मिलिए दिल से कवि शिमला के डॉक्टर ओमेश कुमार भारती से, जिन्होंने खोजा है रेबीज का सबसे सस्ता इलाज, खोज के लिए मिला है पदमश्री

Spread the love

मिलिए दिल से कवि शिमला के डॉक्टर ओमेश कुमार भारती से, जिन्होंने खोजा है रेबीज का सबसे सस्ता इलाज, खोज के लिए मिला है पदमश्री

 

शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट

बड़े कम पाठकों को इस बात की जानकारी होगी कि रेबिज के उपचार की दुनिया की सबसे कम लागत वाली वैक्सीन बनाने वाले डॉक्टर ओमेश कुमार भारती को साहित्य की दुनिया से भी गहरा लगाव है। दिल से कवि डॉक्टर ओमेश एक कोमल कवि के तौर पर भी अपनी खास पहचान रखते हैं। वे चिकित्सा जगत में अपनी खोज को लेकर खूब सुर्खियों में रहे हैं। साल 2019 में उन्हें इस खोज के लिए पदमश्री से सम्मानित किया जा चुका है।

 

सौ गुणा कम लागत, कम डॉज

डब्ल्यूएचओ ने डॉक्टर ओमेश कुमार भारती के रेबीज के लिए कम लागत के उपचार को स्वीकार कर इसे क्रांतिकारी वैक्सीन बताया है। यह बेक्सिंग पागल कुत्ते व बंदर के काटने से होने वाली बीमारी रेबीज के इलाज के लिए बनाए गया नया ‘चिक प्रोटोकॉल’ उपचार भविष्य में बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। इस प्रोटोकॉल को शिमला के डॉक्टर ओमेश कुमार भारती ने विकसित किया है। इसे दुनिया में रेबीज का अब तक का सबसे कम खर्च वाला इलाज माना जा रहा है। भारती ने रेबीज की बिमारी में इस सस्ते उपचार को एक क्रांति बताया है, जिसकी मदद से मरीज की दवा लेनी की खुराक काफी कम हो जाती है। इसके चलते उपचार की लागत प्रति मरीज 35 हजार रुपए (545 डॉलर) से 100 गुना कम होकर सिर्फ 350 रुपए (5.50 डॉलर) हो जाती है।

 

‘चिक प्रोटोकॉल’ को मान्यता

डॉ. भारती 17 साल से इस पर काम कर रहे थे। साल 2017 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने रेबीज वैक्सीन और इम्युनोग्लोब्युलंस की जानकारी साझा करते हुए डॉक्टर भारती के नए और कम लागत वाले उपचार ‘चिक प्रोटोकॉल’ को मेडिकल सांइस में विश्व स्तर पर मान्यता दे दी।

 

महंगा था उपचार

डब्लूएचओ के दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी कुत्ते या बंदर के काटने का शिकार होने वाले मरीज के लिए रेबीज इम्युनोग्लोब्यिलिन के साथ इंट्रामर्मली नाम की एक वैक्सीन दी जाती है, जिससे घाव और मांसपेशियों में दोनों में इंजेक्ट किया जाता है। रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन वैक्सीन की मात्रा रोगी के शरीर के वजन के अनुसार दी जाती है, जो बहुत ही महंगा पड़ती है, लेकिन रेबीज का टीका लगभग समान ही रहता है। वहीं अब इस नए प्रोटोकॉल से रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन का इलाज काफी सस्ता बना दिया है।

 

पिल्लेे से भी रैबीज का खतरा

आंकड़ों के मुताबिक, हर साल दुनिया भर में तकरीबन 59 हजार लोग रेबीज होने से मर जाते हैं। इस बीमारी से मरने वालों में अकेले भारत में यह आंकड़ा 20 हजार है, क्योंकि दवा काफी मंहगी है और इसका खर्चा हर मरीज के लिए उठा पाना मुश्किल होता है, जिस वजह से हर साल इतने लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। डॉक्टर भारती के अनुसार तीन माह से कम उम्र के पिल्ले से भी रैबीज का खतरा हो सकता है। हिमाचल प्रदेश में रैबीज के स्टेट मास्टर ट्रेनर डॉ. ओमेश कुमार भारती ने शोध में पाया कि हिमाचल में पिल्लों से संक्रमण के कारण तीन लोग मरे हैं।

 

 


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *