मिलिए चंबा के इलेक्ट्रिकल इंजीनियर मयंक जरयाल से, जिन्होंने छान मारी धौलाधार व पीर पंजाल की चोटियां अपने ब्लॉग www.himalayanfairytale.blogspot के जरिये सामने ला रहे पहाड़ की अदभुत जानकारियां

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मिलिए चंबा के इलेक्ट्रिकल इंजीनियर मयंक जरयाल से, जिन्होंने छान मारी धौलाधार व पीर पंजाल की चोटियां
अपने ब्लॉग www.himalayanfairytale.blogspot के जरिये सामने ला रहे पहाड़ की अदभुत जानकारियां
विनोद भावुक की रिपोर्ट
चंबा शहर के मयंक जरयाल इन दिनों दुनिया भर के ट्रैकरों के लिए एक चर्चित नाम है। पेशे से इंजीनियर और शौक से ट्रेकर व लेखक मयंक धौलाधार और पीर पंजाल पर्वत श्रृंखलाओं में विभिन्न दर्रों, झीलों व चोटियों के बारे में अदभुत जानकारियां व्यंग्यात्मक शैली में अपने ब्लॉग www.himalayanfairytale.blogspot के जरिये ट्रैकरों तक पहुंचा रहे हैं। वह हिमाचल प्रदेश के सूदूरवर्ती क्षेत्रों के लोगों के रहन सहन, संस्कृति, मेहमाननवाजी व वहां समस्याओं को अपने पाठकों से शेयर करते हैं। हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक ‘घुमक्कड़ी जिंदावाद’ में उनका एक यात्रा वृतांत प्रकाशित हुआ है।
छह सालों में छान मारी धौलाधार व पीर पंजाल की चोटियां
मयंक पिछले 6 सालों में धौलाधार और पीर पंजाल पर्वत श्रृंखलाओं में विभिन्न दर्रों, झीलों व चोटियों की कई यात्राएं कर चुके हैं, जिनमें इन्द्रहार जोत, कलाह जोत, गज जोत, जालसू जोत, लम डल यात्रा, चौरासी चली यात्रा, कमरुनाग झील व शिकारी देवी यात्रा प्रमुख हैं। कुछ आसान श्रेणी के ट्रेक जिनमें चूड़धार, खजुण्ड झील, डैनकुंड ट्रेक भी शामिल हैं। सर्दियों में जब पहाड़ बर्फ के आगोश में चले जाते हैं, तब वे शेष भारत के मैदानी भागों के रुख करता करते हैं, जिनमें द्वारकाधीश, सोमनाथ, नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, जग्गनाथपुरी, शिरड़ी, शनि शिंगणापुर जैसे पवित्र मंदिरों की यात्राएं और गोवा, मैसूर जैसे टूरिस्ट प्लेस शामिल हैं।
अनजान हिमाचल से करवाते हैं परिचय
मयंक कहते हैं वह मुख्यत: उन ट्रैकिंग मार्गों पर ट्रेक करना पसंद करते हैं जहां अभी तक टूरिस्टों व ट्रेकरों की ज़्यादा आवाजाही नहीं है। वापिस आकर वे अपने अनुभव ब्लॉग में लिखते हैं। वे कहते हैं, मेरा प्रयास उन छिपी हुए ट्रेकिंग मार्गों पर पर्यटन को बढ़ावा देना रहता है। मेरी लेखनी का एक उद्देश्य उन सूदूरवर्ती क्षेत्रों के लोगों की समस्याओं को अपने पाठकों के साथ साझा करना व साथ ही उनके रहन सहन, संस्कृति, मेहमाननवाजी व अन्य रोचक तथ्य व जानकारी टूरिज्म के बढ़ावे के लिए साझा करना है।
पहाड़ के मुद्दों पर पकड़
मयंक न केवल यात्रा वृतांत ही लिखते हैं, बल्कि स्थानीय मुद्दों को करीब से समझ कर उनकर जम कर लिखते हैं। मयंक ने अपने यात्रा वृतांत में मैंने त्रियुण्ड ट्रेल पर होने वाली ओवर प्राइसिंग की समस्या, होली– उत्तराला सुरंग के ऊपर हो रही राजनीति व स्थानीय लोगों की भावनाओं से खिलवाड़, कलाह जोत ट्रेल पर जिला प्रशासन का पक्षपातपूर्ण रवैये आदि मुद्दों पर लिखा है।
ट्रेकिंग के रास्ते पर्यटन का विकास
मयंक के मुताबिक हिमाचल में ट्रेकिंग पर्यटन उद्योग को बुलंदियों के शिखर तक ले जाने का माद्दा रखता है, बशर्ते सरकार अपना उदासीन रवैया बदल कर इस क्षेत्र के विकास के लिए ज़रूरी कदम उठाए। ट्रेकिंग मार्गों की अधिकता होने के बावजूद प्रदेश में अधिकांश ट्रेकिंग केवल धर्मशाला व कुल्लू तक सीमित है। सरकार नए ट्रैकिंग रूट्स विकसित कर पर्यटन विकास के प्रयास करे जिससे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के हज़ारों अवसर पैदा होंगे।
पहाड़ों के लिए सम्मोहन की शुरूआत
सुराड़ा मोहल्ला के इलेक्ट्रिकल इंजिनीयरिंग में बीटेक मयंक प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रहे हैं। पिताजी स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं व माता जी गृहणी हैं। छोटा भाई नौणी विश्विद्यालय में बागवानी का छात्र है। उनकी प्राथमिक शिक्षा चम्बा में ही हुई है। दसवीं के बाद राजकीय बहुतकनीकी संस्थान कांगड़ा में हुआ और यहीं से पहाड़ों के प्रति प्रेम जन्मा। जियोग्राफी स्कूल के दिनों से ही कमज़ोर थी, इसलिए कांगड़ा से सामने दिखते धौलाधार के पहाड़ों को देख कर मयंक हमेशा सोचता कि इन पहाड़ों के पीछे क्या होगा? भला इन बर्फ से ढके पहाड़ों पर भी कोई पहुंचता होगा क्या? बस इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढते ढूंढते ट्रेकिंग का शौक पनपा जो वक्त के साथ जुनून में बदल गया। आगे की स्नातक की शिक्षा बद्दी विश्विद्यालय में हुई, लेकिन मन वहीं धौलाधार के पहाड़ों में विचरता रह गया।
गज जोत की यात्रा और तरूण गोयल का सुझाव
मयंक बताते हैं, मेरा लेखन की तरफ मुडऩा एक्सीडेंटल डिस्कवरी की श्रेणी में रखा जा सकता है। लेखन के लिए प्रेरित करने का श्रेय ‘सबसे ऊंचा पहाड़’ पुस्तक के लेखक तरुण गोयल जी को जाता है। उन्होने पूछा- ‘यात्रा वृतांत लिखोगे?’
मैं- ‘ सोचा तो कई बार है, लेकिन क्रिएटिविटी नहीं झलकती।’ ‘लिखो तो।’ क्रिएटिव तो बाद में बनेगा, पहले ही लेख में मुंशी प्रेमचंद थोड़े न बनोगे।’ मैं- ‘कोशिश करूंगा।’ 2017 में गज जोत की यात्रा के बाद तरुण गोयल के साथ हुए इस छोटे से वार्तालाप ने मयंक को यात्रा वृतांत लिखने के लिए प्रेरित किया।
किस्सा -1 परांठे की आस में त्रियुड की ट्रेकिंग
मयंक कहते हैं कि अक्सर लोग उनसे पूछते हैं कि मैंने ट्रेकिंग की शुरुआत कैसे की? बेहद रोचक किस्सा है। जब पॉलीटेक्निक के मित्र कुछ साल पहले फऱबरी की एक सर्द सुबह त्रियुण्ड घुमाने ले गए। कुछ लडक़े आगे निकल गए और हम पीछे रह गए। पहाड़ों को जानने की उत्सुकता तो थी, लेकिन तब ट्रेकर बनने का कोई विचार मेरे मन में नहीं था। दरअसल आगे वाले लडक़े साथ में परांठे ले के गए थे और मैं पिछली रात से भूखा सिर्फ परांठे खाने की आस में बर्फ में चढ़ाई कर त्रियुण्ड टॉप पहुंच गया। खैर ऊपर पहुंचने तक परांठे खत्म हो चुके थे, लेकिन उस दिन जीवन के दो ज़रूरी सबक सीखने को मिले। पहला ये की भूखा पेट इंसान से कुछ भी करवा सकता है और दूसरा यह कि एक अंग्रेजी कहावत “you miss 100% of the shots you don’t take” बिल्कुल सत्य है।
किस्सा –2- धोखे से कर दी कब्रों की खोज
दूसरा कि़स्सा जालसू जोत ट्रेक के दौरान एक कब्रिस्तान की एक्सीडेंटल डिस्कवरी का है। कहते हैं किसी ज़माने में ट्राईबल हिन्दुओं और ट्राईबल मुसलमानों के बीच यहीं कहीं जोत के ऊपर युद्ध हुआ था। उस युद्ध में जीत हुई ट्राईबल हिन्दुओं की। ट्राईबल हिन्दुओं ने खूब मार कुटाई की और कई लाशें बिछा दीं -यहीं जोत के ऊपर। कुछ का कहना है की ये क़ब्रें विभाजन के दौरान हुई मार-काट का नतीजा हैं। मारे गए मुसलमानों की कब्रें यहीं कहीं छुपी हैं। ट्रेक के दौरान आराम फरमाने के लिए खुले घास के मैदान पर सो जाते हैं। उठने पर पता चलता है कि जहां सोए थे वो एक कब्रिस्तान है जिसमेंं 35-40 के करीब कब्रें हैं। धोखे से कब्रें खोज निकली जाती हैं।

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