मंडी के सरकारी स्कूल की प्रतिभा, आईआईटी रुड़की में प्रवेश, अमेरिका में मनवाया हुनर का लोहा,

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स्टोरी के पीछे की स्टोरी – मंडी के सरकारी स्कूल की प्रतिभा, आईआईटी रुड़की में प्रवेश, अमेरिका में मनवाया हुनर का लोहा, प्रदेश के लिए कुछ करने के लिए बड़ी नौकरी ठुकराई और फिर कर दिया कमाल
मंडी से विनोद भावुक की रिपोर्ट
मंडी शहर के भगवाहण मोहल्ले के एक मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुई आरती की स्कूली शिक्षा शहर के ही एक सरकारी स्कूल से हुई. बचपन से ही पढाई के प्रति समर्पण ने पहाड़ की इस बेटी को पढने के लिए आईआईटी रुड़की के दरवाजे खोल दिए. सालों अपनी प्रतिभा से अमेरिका में लोहा मनवाया. जिस समय आईआईटी मंडी की स्थापना हो रही थी, वह देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान में आकर्षक पॅकेज पर सेवाएं दे रही थीं. बावजूद इसके पहले से कम वेतनमान पर अपने शहर मंडी में स्थापित हो रही आईआईटी में सेवाएं देने का निर्णय किया. इसके पीछे सोच यह थी कि ऐसी तकनीक विकसित की जा सके, जिससे हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों के जीवन स्तर को उंचा उठाया जा सके.

चीड़ के जंगलों की आग से दोहरा नुक्सान

हिमाचल प्रदेश के बारे में अपने अध्ययन में डॉ आरती कश्यप ने पाया कि हिमाचल प्रदेश में चीड़ के जंगलों में हर साल आग लगती है. फायर सीजन में तो स्थिति आपातकाल जैसी हो जाती है.आग से जहां हर साल करोड़ों की वन संपदा नष्ट हो जाती है वहीं भारी मात्रा में वन्य प्राणियों की भी मौत होती है, कई बार तो आग रिहायशी मकानों को अपनी चपेट में ले लेती है तो कई बार जंगल की आग इंसानों की मौत का कारण बन जाती है. गर्मियों के मौसम में हर साल जंगलों को आग से बचाने और आग बुझाने पर अलग से करोड़ों खर्च करने पड़ते हैं.

आरती की मशीन को सरकार का अनुदान

डॉ आरती ने ऐसी मशीन विकसित करने की दिशा में प्रयास शुरू किये, जिसमें कच्चे माल के तौर पर चीड़ की सूखी का प्रयोग हो, ताकि गर्मियों में चीड़ के जंगलों को आग से बचाया जा सकता है और इससे बनने वाले उत्पाद को बाज़ार में बेच कर आय अर्जित की जा सके. दो साल से ज्यादा के शोध के बाद वे ऐसी तकनीक बनाने में कामयाब हुई हैं जो चीड़ की सूखी पत्तियों से ब्रिक्स तैयार करती हैं. हिमाचल प्रदेश सरकार ने पिछली केबिनेट में जिस तकनीक से चीड़ की पत्ति पर आधारित उद्योग लगाने पर पचास प्रतिशत अनुदान देने का निर्णय लिया. चीड़ की पत्ति से ब्रिक्स बनाने की तकनीक आईआईटी मंडी की एसोशियेट प्रोफ़ेसर डॉ आरती कश्यप ने विकसित की है.

जंगल में तभी जाएगा कोई उद्योग लगाने

बेशक प्रदेश सरकार ने उदारता दिखाते हुए करीब पांच लाख की लगत की मशीन की आधी कीमत अनुदान के रूप में देने का ऐतिहासिक फैसला लिया है, लेकिन चीड़ की पत्ति की कलेक्शन का गणित इस उद्यम को कोई ज्यादा लाभकारी नहीं रहने देता. चीड़ की पत्ति पर आधारिक उद्योग साल भर चले, इसके लिए सूखी पत्तियों को स्टोर करने का प्रबंध भी इस उद्योग की सफलता में चुनौती है. अगर सही में सरकार जंगलों को आग से बचाने को गंभीर है तो चीड़ की पत्तियों की कलेक्शन के काम को मनरेगा में शामिल करवाए, अथवा फायर सीजन में वन विभाग पहले की तर्ज पर चीड़ की पत्तियां खुद इकट्ठी करवा कर खुले स्थान पर जलाने की जगह मशीन स्थापित करने वाले उद्यमी को सौंप दे . स्टोरेज के लिए भी अनुदान पर विचार करना होगा, वर्ना जंगल के करीब कारखाना लगाने शायद ही कोई निवेशक जाए, हां आईआईटी मंडी की ओर से मशीन स्थापित करने पर तकनीकी सपोर्ट देना एक अच्छा कदम है. डॉ आरती अब लेंटाना से ब्रिक्स बनाने की तकनीक भी विकसित करने में जुटी हैं, जो कि हिमाचल के सन्दर्भ में बेहद जरूरी है.


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