मिलिए मां बोली के संरक्षण में जुटे शिक्षक से, पहाड़ी भाषा में बारह पुस्तकों के लेखक हैं नवीन हल्दूणवी

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मिलिए मां बोली के संरक्षण में जुटे शिक्षक से, पहाड़ी भाषा में बारह पुस्तकों के लेखक हैं नवीन हल्दूणवी
कांगड़ा से भूपेंद्र जम्वाल भूपी की रिपोर्ट
जब कांगड़ी पहाड़ी साहित्य की बात चलती है तो नवीन हल्दूणवी का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। विशम्भर शर्मा ‘नवीन हल्दूणवी’ की अब तक कांगड़ी पहाड़ी भाषा में बारह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित नवीन की रचनाएं आकाशवाणी धर्मशाला और आकाशवाणी शिमला से भी प्रसारित हो चुकी हैं।
प्रभाकर और हिंदी में स्नातकोत्तर
नवीन हल्दूणवी का जन्म ‘विशम्भर शर्मा’ के रूप में 16 अप्रैल 1949 को कांगड़ा की सबसे उपजाऊ ( वर्तमान में महाराणा प्रताप सागर में जलमग्न) हल्दून घाटी के पंजराल गांव में श्रीमती गायत्री देवी और श्री रत्न लाल शर्मा के घर हुआ । नवीन हल्दूणवी ने राजकीय उच्च पाठशाला दरोका से दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करके पंजाब विश्विद्यालय से प्रभाकर और हिमाचल प्रदेश विश्विद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है।
नाथो गद्दी से प्रभावित हुए नवीन
नवीन जब छोटे थे तो गांव में आने वाले नाथो गद्दी से प्रभावित हुए। नाथो अपने पशुधन के साथ उनके गांव में डेरा डालते और सर्दी का मौसम वहीं काटते। नाथो तुकबन्दी करते जो बालक विशम्भर तथा उनके मित्रों को भाती। विद्यालय में वे छोटी छोटी कविताएं करते जिन्हें ख़ूब पसन्द किया जाता। जब वे थोड़े बड़े हुए तब पौंग बाँध बनाने की घोषणा हुई। इस सम्बंध में जगह जगह जलसे होते थे। ऐसे अवसरों पर नवीन अपनी कविताओं से सबका मन मोह लेते। विस्थापन के सम्भावित दर्द को वे भली भांति समझ चुके थे। सन 1967 में उन्होंने लिखा,” लोक गलांदे पौंग डैम सांजो लगा पंगा….”
कुण्डलिया छंद पाठकों ने पढ़े और सराहे
सन 1974 ई. में उनके कुण्डलिया छंद दिल्ली से प्रकाशित हिमधारा में पाठकों ने पढ़े और सराहे। ब्यास नदी पर पौंग बाँध बनने के कारण उपजाऊ हल्दून घाटी डूब रही थी । महाराणा प्रताप सागर जलाशय मकान, हाट बाजार , पेड़ ,खेत आदि सब खाकर अपना आकार बढ़ाता जा रहा था। इस दौरान ‘मने दी भड़ास’ में नवीन की दस कविताएं प्रकाशित हुईं । अपना गांव छोड़ कर वे जसूर के समीप छतरोली में बस गए। 1982 ई. उनकी प्रथम पुस्तक ‘ एह दुनिया ‘ प्रकाशित हुई।
बारह पुस्तकें हो चुकी प्रकाशित
देश भर के पत्र पत्रिकाओं में उनकी कहानियां , अनुवाद, काव्य आदि छपने शुरू हो गए। नेशनल बुक ट्रस्ट तथा साहित्य अकादमी के संकलनों में भी नवीन हल्दूणवी की अनेक रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। 1985 में उनका ‘पलौ खट्टे मिट्ठे’ कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ । इसके बाद ‘भारते ने प्यार’, ‘बोला करदे पहाड़’, ‘प्हौंच चढ़ी जा गास’ , ‘काल्हू निखरगा रंग’ आदि पुस्तकें प्रकाशित हुईं। हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग से एक कर्मठ अध्यापक के रूप में सेवा करने के उपरांत वे लगातार लेखन में रत हैं । ‘मैंझर’, ‘लोक गलांदे सारे’, ‘प्हौंचा वाळे’ , ‘सुथरी सोच’, ‘म्हौल बगाड़ीता’ और ‘कुड़मां दे नखरे’ शीर्षक से इनकी अभी तक बारह पुस्तकें आ चुकी हैं।
ठेठ कांगड़ी शब्द करते आकर्षित
कांगड़ी और हिंदी भाषा में भी इनकी अनेक रचनाएं हिमभारती, गिरिराज, पंचजगत, वनसन्देश, हिमसुमन, हिमोत्कर्ष, हिमधारा, हिमाचल मित्र , हिमाचल केसरी, बाणेश्वरी, कल्पद्रुम, वतन की फ़िक्र कर , बागर, विश्व ज्योति, पंजाब सौरभ, नन्हे तारे, देशप्यार, दैनिक ट्रिब्यून, पंजाब केसरी, वीर प्रताप, दिव्य हिमाचल, दैनिक जागरण, नवीं चेतना, चन्द्रभागा संवाद, शीराज़ा, शैल सूत्र आदि में छप चुकी हैं ।उनके ठेठ कांगड़ी शब्द जैसे -ढूणमढूणा, डैंजकडींजा , भटण्ड, खड़कन्नू, भूतड़, भुच्चर, गळदूत आदि पाठकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
युवा लेखकों के लिए प्रेरणास्रोत
पहाड़ी साहित्य सम्मान, , साहित्य दीप , सुरभि साहित्य श्री, साहित्य विभूति सम्मान , ठाकुर मौलूराम जीवंत पहाड़ी भाषा एवं संस्कृति राष्ट्रीय पुरस्कार , आचार्य वशिष्ठ सम्मान तथा राज्य स्तरीय शेष अवस्थी शेष स्मृति सम्मान आदि से नवाज़े गए नवीन हल्दूणवी युवा लेखकों के लिए प्रेरणास्रोत हैं ।
(लेखक अध्यापन कार्य में जुटे हैं )

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