‘पर्पल रूट्राइप’ बैरायटी का लहसुन पर्पल कलर का होता है। इसके रंग के निर्धारण में वातावरण अहम रोल अदा करता है। दस किलोग्राम बीज से औसतन एक क्विंटल लहसुन की पैदावार होती है। किसान हर बार अपनी फसल का पांच से दस प्रतिशत बीज के लिए संरक्षित कर लेते हैं। यह नौ माह की फसल है। सितंबर में लहसुन की बिजाई होती है, जबकि मई- जून में इसकी फसल तैयार होती है। इसके ब्लब के 60 एमएम साइज को बेस्ट साइज कहा जाता है। इसके एक ब्लब में 9 से लेकर 14 कलियां होती हैं।

‘ओए देसी’ स्टार्टअप की पहल
बंगलुरू आधारित ‘ओए देसी’ स्टार्टअप दक्षिण भारत के पांच हजार परिवारों के लिए फार्म फ्रैश हरी सब्जी और डेयरी फ्रैश दूध उपलब्ध करवाता है। ‘पर्पल रूट्राइप’ लहसुन कमर्शियल कुकिंग में ज्यादा पसंद किया जाता है। दक्षिण भारत में नॉन वेज खूब बनता है, इसलिए वहां इस किस्म के लहसुन की खपत बहुत है। ओए देसी’ स्टार्टअप अपने ग्राहकों के लिए पहली बार ‘पर्पल रूट्राइप’ लहसुन उपलब्ध करवाने जा रहा है।
पांगी व बड़ा भंगाल पर फोकस
डॉ. देव भारद्वाज का कहना है कि फेसकॉर्प इंडिया मंडी व कुल्लू जिलों के अलावा चंबा के जनजातीय क्षेत्र पांगी व कांगड़ा के बड़ा भंगाल क्षेत्र में किसानों से ‘पर्पल रूट्राइप’ के लहसुन की खेती का ट्रायल करवाने जा रही है। किसानों को बीज व अन्य इनपुट्स उपलब्ध करवाने के साथ कंपनी उपज खरीद के लिए किसानों से करार करेगी।

लहसुन उगाने वाले यंग फार्मर
लहसुन की खेती से रोजगार सृजन के लिए युवा आगे आ रहे हैं। इस साल राजू ठाकुर सहित यह युवा किसानों की तिकड़ी लहसुन उत्पादन में सबसे टॉप पर रही है। अगर प्रदेश का कृषि विभाग इसके लिए जमीनी प्रयास करे तो प्रदेश के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लहसुन की खेती रोजगार सृजन व सतत् आजीविका का मॉडल बन सकती है। लहसुन इन क्षेत्रों में सामाजिक- आर्थिक बदलाव का कारक बन सकता है।

‘पर्पल रूट्राइप’ लहसुन उत्पादक नजरअंदाज – न कोई क्रॉप प्लान और न कोई न्यूट्रिशन मेनेजमेंट, न ही क्रॉप हार्बेस्टिंग का प्रबंध
लहसुन की बिजाई के लिए बाजार में छोटी मशीन उपलब्ध है, लेकिन कुल्लू व मंडी के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में परम्परागत तरीके से लहसुन की बिजाई की जाती है। इन क्षेत्रों के लिए कृषि विभाग के पास न कोई क्रॉप प्लान और न ही कोई न्यूट्रिशन मेनेजमेंट है। क्रॉप हार्बेस्टिंग का कोई प्रबंध न होने के कारण बरसात के मौसम में लहसुन को सुखाने में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। लहसुन पूरी तरह से सूख नहीं पाता और ट्रांसपोर्ट करने के दौरान खराब होने लगता है। इसी तरह ग्रेडिंग की कोई व्यवस्था नहीं है। ऊपर से तुर्रा यह कि लहसुन तो मसाला है, इसलिए 1.5 प्रतिशत मंडी टैक्स देना पड़ता है।

लहसुन अब पॉलीहाउस में सुखेगा
सैंज, बंजार, आनी और थुनाग के सैंकड़ों परिवार इस बैरायटी के लहुसन की खेती कर रहे हैं। डॉ. देव भारद्वाज कहते हैं कि उनका समूह यहां के किसानों को लहसुन की उन्नत खेती के लिए आधुनिक कृषि उपकरण, खेती से संबंधी अन्य इनपुट्स व नेचुरल गांव उपलब्ध करवाने के साथ किसानों के उत्पाद के संग्रहण के लिए व्यवस्था करने जा रहा है। वे कहते हैं कि सुखाने के चलते फसल बर्बाद न हो, इसके लिए उनका समूह अगले साल से पॉलीहाउस में लहसुन सुखाने की व्यवस्था करवाने जा रहा है।

सेब के लिए वरदान लहसुन
सेब के पेड़ों की जड़ों में कई तरह के कीड़ों के हमले होते हैं और सेब पेड़ों को कीड़ों से बचाने के लिए बागवानों को कीटनाशकों पर भारी भरकम राशि खर्च करनी पड़ती है। जिसके चलते जहां उत्पाद की गुणवता प्रभावित होती है, वहीं दूसरी उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। लहसुन की खेती को सेब के बागानों के लिए वरदान कहा गया है। डॉ. देव भारद्वाज का कहना है कि अगर सेब के बगीचों में लहसुन की खेती करते हैं तो लहसुन की गंध कीड़ों को भगाने का काम करती है।


Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *