रंगों की दुनिया : शिमला के ‘राम’, पेरिस में सीखी कला की बरीकियां और बनारस में मिले जीवन के रंग

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रंगों की दुनिया : शिमला के ‘राम’, पेरिस में सीखी कला की बरीकियां और बनारस में मिले जीवन के रंग

शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट

रंगों की दुनिया के एक संत की जीवन कथा में जीवनदर्शन के रूपांतरण की प्रेरककथा समाहित है। शिमला में पैदा हुआ एक युवा दिल्ली के नामी कॉलेज से अर्थशास्त्र की डिग्री हासिल कर कला की दुनिया की गहराई का अनुभव लेने पेरिस पहुंचता है। आधुनिक कला की बरीकियों का अध्ययन करता है और फिर जब भारत लौटकर बनारस के घाट पर पहुंचता है तो उसकी कला के मायने बदल जाते हैं। 93 साल की उम्र तक दिल्ली में रहकर कला की साधना में रत रहने वाले राम कुमार की कला की दुनिया की कहानी कम रोचक नहीं है, जिसकी शुरुआत तो लेखन से होती है, लेकिन फिर रंगों की दुनिया में रंगकर विश्व विख्यात हो जाते हैं। कला की दुनिया की ऊंची उड़ान का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट नई दिल्ली, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च मुंबई, नेशनल म्यूजियम बर्लिन और नेशनल म्यूजियम पुर्तगाल में इस महान भारतीय चित्रकार के काम को संग्रहित किया गया है।

चित्रकला की ललक ले गई पेरिस


1924 में शिमला में जन्में राम कुमार ने सैंट स्टीफन कॉलेज दिल्ली से अर्थशास्त्र की डिग्री लेने के बाद दिल्ली शारदा उकिल स्कूल ऑफ ऑर्ट से कला का अध्ययन किया। 1949 में उन्होंने भारत छोड़ दिया और फ़्रांस दूतावास की ओर से प्रदान की गई स्कॉलरशिप पर पेरिस चले गए। पेरिस के आंद्रे लोहटे और फर्नांड लेजर से पेंटिंग की बरीकियां सीखकर भारत लौटे। उसके बाद उन्होंने अमेडियो मोदिग्लियानी की चित्रशैली का अध्ययन किया और चित्रकला के आधुनिकतावादी प्रभावों को समझा। हालांकि 1958 में वे एक बार फिर पेरिस गए, लेकिन छह माह बाद जब भारत लौटे और उन्हें बनारस जाने का अवसर मिला तो उनकी चित्रकला के मायने बदल गए।

 

बनारस में मिले असली रंग


1960 में जब राम कुमार बनारस जाते हैं तो मानों उनकी जिंदगी ही बदल जाती है। उनके चित्रों के लिए विषयवस्तु को बनारस के घाटों पर मौजूद है। धूल उड़ाते गायों के झुंड, अधनंगे नहाते साधू-संन्यासी, लोगों की तर्कातीत श्रद्धा, पाप और पुण्य का लेखा-जोखा, पुराने मकान और गलियां, विधवाएं, जलते हुए शवों पर विलाप करते परिजन और चुपचाप बहती गंगा। एक अनूठा मायालोक जहां गंगा और उसके घाट और उसमें बसते लोगों की दिनचर्या सब आपस में ऐसे घुली-मिली थीं कि उन्हें एक-दूसरे से अलग करके देखना असंभव। हर दृश्य अपने में एक कंपोजिसन, रंगों और रेखाओं का अनूठा रचना संसार। यह सब कुछ रंगों के बहाने राम कुमार को जीवन को गहरे झांकने की समझ देते हैं।

कुदरत के करीब रामकुमार के रंग


रामकुमार के रंगों की अपनी ही एक दुनिया है। उनके बनाए चित्रों में जैसे प्रकृति स्वंय ही प्रविष्ठ होती है। उनके आरंभिक चित्रों में भारतीय माध्यम वर्ग, विचलित संत्रस्त बेरोजगार युवा पीढ़ी, शोषित शापित मजदूर, उजड़े मकानों के सामने खड़े बेघर लोग, नाउम्मीदी से भरी खिड़कियां और बेहद उदास शहर नजर आते हैं।

देश-दुनिया तक रंगों की चमक


1949 से लेकर साल 2018 तक राम कुमार के बनाए चित्रों की मुंबई, दिल्ली और कोलकाता में 40 एकल प्रदर्शनियां लगीं । उन्होंने जिनेवा, पेरिस, साओ पाउलो, टोक्यो, वेनिस, लंदन में रॉयल एकेडमी ऑफ आट्र्स और ग्रेट ब्रिटेन के आट्र्स काउंसिल के समूह कार्यक्रमों में भी भाग लिया। 1993 में उनके काम का बड़ा हिस्सा नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट नई दिल्ली में प्रदशित किया गया। भारत सरकार की ओर से 1979 में प्रतिष्ठित पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। कला साधना के लिए उन्हें पद्म विभूषण भी मिला।

बनारस के बाद हिमालय में योगी


राम कुमार बनारस के मोह में ऐसे बंधे कि अल्पविराम और छोटे अंतराल के बाद वे अकसर बनारस जाते रहे। उनके लैंडस्केप्स में बनारस की कई छवियां संवाद करते हुए मिलती हैं। 1969 में रॉकफेलर छात्रवृत्ति पर वे संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको गए। 70 के दशक से उनका अधिकतर काम उत्तर भारत में दूरस्थ, पहाड़ी, प्राचीन, आध्यात्मिक केंद्रों के अनुभवों और यादों पर आधारित है तथा लद्दाख के पहाड़ों और बौद्ध मठों के नजदीक प्रतीत होता है। मानो एक योगी जागृति की खोज में हिमालय में विचर रहा हो।

कथाकार से चित्रकार का सफर


राम कुमार एक महान कलाकार थे जो 93 साल की उम्र तक सक्रिय रहे । राम कुमार ने अपने कैरियर की शुरुआत एक लेखक के रूप में की, लेकिन बाद में रंगों की दुनिया में शामिल हो गए। एक तरफ वो चित्र बनाते रहे तो दूसरी तरफ अपनी कहानियों में भी जीवन की त्रासदियों से मुठभेड़़ करते मिलते हैं। प्रसिद्ध कथाकार निर्मल वर्मा के भाई राम कुमार ने कहानियां और यात्रा संस्मरण भी लिखे हैं। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में हुस्ना बीबी तथा अन्य कहानियां, एक चेहरा, समुद्र जबकि यूरोप के स्केच यात्रा संस्मरण प्रमुख हैं। 14 अप्रैल 201 8 को यह महान चित्रकार सदा – सदा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह गया ।

 


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