रूमैल सिंह को एक लोकगीत ने बना दिया ‘साभो भरमौरिया’, ‘मेरा खिनु बड़ा उस्ताद हो’ चढ़ा बच्चे बच्चे की जुबान पर, प्रदेश के लोक गायकों में एक अलग ही पहचान है इस लोकगायक  की, गीतों के बहाने गद्दी संस्कृति का संरक्षण

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रूमैल सिंह को एक लोकगीत ने बना दिया ‘साभो भरमौरिया’, ‘मेरा खिनु बड़ा उस्ताद हो’ चढ़ा बच्चे बच्चे की जुबान पर, प्रदेश के लोक गायकों में एक अलग ही पहचान है इस लोकगायक  की, गीतों के बहाने गद्दी संस्कृति का संरक्षण

धर्मशाला से कांशी बौंथल की रिपोर्ट

‘मूं भी जाणा ठंडे भरमौरा’ और ‘जोता पुर लसकेया तारा हो’ जैसे मशहूर गीतों के रचियता और गायक ठाकुर रूमैल सिंह ने अपने गीतों के सुर-ताल से गद्दी संस्कृति को जीवित रखा है। इनके एक मशहूर गीत का पात्र ‘साभो भरमौरिया’ है जिस के कारण अधिकतर लोग इन्हें साभो भरमौरिया के नाम से भी जानते हैं। उनका लिखा और गाया ‘मेरा खिनु बड़ा उस्ताद हो’ हिमाचल प्रदेश में बच्चे बच्चे की जुबान पर है।

दिल से फूट पड़ा संगीत


इन्हें बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था। संगीत में इनकी जो लग्न और हुनर है, उसे वो भगवान की देन समझते हैं। इन्होंने किसी भी म्यूजिक स्कूल या संगीत घराने से शिक्षा नहीं ली है। इन्होंने पहली बार जब यह छठी कक्षा में पढते थे, तब स्वतंत्रता दिवस पर अपनी पहली प्रस्तुति दी थी।

पेशा नहीं हुनर है गायकी
संगीत इनका शौक है पेशा नहीं है वर्तमान समय में यह हिमाचल प्रदेश बिजली बोर्ड में पिछले 25 सालों से राजधानी शिमला में अपनी सेवा दे रहे हैं। इन्होंने बहुत सारी डिग्रियां हासिल की हैं । दसवीं तक की पढाई इनकी राजकीय उच्च विद्यालय भरमौर में हुई।

गर्दिश में चमका सितारा
इनका जन्म 10 फरवरी 1966 को जिला चंबा में भरमौर के छोटे से गांव रजोर में हुआ । इनके पिता स्वर्गीय ठाकुर श्री धमीला राम गांव में ही खेतीवाडी और मजदूरी का काम करते थे। चार भाईयों में यह सबसे छोटे हैं। इनका कहना है कि वे दो भाई एक ही कक्षा में पढते तो किताब के एक ही सैट से गुजारा करते थे। आज चारों भाई सरकारी नौकरी में उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हैं।
‘मेरी पदमा’ आडियो कैसट
सन 2004 में इन्होंने अपने संगीत के हुनर को अजमाया ‘मेरी पदमा’ नाम की एक आडियो कैसट निकाली। उसका अच्छा रिस्पांस रहा। फिर उसके चार साल बाद इनकी पत्नी बंदना ठाकुर ने इन्हीं के गाऐ गीतों की ‘साभो भरमौरिया’ नाम की एक एलबम तैयार की, जिसे हिमाचल के लोगों ने बहुत पसंद किया। यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों की जुबान पर भी इस एलबम के गीत थे। आज भी विवाह- शादियों की रौनक इनके गीतों के बिना अधूरी लगती है। उसके बाद इनके गीतों की बहुत सारी एलबम रिलीज हुई जैसे ‘नेहरी बदली’ ‘हाय ढोला’ बगैरा- बगैरा।

गीतों में अमर गद्दी संस्कृति
ठाकुर रूमैल सिंह ने अपने गीतों के जरिए गद्दी संस्कृति को भी जिंदा रखा है। इनके गीतों की एक खासियत यह है कि वह अपने गीतों के बोल में गद्दी भाषा का इस्तेमाल करते हैं और गीतों के विडियो में भी गद्दी पहनावे की अनूठी मिसाल पेश करते हैं । ‘इक चिडू ऐसा वो चूंजी पर पैसा वो’ स्वंय पर फिल्माऐ गए इस गीत में उनका गद्दी पहरावा कितना यूनीक और सुदंर दिखता है ।


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