यात्रा वृतांत : पंजाबी की जुबां पर ‘बडका जी इडी न कोई फिकर न कोई फाका, इडी न कोई चोरी न कोई डाका’, पहाड़ी बोले, ‘यारां बेलियां बिन नईयो सरदा’

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पंजाब के चौधरी लक्की सिंह का यूनीक बिजनेस आइडिया: फिट भी, हिट भी

यात्रा वृतांत : अरविंद शर्मा, धर्मशाला

कुदरत के साथ कुदरती रूप से रहना सबसे बड़ा आनंद है। इंसान अपनी प्राथमिकताएं खुद तय करता है, यानि कि जिन हालात में आज इंसान रह रहा है उन हालात के लिए इंसान खुद  जिम्मेवार है।
इस बार त्रियुंड से वापिस धर्मशाला उतरने के लिए मैंने वाया लेटा-माणा-इंद्रूनाग वाले रास्ते को चुना। इस रास्ते में धर्मशाला से लेकर लगभग समूची कांगड़ा घाटी के दर्शन होते हैं। रास्ता हालांकि त्रियुंड वाया गलू वाले रास्ते से थोड़ा सा मुश्किल है, लेकिन   रोमांचक है। वाया गलू जाने पर आपको दुकानें मिल जाएंगी, लेकिन वाया इंद्रुनाग जाने पर बन गोटू गांव से आगे रास्ते में त्रियुंड तक आपको न दूकान मिलेगी न पानी। तीन अक्टूबर सुबह आठ बजे त्रियुंड से पहली पहाड़ी उतरने पर भेड़ों का धण नजर आते ही मन में पहला ख्याल आया कि पक्का यहां डेरा डाले पुहाल भी बैठे होंगे और अगर पुहाल होंगे तो उनसे गप्पें मारने का अपना ही मजा है।कवि गोपाल शर्मा की समीक्षा : संघर्ष और साहस की अभिव्यक्ति है कवि विनोद ध्रब्याल राही का काव्य संग्रह “चांद पर लाजो”

खैर जल्दी पुहालों को ढूंढने के लिए मैं भेड़ों के बीच से होकर नीचे मैदान पर पहुंचना चाहता था, लेकिन अभी मैंने भेड़ों के धण में कदम रखा ही था कि नीचे से आवाज़ आई, हे हेलो ब्रदर .. कम डाउन फ्रॉम अदर साइड .. यह शब्द मेरे कानों में पड़े ही थे कि मैंने वापिस उत्तर दिया, कुणची भाऊ (किस रास्ते भाई ) ….. मेरा वापिस उत्तर सुनने पर मुझे आवाज लगाने वाला बाईस -तेईस साल का लड़का हंसा और बोला, आरा भाऊ इडिया तुन्दी निक्करा-कैमरे हेरी  मूं बल्लू कोई अंगरेज-अंग्रूज भूणाÓ (अरे भाई यहां से तुम्हारी निक्कर-कैमरा वगैरह देखने पर मैंने सोचा कोई अंग्रेज बगैरह होगा )। भेड़ें इस वक्त आराम से बैठी हैं अगर इनके बीच से कोई गुजरेगा तो ये इधर -उधर भागने लगेंगी और फिर मुझे   इनके पीछे।

खैर मैं रास्ता बदलते हुए उस लड़के के पास पहुंंच गया वहां पहुंचने पर दो पुराने परिचित पुहाल अमर सिंह और मेघो राम आग जलाए डेरे के पास बैठे मिले, जिन्हें एक साल बाद फिर से पहाड़ों में देख कर बहुत प्रसन्नता हुई। पिछले साल ये दोनों पुहल इंद्ररहार पास के नीचे मिले थे। मुझे देख कर दोनों ने उठ कर स्वागत करते हंसते हुए कहा, “बच्चा सैह कुण मड़ी जेह्ड़ी तू न चडी”। मैंने उनके कुछ फोटो खींचे और फिर उनके साथ बैठ गया। तभी साथ में वो लड़का नुहारी (नाश्ता) लगा बनाने। लड़के ने पास रखी बोरी से आटा निकाला और फुलके (चपाती) लगा बनाने। न कोई चकला न कोई बेलना। सिर्फ तवा और आग …लड़के को हाथ से मोटे -मोटे आटे के रोट बनाते देख मैंने लड़के से गदियाली भाषा में पूछा, ‘तुन्दे घर कडिय़ा” (तुम्हारे घर कहां हैं?) लड़के ने उत्तर दिया द्तारपुर, पंजाब ।साहित्यकार भूपेंद्र जम्वाल ‘ भूपी’ का पहाड़ी भाषा पर विचार : ‘पहाड़ कन्ने पहाड़ी’

मैंने सोचा लड़का मजाक कर रहा है, सो  मैंने अमर सिंह से पूछा ‘एह तून्दा मुन्नू हा” (यह आपका बेटा है ) अमर सिंह ने जवाब दिया यह सही में पंजाब के दतारपुर का रहने वाला पंजाबी लड़का है और इसका नाम चौधरी लक्की सिंह है। यह तो पिछले चार सालों से पहाड़ों में हम गद्दियों के साथ रह-रह कर हम जैसा बन गया है। हमारी भाषा हमसे बेहतर बोलता है। जो हम खाते हैं वो ये खाता है। अब इन पहाड़ों में तो जो यह खिलाता है, हम वो खाते हैं । पिछले चार सालों में इसने तीन-सवा तीन सौ भेड़-बकरियों का अपना धण बना लिया है और इस धण से यह पैसे भी कमा रहा है। सर्दियों में अपनी प्रापर्टी (धण) के साथ अपने घर पंजाब चला जाता परिवार के पास।   मैं हैरानी से अमर सिंह की बातें सुन रहा था, तभी मैंने अमर सिंह को बीच में टोकते हुए लड़के से पूछा,  आज के युग में लोग आरामदायक जीवन जीना चाहते हैं, सो तुमने इन पहाड़ों को क्यूं चुना ..
लक्की ने जवाब दिया, बडका जी बचपन से देखता आ रहा था कि सर्दियों में गद्दी हमारे गांव वाली तरफ डेरा लगाते थे सो मैं भी देखा करता था कि जिस पापी पेट के नाम पर लोग फालतू में पैसा कमाने के लिए हर-कुछ अच्छा -बुरा कर गुजरते हैं उस पापी पेट को तो ये गद्दी लोग कुदरत के सहारे ही तंदरुस्ती से पाल लेते हैं।

जरूरतें इंसान की पूरी हो जाती हैं, लेकिन हसरतें कभी पूरी नहीं होती। यहां जिंदगी पढ़े -लिखे लोगों की जिंदगी से बेहतर है। अगर आज पंजाब में होता तो वातावरण और सेहत खराब करने वाली शायद किसी फेक्ट्री में काम कर रहा होता, लेकिन आज इन पहाड़ों में मैं हर तरह से संपन्न हूं। बिना मोबाइल बिना टेलीविजन आपको लगता होगा कि हम पिछड़े टाइप के लोग हैं लेकिन असल में पिछड़ा कौन है, ये आप जानते होंगे पर शायद समझते न हो। आप देखते होंगे शहरों की चिल्ल-पौं से घबरा के कितने ही लोग थोड़े वक्त के लिए शांति की तलाश में यहां आते हैं। हम तो हमेशा ही शांति में रहते हैं। ‘बडका जी इडी न कोई फिकर न कोई फाका ….इडी न कोई चोरी न कोई डाका ” (बड़े भाई यहां न कोई फिकर है न कोई फाका है, यहां न कोई चोरी है न कोई डाका है)। लिया हण अक फुल्का खायी लिया आलुआ कन्ने (लो अब चपाती खा लो आलुओं के साथ ) ..कहते हुए लक्की  गुनगुनाने लगा “असां चड़ी वो चंबे जो जाणा ओ रेसो गद्दियां दिये।   मैंने भी फुल्का खाया और इस बाईस -तेईस साल के लड़के की बातों को सोचते-सोचते चल पड़ा।  वापिस धर्मशाला वाली तरफ रास्ते में इंद्रुनाग से ऊपर वाले गांव बगनोटू में स्थानीय गद्दी युवा घास काट रहे थे। साथ में मोबाइल पर पंजाबी गाना बज रहा था …” यारां बेलियां बिन नहींयो सरदा ,,, वीरवार दिन न परहेज करदा ।  कसौली में पैदा हुए, मसूरी को बनाया घर, भारत में बचपन की स्मृतियां और प्रेम के कारण इंग्लैड से लौट आने वाले लेखक रस्किन बांड की जिंदगी से एक दिलचस्प कहानी, बकौल रस्किन – ‘आसान नहीं बच्चों का ध्यान किताबों की तरफ खींचना’

 

 


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