याद आया कुछ: स्वाद में कितने लाजवाब होते थे ‘धुईं’ में अपने हाथों पकाये हुए देसी पॉपकोर्न ‘भोगड़े’

Spread the love

याद आया कुछ: स्वाद में कितने लाजवाब होते थे ‘धुईं’ में अपने हाथों पकाये हुए देसी पॉपकोर्न ‘भोगड़े’
सुंदरनगर से पवन चौहान की रिपोर्ट
आज वह दौर है जब हर चीज बटन दबाते ही घर ही दहलीज तक बहुत ही कम समय में आसानी से पहुंच जाती है। चाहे वह तरीका ऑनलाइन हो या ऑफलाइन। खाने-पीने, पहनने से लेकर घर की हर एक छोटी से छोटी, बड़ी से बड़ी चीज घर तक पहुंच रही है। इन्ही सब खाने-पीने की चीजों में से यदि ‘पॉपकॉर्न’ की बात करें तो मुंह में पानी आ जाता है। आज आप फटाफट कंपनी के बंद पैकेट में से कई स्वादों में लिपटी मक्की को निकालकर चंद ही मिनटों में पॉपकॉर्न का स्वाद ले लेते हैं, लेकिन लगभग दो दशक पहले तक वह भी वक्तथा जब इस स्वाद के लिए कई-कई घंटों तक इंतजार करना पड़ता था। काफी मेहनत करनी होती थी। इन स्वादिष्ट पॉपकॉर्न को तैयार करने का केन्द्र बिंदु था ‘धुईं’। धुईं अर्थात पोले धान की सुलगती ढेरी जिसमें से धुआं निकलता रहता है।
ऐसे तैयार की जाती थी ‘धुईं’
‘धुईं’ धान की फसल को काटने और पुणने के बाद बचे पोले धान (धान का दाना जिसमें चावल न हो) की ढेरी होती है। जिसको किसी खाली जगह अमुमन खाली खेत में ही आग लगाकर सुलगाया जाता है। धुईं डालने के समय शरद ऋतु का आगमन हो चुका होता है। धुईं जितनी अच्छी तरह से जली हो, उतना ही मजा उसमें मक्की भुनने का आता है। इससे मक्की के दाने भी बढिय़ा पॉपकॉर्न को तैयार करते हैं। धुईं को अच्छे से सुलगाने के लिए शाम को ही पोले धान की ढेरी में एक-दो जगह (ढेरी के आकार को देखते हुए) पर सुलगे हुए उपलों के टुकड़े इस ढेरी के अंदर डाल दिए जाते हैं ताकि यह ढेरी धीरे-धीरे सुबह तक पूरी तरह से सुलग जाए।
पॉपकॉर्न तैयार करने के लिए खास मक्की
सुबह होते ही बच्चे और बड़े चल पड़ते हैं पॉपकॉर्न तैयार करने के लिए छंटी हुई मक्की लेकर। यह वह मक्की होती है जिससे ज्यादा पॉपकॉर्न बन सके। ऐसी मक्की को बड़ों की पारखी नजर आसानी से पहचान लेती है। बता दें कि धान की फसल से पहले मक्की की फसल को किसान इक्_ा कर चुके होते हैं। इन्हे वे धान की फसल के कटने तक सुखा भी चुके होते हैं या फिर सुखा रहे होते हैं। यह सब मौसम पर निर्भर करता है।
पहला पॉपकॉर्न सभी धुईं को अर्पित
धुईं के पास पहुंचकर सभी धुईं के चारों ओर अपनी-अपनी छांटी हुई मक्की भुनने की जगह पर बैठ जाते हैं। सुलगी हुई धुईं से थोड़ी-थोड़ी आग एक छोटी लकड़ी (इसी लकड़ी द्वारा पलटा दे देकर मक्की को भुना जाता है) के सहारे सरकाई जाती है और उस आग के बीच में मक्की को थोड़ी देर दबाने के बाद जब मक्की के दाने का पहला पटाखा हो जाता है तो उसे भुनना शुरु कर दिया जाता है। पटाखे के बाद तो पॉपकॉर्न उछल-उछलकर धुईं से बाहर गिरने लगते हैं। सबसे पहला पॉपकॉर्न सभी धुईं को चढ़ाते हैं। इसे चढ़ाने के बाद सब धुईं से फरियाद यह करते हैं कि उनकी मक्की से खूब पॉपकॉर्न निकले। यह धुईं को सम्मान देने का एक तरीका है।
बार- बार खाने को मन ललचाए
धुईं की आग से बने इन पॉपकॉर्न का स्वाद तो खाते ही बनता। जिला मंडी में स्थानीय बोली में पॉपकॉर्न को ‘भोगड़े’ और कांगड़ा में ‘खलाहड़े’ कहकर पुकारा जाता है। बेशक, बाजार में मिलने वाले पॉपकॉर्न कई स्वादु मसाले डालकर टेस्टी बन जाते हैं, लेकिन धुईं के इन पॉपकॉर्न का मजा बाजार के पॉपकॉर्न से बिल्कुल भिन्न और इतना मीठा होता है कि एक बार खाने वाला इन्हे बार-बार खाना चाहेगा।
‘रोड़’ का भी अपना टेस्ट
मक्की के जिन दानों से पॉपकॉर्न नहीं बनते उनका स्वाद भी पॉपकॉर्न के स्वाद से हटकर लेकिन बहुत बेहतरीन होता है। इन्हे स्थानीय बोली में ‘रोड़’ कहा जाता है। बहुत सारे लोग पॉपकॉर्न के बजाय इन रोड़ों को खाना ज्यादा पसंद करते हैं। इस धुईं में पिछले वर्ष के बचे हुए धान या फिर ताजे सुखे धानों को भी भुना जाता है। इन्हे ‘खिला’ कहा जाता है।
नियमों के बंधी थी धुईं की व्यवस्था
धुईं के पास मक्की भुनने तथा अच्छी सुलगी हुई धुईं वाले हिस्से की तरफ बैठने के लिए जंग होती थी। भुनने वाले ज्यादा हो जाएं और धुईं कम हो तो ‘पराओ’ (पराओ अर्थात भुनने के लिए एक बार में डाले गए दाने) की संख्या के हिसाब से धुईं के पास की बैठक तय होती है। तय किए गए पराओ की गिनती भुनने के बाद दूसरा व्यक्ति अपने पराओ भुनने बैठता था। मक्की भुनते-भुनते बहुत सारी खट्टी-मीठी, अपनी-परायों की बातें भी साथ-साथ होती रहती थी। यह सारा माहौल एक अलग-सा आनंद लिए रहता था।
अब पैकेट वाले पॉपकोर्न
67 वर्षीय कृष्णा देवी कहती है कि पुराना समय बहुत ही अच्छा था। सबके पास एक-दूजे का हाल-चाल या समस्या जानने के लिए समय होता था। एक साथ मिलकर सभी काम निपटाते थे। धुईं के पास हम सुबह से शाम तक भोगड़े भुनने (मक्की भुनने) का आनंद लेते थे। आपस में लड़ते भी थे परंतु उसी समय मान भी जाते थे। लेकिन अब धुईं वाली मक्की के भोगड़ों का स्वाद कहां! अब धुईं बहुत कम जलती है, क्योंकि अब लोगों के पास धुईं के पास बैठकर भोगड़े भुनने का समय ही नहीं है। वे तो बस अब बंद पैकेटों में मसाले के स्वाद वाले भोगड़ों का स्वाद लेना ही पसंद करते हैं।
मंच प्रदान करती थी धुईं
धुईं आज भी जलाई जाती है, लेकिन बहुत ही कम स्थानों पर। अब अपने घर की मक्की के धुईं में भुने मीठे भोगड़े नसीब नहीं होते। हमारी जीभ पर अब बाजार की तरह-तरह के मसाले से सजी पैकेट वाली मक्की का ही स्वाद चढ़ गया है। परंतु इतना अवश्य है कि धुईं के पॉपकॉर्न सिर्फ जीभ का स्वाद ही नहीं बांटते थे, अपितु साथ बैठकर एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का मौका भी देते थे। धुईं आस-पड़ोस को एक मंच प्रदान करती हुई सबको एक सूत्र में बांधे रखती थी। यह समाज को जोडऩे वाली कड़ी की तरह थी।
———————————————————
-पवन चौहान,गांव व डॉ, महादेव, तहसील- सुंदरनगर, जिला-मंडी.
मो. 098054 02242, 094185 82242

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *