यूरोप में भी है ज्वालाजी का मंदिर, शिलालेख बोलते भारतीयों ने बनाया अजऱबेजान का बाकू आतेशगाह कभी ‘बड़ा ज्वालाजी’ से ‘छोटा ज्वालाजी तक धार्मिक यात्रा करते थे हिंदू तीर्थयात्री

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यूरोप में भी है ज्वालाजी का मंदिर, शिलालेख बोलते भारतीयों ने बनाया अजऱबेजान का बाकू आतेशगाह
कभी ‘बड़ा ज्वालाजी’ से ‘छोटा ज्वालाजी तक धार्मिक यात्रा करते थे हिंदू तीर्थयात्री
विनोद भावुक की रिपोर्ट
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला के जवालामुखी शहर में स्थित ज्वालाजी मंदिर से बारे में तो आप अच्छी तरह से परिचित है। इस मंदिर में एक शाश्वत ज्वाला जलती है जो यहां पूजा करने वालों को अपनी ओर आकर्षित करती है। इस मंदिर को देश के शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। राजा भूमि चंद काटोच द्वारा स्थापित इस मंदिर के बारे में दिलचस्प यह है कि यहां चट्टानों में दरार से निकलने वाली लौ है। यहां कांगड़ा स्थित ज्वालाजी मंदिर का संदर्भ इसलिए जरूरी है, क्योंकि आपको ऐसे ही एक और ज्वालाजी मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जो यूरोप में स्थित है। अजऱबेजान की राजधानी बाकू के पास सुराख़ानी शहर में स्थित यह मंदिर मध्यकालीन हिंदू धार्मिक स्थल है। इस मंदिर में संस्कृत (देवनागरी)और पंजाबी (गुरूमुखी) में खुदे शिलालेख भी मंदिर के संबंध को हिंदू धर्म से जोड़ते हैं।
मध्यकाल में हिन्दू धार्मिक स्थल
मध्यकाल के अंत में पूरे मध्य एशिया में भारतीय समुदाय फैले हुए थे। बाकू में पंजाब के मुल्तान क्षेत्र के लोग,आर्मेनियाई लोगों के साथ-साथ, व्यापार पर हावी थे। कैस्पियन सागर पर चलने वाले समुद्री जहाज़ों पर लकड़ी का काम भी भारतीय कारीगर ही किया करते थे। बहुत से इतिहासकारों की सोच है कि बाकू के इसी भारतीय समुदाय के लोगों ने आतेशगाह को बनवाया होगा या किसी पुराने ढांचे की मरम्मत कर के इसे मंदिर बना लिया होगा। बाकू आतेशगाह को ‘बड़ा ज्वालाजी’ और कांगड़ा के ज्वालाजी मंदिर को ‘छोटा ज्वालाजी कहा जाता था। कभी हिंदू तीर्थयात्री, ‘बड़ा ज्वालाजी’ से ‘छोटा ज्वालाजी तक धार्मिक यात्रा करते थे। जैसे-जैसे यूरोपीय विद्वान मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में आने लगे, उन्हें अक्सर इस मंदिर पर और उत्तर भारत (ज्वालामुखी)और बाकू के बीच सफऱ करते हिन्दू भक्त मिल जाया करते थे।
अब संग्राहलय में तबदील मंदिर
बाकू आतेशगाह एक पंचभुजा (पेंटागोन)अकार के अहाते के बीच में एक मंदिर है। बाहरी दीवारों के साथ कमरे बने हुए हैं जिनमें कभी उपासक रहा करते थे। बाकू आतेशगाह का निर्माण 17वीं और 18वीं शताब्दियों में हुआ था और 1883 के बाद इसका इस्तेमाल तब बंद हो गया, जब इसके इर्द-गिर्द ज़मीन से पेट्रोल और प्राकृतिक गैस निकालने का काम शुरू किया गया। 1975 में इसे एक संग्राहलय बना दिया गया। 2007 में अजऱबेजान के राष्ट्रपति के आदेश से इसे एक राष्ट्रीय ऐतिहासिक-वास्तुशिल्पीय आरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया।
आतिशगाह का मतलब आग का घर
फारसी में आतिश का अर्थ आग होता है और इसे ईरानी लहजे में आतेश उच्चारित करते हैं। यह हिन्दी में भी आतिशबाज़ी जैसे शब्दों में मिलता है। गाह शब्द का अर्थ सिंहासन, बिस्तर या घर होता है, आतिशगाह का मतलब आग का घर या सिंहासन है। सुराख़ानी शहर अजऱबेजान के आबशेरोन प्रायद्वीप पर स्थित है जो कैस्पियन सागर से लगता है। यहां की ज़मीन से तेल रिसता रहता है और कुछ स्थानों पर स्वयं ही आग भडक़ जाती है।
मंदिर के निर्माण को लेकर कई मत
कुछ विद्वानों का सोचना है कि यह सम्भव है कि ईरान पर इस्लामी क़ब्ज़े से पहले इस जगह पर एक पारसी मंदिर रहा हो। इतिहासकारों के मुताबिक 17वीं सदी के अंत में सुराख़ानी में भारतीय आतिशगाह बनने से पहले स्थानीय लोग भी सात छिद्रों में जलती ज्वालाओं के स्थान पर पूजा किया करते थे। अग्नि को हिन्द-ईरानी की हिन्दू वैदिक धर्म और पारसी धर्म की दोनों शाखाओं में पवित्र माना जाता है हिन्दू लोग इसे अग्नि कहते हैं और पारसी लोग इसके लिए आतर सजातीय शब्द प्रयोग करते हैं। विख्यात विद्वान, एवी विलयम्ज़ जैकसन आतेशगाह के अनुयायियों की वेशभूषा, तिलकों, शाकाहारी भोजन व गौ पूजन के बारे में कहते हैंं कि वे स्पष्ट रूप से भारतीय हैं।

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